Prabhasakshi
मंगलवार, दिसम्बर 12 2017 | समय 04:13 Hrs(IST)

स्तंभ

'रसगुल्ला' ओडिशा का होता तो क्या इसकी मिठास कम हो जाती?

By मनोज झा | Publish Date: Nov 21 2017 10:59AM
'रसगुल्ला' ओडिशा का होता तो क्या इसकी मिठास कम हो जाती?

रसगुल्ला...नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है....देश के किसी भी शहर में चले जाइए मिठाई की दुकान में कोई और मिठाई मिले या नहीं आपको रसगुल्ला जरूर मिलेगा। बचपन से हम सभी को यही बताया गया कि रसगुल्ला का इतिहास बंगाल से जुड़ा है। लेकिन कभी रसगुल्ला के अविष्कार को लेकर दो राज्यों में जंग छिड़ जाएगी इसका अंदाजा कभी नहीं था। 

हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल और ओडिशा की...रसगुल्ले का ईजाद कहां हुआ इसे लेकर दोनों राज्यों में विवाद चल रहा था...रसगुल्ले के लिए जीआई टैग यानि जियोग्राफिकल इंडिकेशन हासिल करने के लिए दोनों राज्यों में जगं छिड़ गई थी। बहरहाल जीत ममता दीदी की हुई..चेन्नई स्थित जियोग्राफिकल इंडिकेशन के दफ्तर ने मंगलवार को ये साफ कर दिया कि रसगुल्ले का ईजाद पश्चिम बंगाल में ही हुआ।
 
रसगुल्ले पर ओडिशा से जंग जीतने के बाद ममता बनर्जी ने ट्वीटर पर राज्य के लोगों को बधाई भी दे दी। रसगुल्ला ने खाने वालों को कभी ये नहीं बताया कि उसकी उत्पत्ति कहां हुई लेकिन इसे लेकर दो राज्यों के बीच कड़वाहट की लकीर खिंच जाएगी इसका अंदाजा किसी को नहीं था।
 
दरअसल 2015 में ओडिशा सरकार के एक मंत्री ने ये कहकर विवाद खड़ा कर दिया था कि रसगुल्ला का अविष्कार ओडिशा में हुआ है। अपने दावे को साबित करने के लिए उन्होंने भगवान जगन्नाथ के खीर मोहन प्रसाद का भी हवाला दिया था। लेकिन खुद को रसगुल्ला का जनक बताने वाला पश्चिम बंगाल भला कैसे चुप बैठता...बंगाल के खाद्य प्रसंस्करण मंत्री अब्दुर्रज्जाक मोल्ला ने कहा कि रसगुल्ले का ईजाद बंगाल में हुआ है और हम ओडिशा को इसका क्रेडिट नहीं लेने देंगे।
 
बंगाल सरकार ने दावा किया था कि 1868 में नबीन चंद्र दास नाम के शख्स ने पहली बार रसगुल्ला बनाया था जो मिठाई बनाने के लिए मशहूर थे। नबीन चंद्र के परपोते ने ओडिशा के उस दावे को सीधे-सीधे खारिज कर दिया जिसमें उसने कहा था कि रसगुल्ले का ईजाद 700 साल पहले उसके यहां हुआ। कहा जाता है कि 18वीं सदी के दौरान डच और पुर्तगाली उपनिवेशकों ने छेना से मिठाई बनाने की तरकीब सिखाई और तभी से रसगुल्ला अस्तित्व में आया। 
 
कभी रसगुल्ला के इतिहास को लेकर सियासत होगी ये खुद रसगुल्ले ने भी नहीं सोचा होगा। रसगुल्ले को इससे क्या लेना-देना कि वो कहां से आया...उसकी उत्पति कैसे हुई? अगर रसगुल्ला बोल पाता तो यही कहता कि मुझे किसी विवाद में मत घसीटो...कम से कम मेरे नाम पर तो सियासत ना करो। मैं जैसा हूं वैसा ही ठीक हूं..मैं लोगों की कड़वाहट भरी जिंदगी में मिठास घोलता हूं बस यही मेरी पहचान है। 
 
जरा सोचिए क्या अगर रसगुल्ले का ईजाद ओडिशा में हुआ होता तो उसकी उपयोगिता कम हो जाती..हरगिज नहीं, लिट्टी-चोखा बिहार का ना होकर कर्नाटक का होता तो क्या लोग उसे खाना पसंद नहीं करते.. रसगुल्ला किसी नाम का मोहताज नहीं...वो हर घर की पहचान बन चुका है। 
 
मनोज झा
(लेखक एक टीवी चैनल में वरिष्ठ पत्रकार हैं।)