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विश्लेषण

जल संकट से निबटने को जन भागीदारी बेहद जरूरी

By आशीष वशिष्ठ | Publish Date: Jun 1 2016 2:03PM
जल संकट से निबटने को जन भागीदारी बेहद जरूरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात' के 20वें संस्करण में देश में व्याप्त जल संकट से निबटने के लिये जन भागीदारी की अपील की है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि प्रधानमंत्री की मन की बात देश की जनता के मन में कितना असर करेगी। क्या प्रधानमंत्री की चिंता और अपील से प्रभावित होकर देशवासी जल की बर्बादी से लेकर संचयन तक के उपायों को अपनाएंगे। सवाल यह भी है कि करोड़ों−अरबों की योजनाओं और भारी भरकम मंत्रालयों एवं सरकारी मशीनरी के बाद भी देश में जल संकट दिन ब दिन गंभीर रूप क्यों धारण कर रहा है। प्रधानमंत्री ने जल संकट के समाधान को लेकर कई प्रदेशों द्वारा अपने स्तर पर किये गये प्रयासों की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। बावजूद इसके जमीनी हकीकत यह है कि वर्तमान में देश के एक दर्जन से राज्यों में सूखे के हालात हैं और आबादी का बड़ा हिस्सा पर्याप्त पानी से वंचित है। हम सबको सोचना होगा कि, क्या पानी हमारी जरूरत भर है, क्या हर जीव की इस जरूरत को पूरा करने के प्रति हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं? कैसे मिलेगा पानी, जब हम उसे नहीं बचाएंगे? इन सभी सवालों के जवाब में हमें शर्मिंदा होना चाहिए, क्योंकि भारत का भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। ये आने वाले भयावह हालातों का संकेत है, जब हम पानी की एक बूंद के लिए तरस जाएंगे।

 
बचपन से लेकर अभी तक हमें जल के महत्व के बारे में पढ़ाया जाता रहा है, लेकिन इस पर हम कभी अमल नहीं करते हैं। दैनिक जीवन में जाने−अनजाने में हम पानी की बर्बादी खूब करते हैं। सवेरे उठते ही सबसे पहले हम शौच के लिए जाते हैं, उसके बाद हम ब्रश या दातून से अपने दांतों की सफाई करते हैं। फिर हम घर की सफाई करते हैं, कपड़े धोते हैं, नहाते हैं, चाय पीते हैं, भोजन पकाते हैं, खेतों की सिंचाई करते हैं और सबसे अहम बात है कि पानी पीते हैं। देखा जाए तो हमारे दैनिक जीवन में पानी सबसे बड़ी जरूरत है, इसके बिना हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। भोजन या अन्य चीजों का विकल्प हो सकता है, लेकिन पानी का विकल्प फिलहाल कुछ भी नहीं है। जन्म से लेकर मृत्यु तक यह एक महत्वपूर्ण संसाधन है, जिसे हम किसी हाल में नहीं खोना चाहते हैं। पृथ्वी पर जल की उपलब्धता इस समय करीब 73 फीसदी है, जिसमें मानवों के उपयोग करने योग्य जल महज 2.5 प्रतिशत है। 2.5 प्रतिशत पानी पर ही पूरी दुनिया निर्भर है। देश के जितने भी बड़े बांध हैं, उनकी क्षमता 27 फीसदी से भी कम रह गई है। 91 जलाशयों का पानी का स्तर पिछले एक वर्ष में 30 प्रतिशत से भी नीचे पहुंच चुका है।
 
स्वतंत्रता बाद से देश में लगभग सभी प्राकृतिक संसाधनों की बेरहमी से लूट हुई है। जल की तो कोई कीमत हमारी नजर में कभी रही ही नहीं। हम यही सोचते आये हैं कि कुदरत का यह अनमोल खजाना कभी कम नहीं होगा। हमारी इसी सोच ने पानी की बर्बादी को बढ़ाया है। नदियों में बढ़ते प्रदूषण और भूजल के अंधाधुंध दोहन ने गंगा गोदावरी के देश में जल संकट खड़ा कर दिया है। यह किसी त्रासदी से कम है क्या कि महाराष्ट्र के लातूर में पानी के लिए खूनी संघर्ष को रोकने के लिए धारा 144 लागू है। कई राज्य जबरदस्त सूखे के राडार पर हैं। कुंए, तालाब लगभग सूख गए हैं। बावड़ियों का अस्तित्व समाप्त प्राय है। भूजल का स्तर बेहद नीचे जा चुका है। जिस तेजी से जनसंख्या बढ़ने के साथ कल−कारखाने, उद्योगों और पशुपालन को बढ़ावा दिया गया, उस अनुपात में जल संरक्षण की ओर ध्यान नहीं गया जिस कारण आज गिरता भूगर्भीय जल स्तर बेहद चिंता का कारण बना हुआ है। अब लगने लगा है कि अगला विश्व यु़द्ध पानी के लिए ही होगा।
 
जल संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय झारखण्ड के सिमोन उरांव वर्तमान जल संकट को लेकर कहते हैं कि 'लोग धरती से पानी निकालना जानते हैं। उसे देना नहीं।' देखा जाए तो पहले सभी जगहों पर तालाब, कुएं और बांध थे जिसमें बरसात का पानी जमा होता था। अब धड़ल्ले से बोरिंग की जा रही है। जिससे बारिश का पानी जमा नहीं हो पाता है। शहरों में तो जितनी जमीन बची थी लगभग सभी में अपार्टमेंट और घर बन रहे हैं। उनमें धरती का कलेजा चीरकर 800−1000 फीट नीचे से पानी निकाला जा रहा है। वहां से पानी निकल रहा है पर जा नहीं रहा तो ऐसे में जलसंकट नहीं होगा तो क्या होगा। विश्व में जल का संकट कोने−कोने व्याप्त है। आज हर क्षेत्र में विकास हो रहा है। दुनिया औद्योगीकरण की राह पर चल रही है, किंतु स्वच्छ और रोग रहित जल मिल पाना मुश्किल हो रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के जरिए 29 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों में किए गए मूल्यांकन में 445 नदियों में से 275 नदियां प्रदूषित पाई गईं। विश्व भर में साफ पानी की अनुपलब्धता के चलते ही जल जनित रोग महामारी का रूप ले रहे हैं।
 
आंकड़ों के अनुसार अभी दुनिया में करीब पौने 2 अरब लोगों को शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। यह सोचना ही होगा कि केवल पानी को हम किसी कल कारखाने में नहीं बना सकते हैं इसलिए प्रकृति प्रदत्त जल का संरक्षण करना है और एक−एक बूंद जल के महत्व को समझना होना होगा। हमें वर्षा जल के संरक्षण के लिए चेतना ही होगा। अंधाधुंध औद्योगीकरण और तेजी से फैलते कंक्रीट के जंगलों ने धरती की प्यास को बुझने से रोका है। धरती प्यासी है और जल प्रबंधन के लिए कोई ठोस प्रभावी नीति नहीं होने से, हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। कहने को तो धरातल पर तीन चौथाई पानी है लेकिन पीने लायक कितना यह सर्विवदित है! रेगिस्तानी इलाकों की भयावह तस्वीर बेहद डरावनी और दुखद है। पानी के लिए आज भी लोगों को मीलों पैदल जाना पड़ता है। आधुनिकता से रंगे इस दौर में भी गंदा पानी पीना मजबूरी है। भले ही इससे जल जनित रोग हो जाएं और जान पर बन आए लेकिन प्यास तो बुझानी ही होगी!
 
प्रधानमंत्री ने जल संकट से उबरने के लिये जन भागीदारी की अपील की है। ये सच है कि बड़े से बड़ी सरकार या व्यवस्था बिना जन भागीदारी के अपने मंतव्यों और उद्देश्यों में सफल नहीं हो सकती है। जहां देश के अनेक शहरों, कस्बों और गांवों में पानी की भारी किल्लत है, और स्थानीय नागरिक सरकार और सरकारी मशनीरी के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर बैठे हैं वहीं कुछ ऐसी चंद मिसालें भी हैं जहां स्थानीय लोगों ने अपने बलबूते जल संकट से निजात पाई है। बेंगलुरु की सरजापुर रोड पर स्थित रिहायशी कॉलोनी 'रेनबो ड्राइव' के 250 घरों में पानी की सप्लाई तक नहीं थी। आज यह कॉलोनी पानी के मामले में आत्मनिर्भर है और यहां से दूसरी कॉलोनियों में भी पानी सप्लाई होने लगा है। यह संभव हुआ है पानी बचाने, संग्रह करने और पुनः इस्तेमाल लायक बनाने से। वर्षा जल संग्रहण के लिए कॉलोनी के हर घर में रिचार्ज कुएं बनाए गए हैं। राजस्थान के लोगों ने मरी हुई एक या दो नहीं, बल्कि सात नदियों को फिर से जीवन देकर ये साबित कर दिया है कि अगर इंसान में दृढ़ शक्ति हो तो कुछ भी संभव हो सकता है। जब राजस्थान के लोग, राजस्थान की सात नदियों को जिंदा कर सकते हैं तो बाकी नदियां साफ क्यों नहीं हो सकती हैं? पंजाब के होशियारपुर में बहती काली बीन नदी कभी बेहद प्रदूषित थी। लेकिन सिख धर्मगुरु बलबीर सिंह सीचेवाल की पहल ने उस नदी को स्वच्छ करवा दिया।
 
देश में पानी की समस्या अपने चरम पर है। धड़ल्ले से खुलेआम इसकी बर्बादी हो रही है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि लोग इसकी अहमियत के बारे में जानते हुए भी अंजान बने हुए हैं और इसकी बर्बादी कर रहे हैं। हमें यह समझना होगा और समझाना होगा कि कुदरत ने हमें कई अनमोल तोहफों से नवाजा है उनमें से पानी भी एक है। इसलिए हमें इसे सहेज कर रखना है। पानी की कमी को वही लोग समझ सकते हैं जो इसकी कमी से दो चार होते हैं। हम खाने के बगैर दो−तीन दिन जिंदा रह सकते हैं मगर पानी के बगैर जिंदगी की पटरी का आगे बढ़ना तकरीबन नामुमकनि-सा लगता है। आय के साधन जुटाने में मनुष्य पानी का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहा है। हमें भविष्य की चिंता बिल्कुल नहीं है और न ही हम करना चाहते हैं। अगर विकास की अंधाधुंध दौड़ में मनुष्य इसी तरह शामिल रहा तो हमारी आने वाली पीढ़ी कुदरत के अनमोल तोहफे पानी से वंचित रह सकती है।
 
बरसात के मौसम में जो पानी बरसता है उसे संरक्षित करने की सरकार की कोई योजना नहीं। ऐसे में तो दिक्कत होगी ही। बारिश से पहले गांवों में छोटे−छोटे डैम और बांध बनाकर वर्षा जल को संरक्षित किया जाना चाहिए। शहर में जितने भी तालाब और डैम हैं। उन्हें गहरा किया जाना चाहिए जिससे उनकी जल संग्रह की क्षमता बढ़े। सभी घरों और अपार्टमेंट में वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य किया जाना चाहिए तभी जलसंकट का मुकाबला किया जा सकेगा। गांव और टोले में कुआं रहेगा तो उसमें बरसात का पानी जायेगा। तब धरती का पानी और बरसात का पानी मेल खाएगा। जरूरी नहीं है कि आप भगीरथ बन जाएं, लेकिन दैनिक जीवन में एक−एक बूंद बचाने का प्रयास तो कर ही सकते हैं। खुला हुआ नल बंद करें, अनावश्यक पानी बर्बाद न करें और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करें। इसे आदत में शामिल करें। हमारी छोटी सी आदत आने वाली पीढ़ियों को जल के रूप में जीवन दे सकती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत 2025 तक भीषण जल संकट वाला देश बन जाएगा। हमारे पास सिर्फ आठ सालों का वक्त है, जब हम अपनी कोशिशों से धरती की बंजर होती कोख को दोबारा सींच सकते हैं। अगर हम जीना चाहते हैं तो हमें ये करना ही होगा।