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शेखावाटी के परमहंस के नाम से विख्यात हैं पंडित गणेशनारायण

शेखावाटी के परमहंस के नाम से विख्यात हैं पंडित गणेशनारायण

राजस्थान का शेखावाटी क्षेत्र जो नामी उद्योगपतियों, बहादुर सैनिकों, भित्ति चित्रकला के लिए मशहूर है, वहीं इस क्षेत्र में बड़े-बड़े संत-महात्माओं, फकीर-मौलवियों ने अपनी तपस्या एवं भक्ति के बल पर इस क्षेत्र की पवित्रता बनाये रखने में अति महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस श्रृंखला में सिद्ध पुरुष और भविष्यवेत्ता पण्डित गणेश नारायणजी का स्थान सर्वोपरि है। शेखावाटी के परमहंस के नाम से विख्यात गणेशनारायणजी ने बहुमुखी प्रतिभा के धनी होने के कारण कम उम्र में ही वेदों, व्याकरण, ज्योतिष में पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया था। इनकी शादी शिक्षा पूर्ण होने से पहले हो गयी लेकिन शादी से थोड़े समय बाद ही इन्होंने गृहस्थ से विमुख होकर स्वयं को परमहंस की अवस्था में ढाल लिया तथा नीले वस्त्र धारण करने लगे।

झुंझुनू जिले के बुगाला ग्राम में सम्वत 1903 में पौष बदी एकम को गुरुवार के दिन इनका खंडेलवाल ब्राह्मण घनश्यामदास के घर जन्म हुआ। संवत 1917 में मात्र चौदह वर्ष की उम्र में नवलगढ़ के चतुर्भुज की लड़की यशोदा के साथ इनका विवाह सम्पन्न हुआ। नवलगढ़ में ही रह रहे अमीर शाहजादा केशरशाह से इन्होंने फारसी भाषा का ज्ञान प्राप्त किया। संवत 1947 में ये चिड़ावा नगरी आये। चिड़ावा आगमन के वक्त गणेशनारायण जी पूर्ण अघोरी रूप धारण कर चुके थे। 
 
गणेशनारायणजी भगवती दुर्गा के परमभक्त थे तथा दुर्गामंत्र का हर वक्त जाप करते रहते थे। इनके मुंह से उस वक्त जो भी बात निकल जाती वह सत्य होती। यह चमत्कार देख कई लोग इनके परमभक्त बन गये, वहीं कई लोग इनसे डरने लगे क्योंकि ये अनिष्ट घटने वाली घटना का भी पूर्व संकेत कर देते थे, सच्चे साधक होने के उपरान्त भी दुनिया इन्हें पागल मानती थी। ये सदैव लोगों से दूर रहने का प्रयत्न करते थे। 
 
औरत ओर बच्चे तो इनसे बहुत डरते थे क्योंकि इनकी वेशभूषा ही ऐसी थी। समाज में बहिष्कृत तथा शास्त्रों में निषिद्ध नीले रंग के वस्त्रों का ही गणेशनारायण जी प्रयोग करते थे। ये सिले हुये कपड़े नहीं पहनते थे। ये कभी श्मशान में लोट लगाते तो कभी पास के भगीनिये जोहड़े में बैठे रहते थे। भोजन करते समय कुत्ते और कौवे भी इनके साथ खाते थे। ये कुत्तों के मुंह से टपकते तथा हंडियों में पड़े पदार्थ को पहले गुदा से लगाकर बड़ी खुशी से ग्रहण करते थे। इनकी दृष्टि में किसी भी पदार्थ के प्रति घृणा नहीं थी।
 
एक बार सेठ जुगलकिशोरजी बिड़ला इन्हें पिलानी ले जाने लगे मगर रास्ते में भगीनिये जोहड़े में आते ही गाड़ी रुक गयी और आगे नहीं बढ़ी। मजबूर होकर बिड़लाजी ने गणेशनारायणजी को वहीं उतार दिया। भगीनिये जोहड़े में पण्डितजी का विशेष स्नेह देखकर इनकी यादगार में बिड़ला ने यहां जोहड़ा खुदवाकर एक घाट बनवाया तथा उस घाट पर एक बहुत ऊॅंची ’’गनेशलाट’’ नाम की संवत 1959 में स्तूप बनवाई। इस स्तूप पर चढ़कर देखने से चिड़ावा व पिलानी का पूरा दृश्य साफ दिखाई देता था।
 
पण्डितजी अपने दर्शनार्थ आये भक्तजनों को प्रश्न करने से पूर्व ही उनके मन की बात बताकर उन्हें आश्चर्यचकित कर देते थे। इनकी भविष्यवाणियां कभी गलत नहीं हुईं और इन्होंने जिसे भी आशीर्वाद दिया वह धन्य हो गया। पिलानी निवासी सेठ जुगलकिशोर बिड़ला से परमहंस का विशेष स्नेह था तथा इनके आशीर्वाद से ही बिड़ला परिवार उद्योग, व्यापार के क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित कर सका। एक बार पण्डितजी ने कहा कि जुगलकिशोर जा, कमाने निकल जा, आज तेरा शुभ दिन है। 
 
पण्डितजी की आज्ञा मानकर सेठ कलकत्ता की ओर चल दिये। रास्ते में उसे दाहिनी तरफ फन उठाये काला सांप मिला जो शुभ शकुन था मगर सेठ उसे अपशकुन मानकर वापिस लौट आये और पण्डितजी को पूरी घटना बतायी। पण्डित जी बोले जुगलकिशोर तुम से भारी गलती हो गयी यदि चला जाता तो चक्रवर्ती सम्राट बनता। जा अब भी तू यशस्वी बनेगा। अपनी करनी बरनी बन्द मत होने देना इसे सदैव चालू रखना। बिड़ला परिवार का नाम इसी प्रकार देश के प्रमुख उद्योगपतियों में गिना गया। ऐसी चमत्कार पूर्ण बातों से परमहंस के प्रति श्रद्धालुओं की भक्ति बढ़ती गयी। इनके भक्तजन देश के सभी भागों में रहते हैं। इनके मनमौजी स्वभाव के कारण ही लोग इन्हें ''बावलिया’’ संत के नाम से भी पुकारते हैं।
 
महात्मा गणेशनारायणजी ने संवत 1969 में पौष मास की नवमी को योग मार्ग द्वारा शरीर त्याग दिया। इनके अन्तिम संस्कार स्थल पर एक मन्दिर बना हुआ है जहां इनकी भव्य प्रतिमा स्थापित है तथा पास ही बिड़ला परिवार ने एक ऊॅंची स्तूप का निर्माण करवा दिया जिस पर संगमरमर की ब्रह्मा, विष्णु, महेश की मूर्तियां लगी हैं। चिड़ावा वासी गणेशनारायणजी को अपना ग्राम देवता मानते हैं। इनकी निर्वाण तिथि पर विशाल मेला लगता है जिसमें हजारों श्रद्धालु दर्शनार्थ आते हैं।
 
- रमेश सर्राफ धमोरा

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