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पितरों की तृप्ति का अवसर माना जाता है पितृ पक्ष

पितरों की तृप्ति का अवसर माना जाता है पितृ पक्ष

प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की पूर्णिमा में आश्विन मास की अमावस्या तक का समय श्राद्ध कर्म के रूप में जाना जाता है। इस वर्ष 17 सितंबर 2016 को पूर्णिमा तिथि के दिन से श्राद्ध का आरंभ हुआ। इस पितृपक्ष अवधि में पूर्वजों के लिए श्राद्धपूर्वक किया गया दान तर्पण रूप में किया जाता है। पितृपक्ष को महालय या कनागत भी कहा जाता है। हिंदू धर्म मान्यता अनुसार, सूर्य के कन्या राशि में आने पर पितर परलोक से उतर कर कुछ समय के लिए पृथ्वी पर अपने पुत्र पौत्रों के यहां आते हैं। श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, उसे श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध के महत्व के बारे में कई प्राचीन ग्रंथों तथा पुराणों में वर्णन मिलता है। श्राद्ध का पितरों के साथ बहुत ही घनिष्ठ संबंध है। पितरों को आहार तथा अपनी श्रद्धा पहुंचाने का एकमात्र साधन श्राद्ध है। मृतक के लिए श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिण्ड तथा दान ही श्राद्ध कहा जाता है। जिस मृत व्यक्ति के एक वर्ष तक के सभी क्रिया-कर्म संपन्न हो जाते हैं, उसी को पितर कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार जिन व्यक्तियों का श्राद्ध मनाया जाता है उनके नाम तथा गोत्र का उच्चारण करके मंत्रों द्वारा जो अन्न आदि उन्हें समर्पित किया जाता है, वह उन्हें विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है।

जैसे यदि मृतक व्यक्ति को अपने कर्मों के अनुसार देव योनि मिलती है, तो श्राद्ध के दिन ब्राह्मण को खिलाया गया भोजन उन्हें अमृत रूप में प्राप्त होता है। यदि पितर गन्धर्व लोक में है, तो उन्हें भोजन की प्राप्ति भोग रूप में होती है। पशु योनि में है तो तृण रूप में, सर्प योनि में होने पर वायु रूप में, यक्ष रूप में होने पर पेय रूप में, दानव योनि में होने पर मांस रूप में, प्रेत योनि में होने पर रक्त रूप में तथा मनुष्य योनि होने पर अन्न के रूप में भोजन की प्राप्ति होती है। वायु पुराण में लिखा है मेरे पितर जो प्रेत रूप हैं तिलयुक्त जौ के पिंडों से वह तृप्त हों। साथ ही सृष्टि में हर वस्तु ब्रह्मा से लेकर तिनके तक, चाहे वह चर हो या अचर हो, मेरे द्वारा दिए जल से तृत्प हों। माना जाता है कि श्राद्ध करने की परंपरा वैदिक काल के बाद से आरंभ हुई थी। शास्त्रों में दी गई विधि द्वारा पितरों के लिए श्राद्ध भाव से मंत्रों के साथ दी गई दान-दक्षिणा ही श्राद्ध कहलाता है जो कार्य पितरों के लिए श्रद्धा से किया जाए वह श्राद्ध है।
 
प्राचीन साहित्य के अनुसार, सावन माह की पूर्णिमा से ही पितर पृथ्वी पर आ जाते हैं। वह नई आई कुशा की कोंपलों पर विराजमान हो जाते हैं। श्राद्ध अथवा पितृ पक्ष में व्यक्ति जो भी पितरों के नाम से दान तथा भोजन कराते हैं अथवा उनके नाम से जो भी निकालते हैं, उसे पितर सूक्ष्म रूप से ग्रहण करते हैं। ग्रंथों में तीन पीढियों तक श्राद्ध करने का विधान बताया गया है। पुराणों के अनुसार यमराज हर वर्ष श्राद्ध पक्ष में सभी जीवों को मुक्त कर देते हैं, जिससे वह अपने स्वजनों के पास जाकर तर्पण ग्रहण कर सकते हैं। तीन पूर्वज पिता, दादा, परदादा को तीन देवताओं के समान माना जाता है। पिता को वसु के समान माना जाता है। रूद्र देवता को दादा के समान माना जाता है। आदित्य देवता को परदादा के सामना माना जाता है। श्राद्ध के समय यही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार यह श्राद्ध के दिन श्राद्ध कराने वाले के शरीर में प्रवेश करते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि श्राद्ध के समय यह वहां मौजूद रहते हैं और नियमानुसार उचित तरीके से कराए गए श्राद्ध से तृप्त होकर वह अपने वंशजों को सपरिवार सुख तथा समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध कर्म में उच्चारित मंत्रों तथा आहुतियों को वह अपने साथ ले जाकर अन्य पितरों तक भी पहुंचाते हैं।
 
श्राद्ध करने की सीधा संबंध पितरों यानि दिवंगत परिजनों का श्रद्धापर्वक किए जाने वाला स्मरण है, जो उनकी मृत्यु की तिथि में किया जाता है। अर्थात् पितर प्रतिपदा को स्वर्गवासी हुए हों, उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही होगा। इसी प्रकार अन्य दिनों का भी, लेकिन विशेष मान्यता यह भी है कि पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाए। परिवार में कुछ ऐसे भी पितर होते हैं, जिनकी अकाल मृत्यु हो जाती है। यानी दुर्घटना, विस्फोट, हत्या या आत्महत्या अथवा विष से। ऐसे लोगों का श्राद्ध द्वादशी के दिन और जिन पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। जीवन में यदि कभी भूले-भटके माता-पिता के प्रति कोई दुर्व्यवहार, निदंनीय कर्म या अशुद्ध कर्म हो जाए, तो पितृ पक्ष में पितरों का विधिपूर्वक ब्राह्मण को बुलाकर दूब, तिल, कुशा, तुलसीदल, फल, मेवा, दाल-चावल, पूरी व पकवान आदि सहित अपने दिवंगत माता-पिता दादा-ताऊ, चाचा, परदादा, नाना-नानी आदि पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करके श्राद्ध करने से सारे पाप कट जाते हैं। यह भी ध्यान रहे कि ये सभी श्राद्ध पितरों की दिवगंत यानि मृत्यु की तिथियों में ही किए जाएं। यह मान्यता है कि ब्राह्मण के रूप में पितृ पक्ष में दिए हुए दान पुण्य का फल दिवंगत पितरों की आत्मा की तृष्टि हेतु जाता है। अर्थात् ब्राह्मण प्रसन्न तो पितृजन भी प्रसन्न रहते हैं। अपात्र ब्राह्मण को कभी भी श्राद्ध करने के लिए आमंत्रित नहीं करना चाहिए। 
 
मनुस्मृति में इसका खास प्रावधान है। पितृ पक्ष की सभी पंद्रह तिथियां श्राद्ध को समर्पित हैं। अतः वर्ष के किसी भी माह एवं तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों का श्राद्ध उसी तिथि को किया जाना चाहिए। पितृ पक्ष में कुतप वेला अर्थात् मध्याह्न के समय दोपहर साढे बारह से एक बजे तक श्राद्ध करना चाहिए। प्रत्येक माह की अमावस्या पितरों की पुण्य तिथि मानी जाती है, किंतु अश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या पितरों हेतु विशेष फलदायक है। इस अमावस्या को पितृतविसर्जनी अमावस्या अथवा महालया भी कहा जाता है। इसी तिथि को समस्त पितरों का विसर्जन होता है। जिन पितरों की पुण्य तिथि ज्ञात नहीं होती अथवा किन्हीं कारणवश जिनका श्राद्ध पितृ पक्ष के पंद्रह दिनों में नहीं हो पाता, उनका श्राद्ध, दान, तर्पण आदि इसी तिथि को किया जाता है। इस अमावस्या को सभी पितर अपने अपने सगे-संबंधियों के द्वार पर पिण्डदान, श्राद्ध एवं तर्पण आदि की कामना से जाते हैं तथा इन सबके न मिलने पर शाप देकर पितृलोक को प्रस्थान कर जाते हैं।    
 
- मानवेंद्र कुमार

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