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गोपाल अंसल को शाम तक समर्पण करने का आदेश

गोपाल अंसल को शाम तक समर्पण करने का आदेश

उच्चतम न्यायालय ने रियल एस्टेट कारोबारी गोपाल अंसल को कोई भी राहत देने से आज इंकार करते हुये उन्हें निर्देश दिया कि 1997 के उपहार सिनेमा अग्निकांड मामले में एक साल की सजा भुगतने के लिये वह शाम तक समर्पण करें। प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने गोपाल अंसल को समर्पण करने के लिये और अधिक वक्त देने से इंकार कर दिया। गोपाल का कहना था कि उन्होंने राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर की है और इसी आधार पर उन्हें समर्पण के लिये कुछ समय और प्रदान किया जाये।

 
गोपाल अंसल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने आज जब इस मामले का उल्लेख किया और समर्पण के लिये कुछ और समय मांगा तो पीठ ने कहा, ‘‘खेद है, हम ऐसा नहीं कर सकते।’’ जेठमलानी का कहना था कि उन्होंने राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर की है। शीर्ष अदालत ने गोपाल अंसल की दया याचिका के शीघ्रता से निबटारे का निर्देश देने का जेठमलानी का अनुरोध भी ठुकरा दिया। पीठ ने कहा कि वह इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती क्योंकि यह पूरी तरह से राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में आता है।
 
शीर्ष अदालत ने नौ मार्च को गोपाल का यह अनुरोध ठुकरा दिया था कि उन्हें उनके बड़े भाई सुशील अंसल के समकक्ष रखा जाये। न्यायालय ने उन्हें 20 मार्च तक समर्पण करने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने सुशील अंसल की वृद्धावस्था से जुड़ी परेशानियों को देखते हुये उन्हें जेल में बिताई गयी अवधि की ही सजा सुनायी थी। उपहार सिनेमा में 13 जून, 1997 को हिन्दी फिल्म बॉर्डर के प्रदर्शन के दौरान हुये अग्निकांड के इस मामले में 69 वर्षीय गोपाल अंसल पहले करीब साढ़े चार महीने जेल में बिता चुके हैं। इस हादसे में 59 व्यक्ति मारे गये थे और अग्निकांड के दौरान हुयी भगदड़ में सौ से अधिक अन्य जख्मी हो गये थे।
 
न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने नौ फरवरी को बहुमत के फैसले में दोनों पर भाइयों पर लगाये गये तीस तीस करोड़ रुपए के जुर्माने के साथ ही 76 वर्षीय सुशील अंसल की उम्र को ध्यान में रखते हुये उनकी सजा जेल में बिताई गयी अवधि तक सीमित कर दी थी परंतु गोपाल अंसल को चार सप्ताह के भीतर समर्पण करने और शेष सजा गुजारने का निर्देश दिया था। इसके बाद गोपाल ने समता के आधार पर इस आदेश में सुधार का अनुरोध करते हुये न्यायालय में अर्जी दायर की थी। उनका तर्क था कि वह 69 साल के हैं और यदि उन्हें जेल भेजा गया तो इससे उनके स्वास्थ्य को अपूर्णीय क्षति हो सकती है।
 

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