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आतंकी संगठनों से भी सुरक्षा का आश्वासन चाहते हैं कश्मीरी पंडित

By सुरेश एस डुग्गर | Publish Date: Mar 20 2017 12:09PM
आतंकी संगठनों से भी सुरक्षा का आश्वासन चाहते हैं कश्मीरी पंडित

27 सालों से पलायन की त्रासदी सहन करने वाले कश्मीरी पंडित परिवार कश्मीर वापसी के लिए तैयार हैं। बस उन्हें आश्वासन चाहिए सुरक्षा का। इस सुरक्षा के आश्वासन के प्रति उनका कहना है कि वे आश्वासन सरकार से ही नहीं बल्कि आतंकियों से भी चाहते हैं। लेकिन कश्मीर में हालात को युद्ध के रूप में निरूपित करने वाले पक्ष उन्हें सुरक्षा का आश्वासन देने को तैयार नहीं हैं। कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन छेड़ने वाले कश्मीर की आजादी का सपना देख रहे हैं तो जम्मू और लद्दाख की जनता चाहती है कि दोनों संभागों को कश्मीर से अलग कर दिया जाए। ऐसे में आतंकवाद का शिकार होने वाला कश्मीरी पंडित समुदाय अपने विकल्प के तहत कश्मीर के एक भूभाग पर अधिकार चाहता है। यही अधिकार उनकी नजर में कश्मीर समस्या का हल है।

यह सच्चाई है कि 1988 के अंत में कश्मीर घाटी के विभिन्न भागों से लाखों की संख्या में अपना घर-बार त्यागने वाले बस एक छोटी सी बात को लेकर अपनी कश्मीर वापसी को रोके हुए हैं। किसी के लिए यह बात छोटी सी हो सकती है लेकिन कश्मीरी पंडितों के लिए नहीं क्योंकि इसी के साथ उनकी जिन्दगी और मौत का सवाल जुड़ा हुआ है।
 
यह छोटी सी बात है कश्मीर में सुरक्षा का आश्वासन। अर्थात वे इसके प्रति आश्वस्त हो जाना चाहते हैं कि कश्मीर वापस लौटने पर वे सुरक्षित रहेंगे। ऐसा आश्वासन उन्हें सरकार की ओर से सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था के रूप में ही नहीं चाहिए बल्कि वे आतंकी संगठनों से भी ऐसा आश्वासन चाहते हैं कि आतंकी गुट उन्हें नुक्सान नहीं पहुंचाएंगे।
 
ऐसा आश्वासन पूरे कश्मीरी पंडित समुदाय की ओर से चाहा गया है। इस संबंध में घर वापसी के इच्छुक संगठनों द्वारा अतीत में तत्कालीन सरकारों को पत्र भी लिखे गए थे। घर वापसी के प्रति अपने रुख से सरकार को अवगत करवाने के लिए लिखे गए पत्रों में बस यही बाधा बताई गई थी कि सरकार ने घर वापसी का जो प्लान उन्हें कई बार थमाया उसमें सुरक्षा के प्रति कुछ भी नहीं कहा गया।
 
हालांकि सरकार कहती है कि उनके लिए सुरक्षित क्षेत्र अर्थात सेफ जोन बनाए जाएंगे कश्मीर में। लेकिन कश्मीरी पंडित समुदाय का सवाल है कि ऐसे में जबकि कश्मीर घाटी में राकेटों, मिसाइलों, मोर्टार आदि जैसे युद्ध में इस्तेमाल होने वाले हथियारों का खुल कर इस्तेमाल हो रहा है सेफ जोन क्या सचमुच सेफ होंगे। इस पर सरकार ने खामोशी धारण की हुई है।
 
वैसे कश्मीरी पंडित समुदाय की चिंता सही है। कश्मीर की स्थिति को सभी पक्ष युद्ध निरूपित करते रहे हैं और ऐसे में कौन किसे सुरक्षा देगा यह बड़ी हास्यास्पद बात लगती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सुरक्षा प्रदान करने वाले आप अपने आपको असुरक्षित महसूस करते हैं।
 
हालांकि इसी सोच को दिमाग में रख कर कश्मीरी पंडित समुदाय ने आतंकियों से भी सुरक्षा का आश्वासन चाहा था। उन्हें वहां से भी इंकार ही मिला था। बताया जाता है कि कश्मीरी पंडित समुदाय ने सर्वदलीय हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं को इसके प्रति पत्र भी लिखे थे जिसके जवाब में हुर्रियत का कहना था कि युद्ध के दौरान किसी को किसी प्रकार की सुरक्षा का आश्वासन देने का अर्थ होता है उस पक्ष के साथ झूठ बोलना।
 
यह गौरतलब है कि हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता तथा कई अलगाववादी नेता समय-समय पर कश्मीरी पंडित समुदाय को कश्मीर वापसी का निमंत्रण दे चुके हैं। अपने निमंत्रण में वे यह अवश्य कहते रहे हैं कि कश्मीर उनके बिना अधूरा है लेकिन साथ ही सुरक्षा के सवाल पर उनका कहना था कि सुरक्षा के प्रति वे उन्हें आश्वस्त नहीं कर सकते।
 
नतीजतन घर वापसी के लिए तैयार होने वाले कश्मीरी पंडित समुदाय के लाखों परिवार वर्तमान हालात तथा अन्य असुविधाओं के चलते भी घर वापसी के लिए तैयार हैं लेकिन उन्हें सुरक्षा के प्रति कोई आश्वासन नहीं मिल रहा है। परंतु वे इस आश्वासन को बहुत जरूरी समझते हैं। यह इसलिए भी जरूरी समझा जा रहा है कि ऐसा होने पर वे कम से कम चैन की नींद तो सो सकेंगे।
 
यह सच है कि अपने विकल्प के बतौर कश्मीरी समुदाय चाहता है कि जम्मू कश्मीर की उलझन को सुलझाने की खातिर उसके चार हिस्से किए जाएं। हालांकि अन्य ताकतें इसके तीन हिस्से करने की मांग कर रही हैं। चौथा हिस्सा वह राज्य का नहीं चाहता बल्कि कश्मीर घाटी का चाहता है जिसे वे होमलैंड आदि का नाम देते हैं।
 
ऐसा सुझाव देने वाले कश्मीरी पंडित समुदाय के संगठनों में सबसे आगे ‘पनुन कश्मीर’ अर्थात हमारा कश्मीर नामक गुट है। उसके सुझाव के अनुसार, इसे केंद्र शासित प्रदेश के रूप में तैयार किया जा सकता है जहां वह कश्मीरी समुदाय सुख-चैन तथा अलगाववादी आतंकवादी संगठनों की पहुंच से दूर होकर रह सकेगा जहां मानवाधिकारों के उल्लंघन की कोई बात ही नहीं होगी और अल्पसंख्यक समुदाय आजादी महसूस करेगा।
 
इस संगठन का कहना है कि हालांकि भारत सरकार के लिए यह कदम बहुत ही कठिनाईयों से भरा होगा परंतु एक कौम को बचाने की खातिर तथा जम्मू कश्मीर की समस्या को सुलझाने के लिए राज्य को चार हिस्सों में बांटना आज के परिप्रेक्ष्य में जरूरी है। इसके लिए पनुन कश्मीर क्रोएशिया में रहने वाले सर्ब लोगों का उदाहरण भी देता है जिन्होंने करजीना क्षेत्र को इसी की खातिर छोड़ दिया था और अब पनुन कश्मीर की नजर में ऐसा होने पर ही भारतीय उपमहाद्वीप में शांति का आगमन होगा।
 
कश्मीरी पंडित समुदाय की नजर में यह केंद्र शासित क्षेत्र, जो होगा कश्मीर घाटी का ही एक हिस्सा लेकिन उसमें सिर्फ और सिर्फ हिन्दू अल्पसंख्यक समुदाय के लोग ही रहेंगे, को जेहलम दरिया के किनारे के क्षेत्रों में बसाना होगा। अर्थात कश्मीर के सबसे उपजाऊ क्षेत्र में जहां खेती और व्यापार तेजी से उपज रहा है।
 
वैसे पिछले कुछ अरसे से पनुन कश्मीर सहित अन्य होमलैंड समर्थक संगठन खामोश बैठे हुए थे। उन्होंने इसे पुनः उसी समय उठाना आरंभ किया जब सरकार ने कश्मीर में संघर्ष विराम की घोषणा करते हुए अलगाववादी तथा आतंकवादी ताकतों के साथ बिना शर्त बातचीत करने की इच्छा जाहिर की थी। इसके उपरांत तो जैसे कश्मीरी पंडित संगठनों में फुर्ती आ गई। उन्होंने इस मांग को फिर से दोहराते हुए इसको लेकर आंदोलन की तैयार भी कर ली है।
 
हालांकि राज्य सरकार ने कश्मीरी विस्थापितों की घर वापसी के लिए जो योजनाएं बनाई हैं वे भी होमलैंड की तर्ज पर ही हैं जिन्हें सुरक्षित जोनों के रूप में जाना जा रहा है। सनद रहे कि राज्य सरकार चाहती है कि प्रत्येक जिले में कुछ सुरक्षित जोनों का निर्माण कर वहां कश्मीरी पंडितों के विस्थापित परिवारों को वापस लाकर बसाया जाए। कश्मीरी पंडित संगठनों द्वारा मांगे जा रहे होमलैंड तथा इन सुरक्षित जोनों में अंतर सिर्फ इतना है कि ये शायद ही जेहलम दरिया के किनारे नहीं होंगे।
 
फिलहाल स्थिति यह है कि कश्मीरी पंडित विस्थापित समुदाय होमलैंड की मांग को लेकर जिस आंदोलन की तैयारी में जुटा है उस कारण टकराव की पूरी संभावना है। हालांकि पनुन कश्मीर संगठन कहता है कि वे आंदोलन शांतिपूर्वक चलाना चाहते हैं।
 
साथ ही वे यह भी कहते हैं कि भारत सरकार उन लोगों को कभी कुछ भी नहीं देती है जो शांति के पथ पर चलते हुए कुछ मांगते हैं। और उनका कहना था कि हथियार उठाने वालों से तो बिना शर्त बात की भी घोषणा हो जाती है।
 
- सुरेश एस डुग्गर