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पत्थरबाजों का हौसला बढ़ाने वाले नेताओं से होती है निराशा

By डॉ. नीलम महेंद्र | Publish Date: Apr 20 2017 10:44AM
पत्थरबाजों का हौसला बढ़ाने वाले नेताओं से होती है निराशा

दो अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नैशनल हाईवे पर देश की सबसे बड़ी रोड टनल का उद्घाटन करते हुए कहा था कि यह केवल जम्मू और कश्मीर की दूरी कम करने वाली सुरंग नहीं विकास की लम्बी छलांग है और कश्मीर के युवा को अब टैरेरिज्म और टूरिज्म में से किसी एक को चुनना होगा। जवाब फारूख़ अबदुल्ला ने दिया, ''मोदी साहब से कहना चाहता हूँ कि बेशक टूरिज्म यहाँ की जीवन रेखा है लेकिन जो पत्थर बाज हैं उन्हें टूरिज्म से मतलब नहीं है, वो अपने देश के लिए पत्थर फेंक रहे हैं उन्हें समझने की जरूरत है।"

अभी कुछ दिन पहले सीआरपीएफ के जवानों के साथ कश्मीरी युवकों के हिंसक होने का वीडियो सामने आया था जिसमें जवानों ने हथियारों से लैस होने के बावजूद बेहद संयम का परिचय दिया। सेना और सरकार इन पत्थर बाजों की परवाह नहीं कर रही होती तो आत्मरक्षा के तहत इन पत्थर बाजों को ऐसा माकूल जवाब इन जवानों से अवश्य मिल गया होता कि भविष्य में कोई और कश्मीरी युवक पत्थर मारने तो क्या उठाने की हिम्मत भी नहीं करता लेकिन अगर जवानों की तरफ से इन पत्थर बाजों को जवाब नहीं दिया जा रहा तो केवल इसलिए कि हमारी सरकार इन्हें अपना दुश्मन नहीं अपने देश के ही नागरिक मानती है लेकिन यह लोग हमारे जवानों को क्या मानते हैं?
 
अबदुल्ला साहब से इस प्रश्न का उत्तर भी अपेक्षित है कि कश्मीर के नौजवानों को टूरिज्म से मतलब नहीं है यहाँ तक तो ठीक है लेकिन उन्हें टैरेरिज्म से मतलब क्यों है और आप जैसे नेता इसे जायज़ क्यों ठहराते हैं?
 
एक तरफ आप सरकार से कश्मीर समस्या का हल हथियार नहीं बातचीत के जरिए करने की बात करते हैं लेकिन कश्मीर के युवा के हाथों में बन्दूकें लिए टूरिज्म से ज्यादा टैरेरिज्म को चुनें तो आपको सही लगता है? शायद इसलिए कि आपकी राजनीति की रोटियाँ इसी आग से सिक रही हैं। यह कहाँ तक सही है कि हमारे जवान हथियार होते हुए भी लाचार हो जाएं और कश्मीर का युवा पत्थर को ही हथियार बना ले? यह इस देश का दुर्भाग्य है कि बुरहान जैसे आतंकवादी अपने ही देश के मासूम लोगों की जानें लेकर गर्व से उसकी जिम्मेदारी लेते हैं और वहाँ के यूथ आइकान बन जाते हैं लेकिन हमारे जवान किसी पत्थर बाज को आत्मरक्षा के लिए गाड़ी की बोनट पर बैठा कर पुलिस थाने तक भी ले जाते हैं तो इन पत्थर बाजों के मानवाधिकारों की दुहाई दी जाती है और सेना से सफाई माँगी जाती है।
 
अगर पत्थर बाज अपने देश के लिए पत्थर फेंक रहे हैं तो हमारे जवान किसके लिए पत्थर और गोलियाँ खा रहे हैं? अगर देश को पत्थर बाजों को समझने की जरूरत है तो क्या आपको देश और जवानों के सब्र को समझने की जरूरत नहीं है? अबदुल्ला साहब का कहना है कि आप लोगों को देश की परवाह है लेकिन पत्थर बाजों की नहीं तो क्या आप पत्थर बाजों को इस देश का हिस्सा नहीं मानते? हाल के चुनावों में वो कौन लोग थे जिन्होंने बन्दूक की नोंक पर कश्मीरी आवाम को वोट डालने से रोका? कश्मीर के युवा हाथ में बन्दूकें या पत्थर लेकर इस मुद्दे का हल चाह रहे हैं? यह तो कश्मीर के युवा को ही तय करना होगा कि वह और कब तक कुछ मुठ्ठी भर नेताओं के हाथों की कठपुतली बने रह कर अपनी उस जन्नत में बारूद की खेती करके उसे जहन्नुम बनाना चाहता है या फिर डल झील की खूबसूरती और केसर की खुशबू से एक बार फिर पूरे विश्व को अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है।
 
- डॉ. नीलम महेंद्र