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'वेदना' का भी साम्प्रदायीकरण कर दिया तथाकथित 'सेकुलरों' ने

By तरुण विजय | Publish Date: Jul 17 2017 1:02PM
'वेदना' का भी साम्प्रदायीकरण कर दिया तथाकथित 'सेकुलरों' ने

अमरनाथ यात्रियों की जघन्य हत्या करने वाले इस्लामी आतंकवादी न केवल इंसानियत पर धब्बा लगा गए बल्कि अपने मजहब को भी कलंकित कर गए। देश के हिन्दू-मुसलमानों ने जिस एकता से इस हत्याकांड की निंदा की है वह पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है। लेकिन सेकुलर मीडिया का एक पक्ष जब वस्तुतः हिन्दू विरोधी मानसिकता का द्योतक है वह भी इस घटनाक्रम में उजागर हुआ। वह पक्ष है हिन्दू समाज की वेदना को हिंदू के नाते न प्रकट करना और न ही उसका हिन्दू पहलू उजागर होने देना।

यदि किसी भारतीय मुस्लिम पर अत्याचार या हमला होता है तो न केवल पीड़ित का मजहब सुर्खियों में आता है बल्कि हमलावरों को 'हिन्दू कट्टरपंथी' वगैरह बल्कि त्रिशूलधारी खूंखार और सर पर केसरिया पट्टी बांधे लोगों को सारे हिन्दू समाज का प्रतिनिधि बता कर दिखाया जाता है। पर यदि पीड़ित हिन्दू है और हमलावर मुस्लिम तो न पीड़ित की आस्था का उल्लेख होगा और न ही इस्लामी आतंकवादियों को खूंखार चेहरे वाला दिखाया जाएगा।

 
क्या हिन्दू की वेदना, वेदना नहीं और वेदना का भी हम सम्प्रदायीकरण करेंगे, वह भी सेकुलरवाद के नाम पर?
 
जो कश्मीरी मुस्लिम नेता अमरनाथ यात्रियों के लिए एक इंच जमीन भी न देने की दम्भोक्तियां करते रहे और हिन्दुओं को कश्मीर से निकाले जाते समय चुप रहे, वे किस मुंह और किस हक से कश्मीरियत की बात करते हैं? केवल और केवल हिन्दुस्तानियत से ही कश्मीरियत जिंदा है। हिन्दुस्तान के अलावा किसी कश्मीरियत का कोई मायने ही नहीं है। क्योंकि जब तक जिहादी दरिन्दों द्वारा इस्लामियत के नाम पर निकाले गये 5 लाख हिन्दू सुरक्षा और सम्मान के साथ वापस नहीं लौटते तब तक कैसा गणतंत्र और कैसी संसद। सब अधूरा ही है। कश्मीर से सीधे केरल आ जाइये। हर दिन हम उन हिन्दुओं की हत्याओं के आंकड़े जोड़ते चले जाते हैं जिन्हें केवल आग्रही एवं निष्ठावान हिन्दू होने के नाते मारा जा रहा है। जब कोई स्वयंसेवक सुबह काम पर जाता है तो मालूम नहीं होता कि शाम तक सुरक्षित घर लौटेगा। घर में खाना बनाकर बच्चों को परोस रही मां आशंकित रहती है कि शाखा से घर लौटकर आये उसके बेटे की पीछे-पीछे माकपाई ना आ रहे हों। जो घर तोड़ देंगे, जला देंगे, बूढ़ें मां-बाप को भी शायद मार दें। प. बंगाल में हिंदू बस्तियों का उजाड़ा जाना बदस्तूर जारी है क्योंकि ममता बंधोपाध्याय को मुस्लिम वोट चाहिए। पाकिस्तान से 12, 14, 16 साल की हिन्दू बच्चियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और निकाह की खबरें आती ही हैं- कौन इस पर दर्द महसूस करता है बांग्लादेश के हिन्दू आज भी, तमाम राजकीय आत्मीय संबंधों के बावजूद किसी हालत में हैं।
 
कितने विध्वंस और आर्त्तनाद हिंदुओं को अभी और देखने होंगे? सिर्फ इसलिए क्योंकि वे हिंदू हैं?
 
श्री रामनाथ कोविंद का राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन होना तो प्रायः सभी को अच्छा लगा। लेकिन कतिपय मुस्लिम व कम्युनिस्ट, जो सोशल मीडिया के जिहादी हैं, भाजपा के इस असाधारण लोकप्रिय निर्णय से बौखला उठे और उन्होंने गाली गलौच की भाषा में टवीट किया। प्रसिद्ध विचारक और राष्ट्रीय भावनाओं से अपनी कलम की मजबूत बनाने वाली निपुर शर्मा ने वैसी अभद्रता प्रदर्शित करने वाली राणा अयूब के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट दर्ज करा दी तो सदानंद धूमे जैसे विदेशी अखबारों के स्तंभकार इसे लोकतंत्र एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मान बैठे। विदेशों में रहकर मन विदेशी कैसे हो जाता है यह हम नहीं समझ पाते क्योंकि स्वदेश में रहने वाले भी ऐसे कुछ लोग हैं जिनके मन कहीं बाहर हैं, तन भले ही भारत में हो। केरल में मारे जा रहे स्वयंसेवकों का दर्द दर्द नहीं, कश्मीर के हिन्दुओं का दर्द दर्द नहीं। लेकिन प्रणय रॉय के फर्जीवाड़े बेनकाब होने का दर्द बेहद तकलीफदेह हो जाता है- इन अमन के रखवालों के लिये। जैसे अफजल खां और स्टॉलिन ने अपने सूबे अपने से भिन्न मत वालों के लिए बंद किये हुए थे वैसे सेक्युलर चैनल और अखबार वाले अपने संपादकीय पृष्ठ तथा अग्रलेख की जगहें केवल और केवल हिन्दुत्व समर्थक राष्ट्रीय विचार के अनुगमियों के लिए बंद करके रखते रहे। इनके लिए अभिव्यक्ति की आजादी का एक ही अर्थ था- राष्ट्रीयता समर्थक केसरिया विचार वर्ग पर एकतरफा आक्रमण तथा हिन्दुत्व को एक गाली का रूप देना।
 
दार्जिलिंग में गोरखा समाज पर भाषा के नाम पर ममता का अत्याचार, वस्तुतः मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए हिन्दू समाज पर आघात ही है। गोरखा समाज पराक्रमी और देशभक्त है। अत्यंत धर्मनिष्ठ है। गोरखा शब्द का का जन्म ही गोरखा से हुआ। जो गोरक्षक था- उसे गोरक्षा कहा गया। उन्हें अपनी भाषा, संस्कृति की रक्षा का हक क्यों नहीं होना चाहिए? यदि दार्जिलिंग मुस्लिम बहुल होता तो ममता दीदी का ऐसा रवैया कभी नहीं होता। उनका बस चले तो वह मुस्लिम वोटों के लिए उर्दू को ही सब पर लाद दें। पर हिन्दू गोरखा समाज की भाषा उन्हें नहीं स्वीकार है।
 
भारत पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में अगर भारत नहीं जीत पाता तो यह किसके लिए खुशी का कारण होना चाहिए। और जिसे खुशी हो उसे कहना चाहिए? आखिर हमारा आपस में कोई रिश्ता है और उस रिश्ते का नाम भारतीयता है इसलिए तो हमे दूसरे से अपनापन महसूस करते हैं। अगर ये अपनापन एक दूसरे के सुख दुख में सुखी और दुखी नहीं होता तो फिर अपनेपन की परिभाषा ही बदलनी पड़ेगी।
 
कश्मीर में पिछले दिनों शहीद हुए लेफ्टीनेंट उमर फैयाज और सब इंस्पेक्टर फिरोज डार से जिहादी दुश्मनी का कारण सिर्फ यही था कि ये भारत के तिरंगे और संविधान के लिए वफादार थे। सही बात यह है कि 99 प्रतिशत कश्मीरी मुस्लिम आज भी एक भारतीय के नाते सम्मान और सुख की जिंदगी बिताना चाहता है। जो थोड़े बहुत गद्दार और अपने ही खून और मिट्टी से द्रोह करने वाले लोग हैं उन्हें दिल्ली की मीडिया का सहारा मिलता है। हमने गद्दारों के साक्षात्कार सेक्युलर समाचारपत्रों में पढ़े हैं। क्या कभी किसी ऐसे पत्र पत्रिका अथवा चैनल ने उन कश्मीरी मुस्लिमों के साक्षात्कार भी छापे हैं जो भारत की मिट्टी की सुगंध में लिपट राष्ट्रीयता की बात कहते हैं? दिल्ली की मीडिया यह दिखानी चाहती है कि कश्मीर के पत्थरबाज और हुर्रियत के गद्दार ही घाटी के प्रतिनिधि हैं। जबकि यह गलत है।
 
लगातार लगातार विदेशी आक्रमणकारियों से निबटते निबटते हम इस मुकाम पर आ पहुंचे हैं कि राम, कृष्ण और शिव के ध्वस्त किये हुए मंदिरों को पुनर्निर्मित करने की बात करना भी सेक्युलर आक्रमण आमंत्रित करता है। कश्मीर में सात सौ से ज्यादा ऐसे सुंदर और बड़े मंदिर जिहादियों ने ध्वस्त कर दिये जिनका पूरा विवरण दस्तावेजों में दर्ज है। लेकिन आज भी आत्मरक्षा की मुद्रा में खड़ा हिन्दू उन ध्वस्त किये गये मंदिरों के पुनर्निर्माण की बात तक करने से हिचकता ही रहता है। अगल बगल में पहले देख लेता है, फिर धीरे से कहता है- सर वो जो कश्मीर में मंदिर ढाये गये थे उनके पुनर्निर्माण की तो बात कीजिये न सर।
 
सदियों का दर्द है। संभाले नहीं संभलता। थमते थमते थमेंगे आंसू- ये रोना है कोई हंसी तो नहीं।
 
- तरुण विजय