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स्तंभ

भारत-बांग्लादेश संबंधों में मधुरता से बंगाली हिन्दुओं के 'अच्छे दिन'

By तरुण विजय | Publish Date: Oct 7 2017 12:29PM
भारत-बांग्लादेश संबंधों में मधुरता से बंगाली हिन्दुओं के 'अच्छे दिन'

कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध पंक्तियां हैं- जोदी तोर डाक शुने केऊना आसे, तोबे एकला चालो रे! यदि तुम्हारी आवाज सुनने वाला कोई न मिले तो अकेला चलो। इस बार दुर्गा पूजा पर ऐसा ही हुआ। मेरी माशी मां, कोलकाता से बारिशाल दुर्गा पूजा के लिए जा रही थीं- प्रायः क्षणांश में मेरा भी मन जाने का हुआ- वीसा लिया और रात की उड़ान से पहुंचा कोलकाता।

दुर्गापूजा हो और बंगाल सोए यह संभव नहीं। हवाई अड्डे से घर तक का दस किलोमीटर का सफर पूरा करने में ढाई घंटे लगे- स्त्री, पुरुष, बच्चे दुर्गापूजा पंडालों में दर्शनार्थ जा रहे थे, उत्सव मंडपों के भीतर और बाहर-चांदनी की तरह बिखरा हुआ था। किसी बड़े पंडाल में तो लोगों को तीन-तीन घंटे पंक्तियों में खड़े रहना पड़ा-तब दर्शन हुए। दुनिया में हिन्दुओं जैसा उत्सव प्रिय समाज कहां होगा? आपदाओं, विरोधों के बीच भी वह खुशियों के दीप जला ही लेता है। मन में प्रश्न था इन धार्मिक उत्सवों में राजनेताओं के बड़े-बड़े चित्र क्यों दरवाजों और रास्तों पर लग रहे हैं? धर्म के लिए तो कुछ कहना नहीं, पर धर्म उत्सव की भीड़ को अपना चेहरा दिखाकर राजनीतिक मुनाफा कमाना एक वीभत्स अनुष्ठान ही लगा।
 
कोलकाता से सुबह पांच बजे चल पेट्रापोल सीमा से हम प्रायः दस बजे बांग्लादेश में दाखिल हुआ। उधर का वातावरण साफ सुथरा था। दो बड़े स्तंभों रवींद्र नाथ ठाकुर तथा काजी नजरूल ठाकुर का रचित है? बांग्लादेश की सीमा पर बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान और शेख हसीना के भी सुंदर चित्र थे। जबकि भारत की ओर न तो राष्ट्रपति, न ही प्रधानमंत्री के चित्र थे। राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत का दर्शन कराना तो दूर की बात है। इस्लामी बांग्लादेश और सेकुलर भारत में अंतर?
 
पेट्रोपोल से बांग्लादेश के हिन्दुओं की दुर्गापूजा का पहला मंडप केराल कट्ठा ठाकुर बाड़ी में था, जो जेसोर जिले में है। रास्ते में अनेक गोशाला जैसे टीनशेड मिले। मैंने पूछा तो मेरे मित्र गोपाल सरकार हंसे-बोले ये सब भारत से लायीं गयीं गाएं हैं- कसाई खाने भेजने के लिए यहां रखा जाता है।
 
केराल कट्ठा की दुर्गापूजा सुंदर थी- बड़ी संख्या में हिंदू परिवार वहां मिले। पूजा संस्कृत में हो रही थी। लाउड स्पीकर पर दुर्गा सप्तशती के पाठ की ध्वनि गूंज रही थी। मुझे बताया कि कुछ वर्ष पूर्व तक यहां दुर्गापूजा मनाना भी संभव नहीं था- आज भी डर तो रहता ही है कि कब कौन जमाते इस्लामी या जिहादी तत्व पूजा मंडप न तोड़ दें।
 
सातखिरा जिला था, वहां झाउडांगा गांव, फिर मायेर बाड़ी (मां का घर) दुर्गा पूजा मंडप गए। वही दृश्य, सरल, सामान्य मंडप- आमतौर पर इस क्षेत्र में हिन्दु ग्रामीण कृषक हैं। सरकारी नौकरी अथवा व्यापार में उन्हें कम स्थान प्राप्त है- पर त्योहार तो त्योहार ही है। मन में उमंग उठती है- नए कपड़े, मिठाई, दुर्गा की मूर्तियों का सृजन और फिर विसर्जन। भारत की हिन्दू जेहादी तत्वों की सक्रियता, देश का राज्य-मजहब इस्लाम और घृणा तथा शत्रुता की राजनीतिक छाया में बांग्लादेश के हिन्दू अपनी आस्था, रीति रिवाज, भाषा, त्योहार, मंगल उत्सव, तथा शोक के क्षण कैसे जीते हैं?
 
सातखिरा जिले में हमने छह मंडप देखे- कोचुआ, बंदर तला, परूलिया, नौल्टा, गाजीरहाट तथा विष्णुपुर। तब तक मध्यरात्रि हो चुकी थी। बंगाल में दुर्गापूजा या नवरात्रि पर व्रत-उपवास रखते हुए हमने किसी को देखा नहीं। सब दावत के मूड में होते हैं। वहां बांग्लादेश हिन्दू महाजोट यानी सभी हिंदू संगठनों का विराट गठबंधन बनाने का प्रयास जारी है उसके अध्यक्ष श्री गोविंद प्रमाणिक के आग्रह पर मैंने काक्स बाजार (चटगांव) तथा ढाका की दुर्गापूजा ही नहीं देखी बल्कि उखिया से म्यांमार से आए रोहिंगिया हिन्दू शरणार्थियों से भी मिला।
 
अगर बंगाली हिन्दू इन दिनों अपने धार्मिक उत्सव अच्छी तरह मना रहे हैं, तो आप मानें या न मानें, उसका कारण भारत बांग्लादेश संबंधों में आया सकारात्मक परिवर्तन भी है। ढाका के प्रसिद्ध मानवाधिकारवादी श्री शहरयार कबीर मेरे पुराने मित्र हैं। उनसे मिले बिना ढाका जाना पूरा कैसे होता? उन्होंने इस स्थिति को एक वाक्य में बांध दिया- शेख हसीना से पहले सरकार हिन्दुओं पर कट्टर मुस्लिम आक्रमणों का संज्ञान ही नहीं लेती थी- नकार देती थी। अब सरकार संज्ञान लेती है- रिपोर्ट लिखती है पर उस पर कार्यवाही करने से डरती है। दुर्गा पूजा के समय छह स्थानों पर दुर्गा प्रतिमाएं खण्डित हुईं, पूजा देखने गयी एक नाबालिग हिन्दू लड़की से दुष्कर्म हुआ- अर्थात स्थिति अभी भी पूरी नहीं बदली। तो बदला क्या? शहरयार बताते हैं, और हमारी इस भेंट में हिंदू महाजोट के अध्यक्ष गोबिंद प्रमाणिक भी शामिल थे, इस साल, बांग्लादेश में 33 हजार दुर्गा मंडप सजे, प्रत्येक मंडप को सरकार से थोड़ी बहुत वित्तीय सहायता भी मिली और महानवमी पर राष्ट्रपति अब्दुल हमीद ने हिंदू गणमान्य नागरिकों से दुर्गा पूजा की शुभकामनाएं स्वीकार करने के लए ढाका में विशेष व्यवस्था की। ये बातें न भारत की मीडिया में आती हैं- न इनका भारत में कोई महत्व ही माना जाता है।
 
ढाका में मां ढाकेश्वरी, रमना काली, धानमंडी और वरिष्ठ सैन्य अफसरों की डिफेंस हाउसिंग सोसायटी में मुख्य दुर्गा पूजा मंडप सजे। इन चारों में ही मुझे जाने का अवसर मिला। इनमें धानमंडी, विशेष क्षेत्र है जो शेख मुजीब का भी घर था। वहां की दुर्गा पूजा में प्रायः बीस हजार हिंदू-सपरिवार आए हुए थे। पूजा सीमित के अध्यक्ष ने मेरा भावभीना स्वागत किया- इस पंडाल में प्रवेश के लिए लंबी कतार लगी थी। एक प्रसिद्ध मुस्लिम गायिका जीनत मां दुर्गा के गीत ही नहीं गा रही थीं बल्कि बीच-बीच में हिंदी में- 'बोल दुर्गा माई की........ जय' के नारे भी लगा रही थीं। हिंदू महाजोट के संरक्षक ब्रिगेडियर राय हैं। उनके कारण सैन्य क्षेत्र में दुर्गा पूजा हुई है। पर प्रायः सेना तथा पुलिस में हिंदुओं की भर्ती नहीं होती-- जो थोड़े बहुत हैं-- उन्हें एक सीमा के आगे प्रोन्नति नहीं दी जाती।
 
बांग्लादेश में मोदी और सुभाष चंद्र बोस के नाम अभी भी रोमांच पैदा करते हैं। धानमंडी की दुर्गा पूजा में मुझे भारत की ओर से बोलने को कहा गया तो श्री मोदी का नाम लेते ही माहौल में उत्साह भर गया। बंगबंधु मुजीब, शेख हसीना जैसे नाम भारत में भी सकारात्मक भाव पैदा करते हैं। इतिहास की विडंबना है कि पूर्वी तथा पश्चिमी बंगाल 1965 के बंग भंग का शिकार हो गए। मुस्लिम कट्टरवाद, सहिष्णुता, हिंदू द्वेष ने इसमें दरार डाल दी। वही द्वेष हिंदू रोहिंगिया शरणार्थियों को संत्रस्त किए हुए है। यह द्वेष, उस सांस्कृतिक धारा से खत्म हो सकता है.. जिस धारा में भाषा, बसंत जैसे पर्व, रवींद्र ठाकुर- काजी नजरूल के गीत, आज भी सामान्यतः बांग्लादेशी संभ्रांत महिलाओं द्वारा सिंदूर तथा शंख की चूडि़यों का उपयोग- हमें बांधता है। इसे बढ़ाने वाले प्रयास ही गंगा और पद्मा की एक रूप धारा हमारे विषण्ण हृदयों को सरस करेगी। भारतीय उच्चायुक्त श्री हर्षवर्द्धन विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के विशेष निर्देष पर रोहिंगिया हिंदू शरणर्थियों के साथ भेदभाव न हो तथा उन्हें पूरी सहायता मिले, यह सुनिश्चित कर रहे हैं। बांग्लादेश की मीडिया तथा अनेक वरिष्ठ बुद्धिजीवी हिंदुओं पर अत्याचारों के खिलाफ आवाज भी उठाते हैं। आवश्यकता है भारत के हिंदू संगठन वहां अधिक सक्रिय हों और परम्पर सेतुबंधन बनाने के सूत्रों को प्रोत्साहित किया जाए। घृणा तथा विखंडन से आसान क्या है? बांग्लादेश को आतंक की फैक्ट्री बनने से रोकने में भारत का भी उतना ही हित है जितना बांग्लादेश का।
 
- तरुण विजय