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मुशर्रफ अगर हाफिज सईद से गठबंधन करते हैं तो चुनौती बढ़ेगी

By संजय तिवारी | Publish Date: Dec 7 2017 2:35PM
मुशर्रफ अगर हाफिज सईद से गठबंधन करते हैं तो चुनौती बढ़ेगी

भारत में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पड़ोसी के यहाँ कश्मीर का मुद्दा बहुत गरम करने की तैयारी चल रही है। इसमें भारत के भी अलगाववादी नेताओं का समर्थन माना जा रहा है। कुख्यात आतंकी हाफिज सईद की पार्टी जमात-उद-दावा 2018 में होने वाले पाकिस्तान के आम चुनाव में मिल्ली मुस्लिम लीग के बैनर तले भाग लेगी। हाफिज ने खुद भी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रखी है। हाफिज को इस राजनीतिक अभियान में जनरल परवेज मुशर्रफ का भी साथ मिल रहा है। इधर भारत में फारुख अब्दुल्ला जैसे नेताओं के बयानों से भी हाफिज के प्रयास को बल मिल रहा है। जिस तरह से फारुख अब्दुल्ला लगातार भारत विरोधी बयान दे रहे हैं उससे अलगाववादियों का मनोबल तो बढ़ा ही है, सीमा पार के शिविरों में भी सरगर्मी बढ़ गयी है। यहाँ यह बात गौर करने वाली है कि भारत के लिए भी वर्ष 2018 बहुत महत्वपूर्ण है। यह नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल का आखिरी दौर है। इसी के अंतिम चरण में भारत में भी लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां बढ़ जाएंगी। 

मुशर्रफ का समर्थन 
 
उल्लेखनीय है कि हाल ही में मुशर्रफ ने बयान दिया था कि वह लश्करे तैयबा को पसंद करते हैं और हाफिज सईद उन्हें बेहद पसंद है। उनका यह बयान चौंकाने वाला नहीं है क्योंकि अब वह सत्ता में नहीं हैं। नेता चाहे भारत के हों या पाकिस्तान के जब वो सत्ता में होते हैं तब उनके बयान अलग होते हैं और जब वो सत्ता से बाहर होते हैं तब अलग। यहाँ याद दिला देना जरुरी लगता है कि परवेज मुशर्रफ जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे तब उन्होंने अमेरिका के वॉर ऑन टेरर (आतंकवाद के खिलाफ युद्ध) का समर्थन किया था। वर्ष 2001 के बाद जब वह इस अभियान से जुड़े तब वह हमेशा ही जेहादी संगठनों के खिलाफ बोलते थे और इनके खिलाफ बेहद सख़्त रवैया रखते थे। मुशर्रफ ने खुद ही कई वांछित लोगों और शीर्ष चरमपंथियों को पकड़वाकर पैसों के बदले अमेरिका के हवाले भी किया था। लेकिन अब वह सत्ता से बाहर हैं और खासतौर से नवाज शरीफ के खिलाफ हैं। मुशर्रफ पर पर लाल मस्जिद कार्रवाई और नवाब बुगती की हत्या का मुकदमा भी चल रहा है लेकिन वह पकिस्तान से  बाहर बैठे हैं। उन पर 2007 में आपातकाल लगाने से संबंधित मुकदमा भी चल रहा है।
 
हाफिज का ऐलान
 
इसी बीच चाउबुर्जी में जमात-उद-दावा के मुख्यालय में हाफिज सईद ने ऐलान किया है कि मिल्ली मुस्लिम लीग अगले साल आम चुनाव में उतरने का प्लान बना रही है। उसने कहा कि मैं भी 2018 को उन कश्मीरियों के नाम करता हूं जो आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सईद ने कहा कि मैं भारत को बताना चाहता हूं कि मैं कश्मीरियों का सपोर्ट करना जारी रखूंगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वहां क्या परेशानियां हैं। भारत चाहता है कि हम कश्मीरियों के लिए आवाज उठाना बंद कर दें। वह पाकिस्तान सरकार पर दबाव बना रहा है। उसने कहा कि मैं पाकिस्तान को बताना चहता हूं कि पर्दे के पीछे से जारी डिप्लोमैसी ने सिर्फ कश्मीर के मुद्दे को नुकसान पहुंचाया है।
 
मिल्ली मुस्लिम लीग 
 
उल्लेखनीय है कि जमात-उद-दावा ने अगस्त में मिल्ली मुस्लिम लीग पार्टी बनाई थी। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान का चुनाव आयोग इसे राजनीतिक पार्टी के तौर पर मान्यता देने से दो बार इनकार कर चुका है। अब खबर आ रही है कि सईद की पार्टी को मान्यता नहीं भी मिली तो वह निर्दलीय या किसी दूसरी पार्टी से चुनाव लड़ सकता है। यहाँ यह जान लेना जरुरी है कि सईद को पाकिस्तान सरकार ने इस साल जनवरी से नजरबंद किया था। उसे आगे किसी दूसरे मामले में नजरबंद न करने का फैसला किया गया था। इसके बाद सईद को 24 नवंबर को नजरबंदी से रिहा कर दिया गया था। 
 
मुंबई हमले का मास्टर माइंड 
 
हाफिज सईद मुंबई में नवंबर 2008 में किए गए आतंकी हमले का मास्टरमाइंड है। इस हमले में 166 लोगों की मौत हो गई थी। उसे यूनाइटेड नेशंस ने यूएन सिक्युरिटी काउंसिल रिजोल्यूशन 1267 के तहत दिसंबर 2008 में ब्लैक लिस्टेड किया था। अमेरिका ने भी उसे ग्लोबल टेररिस्ट डिक्लेयर किया है और उसके सिर पर एक करोड़ डॉलर का इनाम रखा है। अब पाकिस्तान की राजनीति की मुख्यधारा में उतरने की उसकी योजना यदि सफल होती है तो यह भारत और पाकिस्तान के लिए मुसीबत तो बनेगा ही, साथ ही दक्षिण पश्चिम एशिया में शान्ति की बहाली के प्रयासों को भी गंभीर झटका लग सकता है। 
 
संवेदनशील कश्मीर 
 
भारत के लिए वैसे भी कश्मीर बहुत संवेदनशील विषय रहा है। जिस तरह से फारुख अब्दुल्ला ने बयानबाजी कर इसे और तूल दिया है उस पर सरकार की भी नजर है। फारूक जैसे नेता की इस अनर्गल बयानबाजी ने खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी उद्वेलित किया है और फारुख को उन्होंने बाकायदा जवाब भी दिया है। प्रधानमंत्री ने बहुत ही सख्त लहजे में फारुख को सन्देश दिया है लेकिन फारुख अभी भी सार्वजनिक रूप से ऐसी भाषा बोल रहे हैं जिसमें भारत की परेशानियां बढ़ाने के स्पष्ट संकेत हैं।
 
- संजय तिवारी