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जाधव मामले की बजाय हिंदुत्व थोपने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं मोदी

By कुलदीप नैय्यर | Publish Date: Jan 3 2018 2:38PM
जाधव मामले की बजाय हिंदुत्व थोपने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं मोदी

भारत और पाकिस्तान के बीच कोई भी चीज काम करती दिखाई नहीं देती। पाकिस्तानी जेल में कैद भारतीय कुलभूषण जाधव से उसकी पत्नी और मां की मुलाकात दोनों देशों के बीच बेहतर समझदारी बनाने के अवसर में तब्दील हो सकती थी। लेकिन दोनों देशों की नौकरशाही ऊपर से नीचे तक इतना प्रदूषित है कि बेहतर रिश्ते की किसी भी कोशिश को विफल कर देती है।

अंतरराष्ट्रीय संगठनों समेत ढेर सारे लोगों के 21 महीने के दबाव के बाद जाधव को उसके परिवार के लोगों से मुलाकात की इजाजत दी गई। लेकिन पाकिस्तान की नौकरशाही ने यह पक्का किया कि यह मुलाकात सही ढंग से न हो पाए। यह किसी के दिमाग की उपज थी जिसका नतीजा जाधव और परिवार के सदस्यों के बीच एक शीशे की दीवार के रूप में सामने आया। यहां तक कि विवाहित हिंदू औरतों द्वारा पहने जाने वाले मंगलसूत्र, चूड़ियों तथा बिंदी को भी हटा दिए जाने का आदेश दिया गया। इस कदम का क्या उद्देश्य था, यह किसी के समझ से परे है। आखिरकार, मंगलसूत्र तथा चूड़ियों के हथियार की तरह इस्तेमाल होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह विवाहित औरतों के प्रतीक−चिन्ह हैं।
 
पाकिस्तान के नौकरशाहों को यह पता है क्योंकि कुछ दिनों पहले तक वे एक ही व्यवस्था के हिस्सा थे। उनका कदम और कुछ नहीं, भारत के खिलाफ दुश्मनी की अभिव्यक्ति थी। उन्हें इस तरह के व्यवहार के लिए किसी ने नहीं कहा था। उन्होंने देश के विभाजन के बाद से यह आदत बना ली है। शायद पाकिस्तान की नौकरशाही फांसी स्थगित करने के हेग स्थित अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले को लेकर उत्तेजना में थी।
 
पाकिस्तान के मुताबिक, जाधव को पिछले साल मार्च में जासूसी तथा आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार किया गया जब वह बलूचिस्तान में भटक रहा था। इसके तुरंत बाद, पाकिस्तान की एक सैनिक अदालत ने जाससूी तथा तोड़−फोड़ की गतिविधियों में कथित तौर पर शामिल होने के लिए फांसी की सजा सुना दी। भारत का कहना था कि ईरानी बंदरगाह से उसका अपहरण कर लिया गया और उसकी गुप्त सुनवाई एक ''मजाक'' था।
 
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में की गई अपील में भारत ने जाधव की सुनवाई को ''न्याय की गंभीर विफलता'' बताया क्योंकि भारतीय राजनायिकों को जाधव से मिलने का अवसर नहीं दिया गया और उसे अपनी पसंद का बचाव पक्ष का वकील भी रखने नहीं दिया गया। नई दिल्ली ने दलील दी कि जाधव पर लगाई गई पाबंदी दूतावासों के संबंध को लेकर बने 1963 के वियना समझौते के खिलाफ है।
 
लेकिन पाकिस्तान ने दावा किया कि जाधव का मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर है क्योंकि यह एक राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है और न्यायालय को फांसी स्थगित करने का आदेश देने की जरूरत नहीं थी क्योंकि फांसी निकट नहीं थी। लेकिन अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा कि ''प्रथम दृष्टि में यह उसके अधिकार क्षेत्र में है'' क्योंकि जाधव को गिरफ्तार तथा उसे हिरासत में रखने को लेकर दूतावास को सूचना देने में इस्लामाबाद की विफलता'' और ''संपर्क में रहने तथा उस तक पहुंचने की इजाजत देने में उसकी कथित विफलता'' वियना समझौते के दायरे में आती है।
 
हेग स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ के उच्चतम न्यायालय के अध्यक्ष रोनी अब्राहम ने कहा, ''पाकिस्तान अपने हाथ में रहने वाले हर उपाय के जरिए यह सुनिश्चित करेगा कि अंतिम आदेश आने तक जाधव को फांसी नहीं दी जाये और वह इस आदेश को लागू करने के लिए उठाए गए हर कदम की जानकारी अदालत को देगा''। 
 
अपने ''अंतरिम उपाय'' जिसे 12 जजों के ट्रिब्यूनल ने सर्वसम्मति से पारित किया, में अदालत ने कहा, ''मामले को तब तक अपने हाथ में रखेगा जब तक वह अंतिम फैसला नहीं दे देता। यह आदेश जाधव के मामले में भारत और पाकिस्तान की दलीलें पेश करने के बाद दिया गया। इसने दोनों देश के बीच द्विपक्षीय संबंधों को और तनावपूर्ण बना दिया।
 
पाकिस्तान में एक दिखावे का लोकतंत्र बना हुआ है और सेना के आशीर्वाद से प्रशासन का नेतृत्व कर रहे पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भारत के हितैषी हैं। शायद वह उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से अपनी नजदीकियों को याद रखते हैं। कहा जाता है कि दोनों ने मिलकर कश्मीर समस्या का हल ढूंढ़ लिया था। लेकिन फार्मूले को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया।
 
आखिरकार सारा कुछ दोनों देशों के आपसी रिश्ते पर निर्भर करता है। एक दोस्ताना माहौल में, कश्मीर की बाधा के बावजूद दोनों देश आगे बढ़ गए होते। अगर रिश्ते मधुर होते तो जाधव और परिवार के सदस्यों की मुलाकात का स्वागत होता। पाकिस्तान ने सुरक्षा संबंधी सावधानियों का बहाना नहीं बनाया होता और उसके परिवार के सदस्यों की धार्मिक संवेदनशीलता का सम्मान किया जाता। यहां तक कि जाधव की मां को मराठी में बातचीत नहीं करने दिया गया जबकि ऐसी परिस्थिति में संवाद का स्वाभाविक माध्यम यही था।
 
इसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खाकन अब्बासी की ओर से अस्वीकार नहीं किया गया होगा क्योंकि माना जाता है कि वह भारत के साथ बेहतर रिश्ता चाहते हैं। वास्तव में, पाकिस्तान की घरेलू राजनीति आड़े आ रही होगी। पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट की ओर से नवाज शरीफ की जवाबदेही पर अभियोग लगाने के बाद राजनेता छिप गए हैं और उनकी आवाज गुम हो गई है।
 
लेकिन भारत में अलग स्थिति है। यहां एक ही व्यक्ति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ में प्रशासन का नियंत्रण है, भले ही उनके फैसले तानाशाही पूर्ण हैं। उनकी सरकार को यह ध्यान रखना चाहिए था कि जाधव की किस्मत दो देशों के झगड़े की भेंट चढ़ने नहीं छोड़ देनी चाहिए। नई दिल्ली को वैकल्पिक मध्यस्थता की तालाश करनी चाहिए थी, शायद नागरिक सामाजिक सस्ंथाओं द्वारा। लेकिन पीछे के दरवाजे से हिंदुत्व को प्रवेश दिलाना मोदी की प्राथमिकता है और जिस तरह की समस्या जाधव की है, वैसी समस्याओं के लिए उनके पास बहुत कम समय है।
 
पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने के लिए भारत ने एक और शर्त रख दी है कि इस्लामाबाद यह आश्वासन दे कि पाकिस्तान आतंकवादियों की शरणस्थली नहीं होगा। इसे लागू करना मुश्किल होगा क्योंकि सभी भागीदार इस्लामाबाद की कृपा पर नहीं होंगे। बलूचिस्तान अलग होने का प्रयास कर रहा है और यही वह जगह है जहां से जाधव को कथित तौर पर जासूसी के आरोप में पकड़ा गया।
 
नई दिल्ली ने कई बार यह आश्वासन दिया है कि पाकिस्तान की अखंडता को वह भारत की अखंडता के समान समझता है। जब संयुक्त राष्ट्रसंघ की ओर से आतंकवादी करार दिया गया हाफिज सईद अपनी राजनीतिक पार्टी शुरू करता है तो यह साफ हो जाता है कि पाकिस्तान उसकी गतिविधि को रोकने में असहाय है। भारत के साथ किसी भी तरह के अच्छे संबंध की प्रस्तावना यही है कि मुंबई हमले के मास्टर माइंड के खिलाफ कार्रवाई हो, लेकिन इस्लामाबाद इतना कमजोर है कि उसके खिलाफ कारवाई नहीं कर सकता है। 
 
बिलावल भुट्टो, बेनजीर भुट्टो के बेटे, ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया है। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री का बेटा होने के अलावा उसकी कोई पहचान नहीं है। आसिफ अली जरदारी ही सारे आदेश देते हैं और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी में कई लोगों का यह पसंद नहीं है। इस तरह की परिस्थितियों में जाधव का भाग्य अनिश्चित है।
 
- कुलदीप नैय्यर