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परिपक्वता मामले में राहुल के समकक्ष खड़े नजर आते हैं अखिलेश

By अजय कुमार | Publish Date: May 18 2017 12:15PM
परिपक्वता मामले में राहुल के समकक्ष खड़े नजर आते हैं अखिलेश

ऐसा लगता है कि समाजवादी पार्टी मे मुलायम युग खत्म होने के बाद नये नेतृत्व ने राजनैतिक विचारधारा को तिलांजलि देकर आक्रमण को अपना सियासी हथियार बना लिया गया है। हर मुद्दे पर हंगामा खड़ा करना अगर समाजवादी मकसद बन जायेगा तो इससे न तो प्रदेश का भला होगा न ही पार्टी को फायदा पहुंचेगा। आश्चर्य तो इस बात का है कि विधान सभा चुनाव के समय भी सपा नेतृत्व ने इसी तरह की आक्रामकता दिखाई थी और उसको इसका जर्बदस्त खामियाजा भुगतना पड़ा था, सत्ता तो गई ही हार भी शर्मनाक हुई। मगर सपा नेतृत्व इससे सबक लेने को तैयार ही नहीं है।

कभी−कभी तो यही लगता है कि राहुल गांधी तो नाहक ही बदनाम हैं। अखिलेश यादव भी परिपक्वता के मामले में राहुल के समकक्ष ही खड़े नजर आते हैं। राहुल की ही तरह से अखिलेश के पास भी न तो कोई विजन है न ही किसी विषय पर गंभीर चर्चा करने की योग्यता। वह जनता की नब्ज पहचानते हैं। हर समय ठिठोली करके कुछ हासिल नहीं किया जा सकता है। दुख तो इस बात का है अखिलेश अपने पिता से कुछ सीखने को ही तैयार नहीं हैं। जब से अखिलेश अपने आप को मुलायम से भी बड़ा नेता समझने लगे हैं तभी से अखिलेश के पतन का ग्राफ भी नीचे की ओर खिसकता जा रहा है।
 
सपा में मुलायम युग की समाप्ति के बाद लगता है कि पार्टी मुट्ठी भर लोगों का ऐसा समूह बन गया है जो सिर्फ उद्दंडता करना ही जानता है, इस समूह का नेतृत्व अखिलेश यादव करते हैं। अखिलेश यादव और उनकी टीम के सदस्य यही नहीं समझ पा रहे हैं कि योगी सरकार के हाथ में कोई जादू की छड़ी नहीं है जिसे घुमाते ही प्रदेश सभी समस्याओं से मुक्त हो जायेगा। मुलायम सिंह यादव कहते हैं कि किसी सरकार के कामकाज की समीक्षा के लिये उसे कम से कम छह माह का समय दिया जाना चाहिए लेकिन अखिलेश ने पिता की नसीहत को अनदेखा करके अपनी सरकार के समय के पाप को धोने के लिये योगी सरकार पर कीचड़ उछालने का रास्ता चुनना ही बेहतर समझा। 
 
पहले दिन से ही अखिलेश ने किसी न किसी बहाने से योगी सरकार को घेरना शुरू कर दिया। अखिलेश ने यह सिलसिला ईवीएम (इलेक्ट्रानिंग वोटिंग मशीन) की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के साथ शुरू किया था जिस पर वह धीरे−धीरे झूठ का आवरण उढ़ाते चले गये। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सही कह रहे हैं कि प्रदेश के जमीनी हालात बदले इसके लिये एक वर्ष का समय सरकार को दिया जाना चाहिए। दो माह में किसी सरकार के खिलाफ कोई मुद्दा नहीं बनाया जा सकता है, इसीलिये सरकार को घेरने के लिये अखिलेश टीम ने कानून व्यवस्था को ही मुद्दा बना दिया। अखिलेश जानते हैं कि कानून व्यवस्था के नाम पर वह हंगामा भले ही खड़ा कर लें, मगर अब जुर्म करने वाले आजाद नहीं घूम पा रहे हैं। उन्हें सरकारी संरक्षण भी नहीं मिल रहा है।
 
इसी तरह से किसानों का कृषि ऋण माफ करने में आने वाली व्यवाहारिक दिक्कत को भी अखिलेश समझने को तैयार नहीं हैं। 36.359 हजार करोड़ के कृषक ऋण माफ करने का फैसला योगी सरकार ने पहली कैबिनेट बैठक में ही ले लिया था। ये फैसला सियासी दांव के तौर पर तो बहुत अच्छा था, मगर अर्थशास्त्र के नजरिए से बेहद घातक कदम है। इससे बैंकिंग सेक्टर पर भारी बोझ पड़ना तय था। इसीलिये रिजर्व बैंक कायदे कानून का हवाला देकर अपनी असमर्थता जताने लगा। किसानों के कर्ज माफी की घोषणा खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान की थी, लेकिन केन्द्र सरकार ने इसके लिये योगी सरकार को कर्ज देने से इंकार कर दिया था, इसके बाद बैंक बांड के माध्यम से योगी सरकार ने बैंकों को होने वाले नुकसान की भरपाई का आश्वासन दिया था, जिसमें बैंकों ने पेंच फंसा दिया। लेकिन यह इतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी अखिलेश द्वारा बनाई और दिखाई जा रही है। सरकारी कामकाज में कभी−कभी देरी हो जाती है। अच्छा होता कि अखिलेश दूसरों पर कीचड़ उछालने की बजाय अपनी हार के कारणों पर मंथन करते और परिवार में हो रही सिर फुटव्वल को रोकते।
 
इसी तरह से उत्तर प्रदेश की 17वीं विधानसभा के पहले ही दिन सदन में जिस तरह का आचरण समाजवादी नेताओं ने किया उसकी भी चौतरफा निंदा हो रही है। पहले दिन संयुक्त अधिवेशन में राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान विपक्षी विधायकों ने न केवल पोस्टर−बैनर लहराए, बल्कि सपा विधायाकों ने तो दो कदम आगे बढ़कर सीटियां तक बजाने का कारनामा कर डाला। सपा विधायक यहीं नहीं रूके राज्यपाल पर कागज के गोले तक फेंके गये। यह सब तब हुआ जब सदन की कार्यवाही का दूरदर्शन से सीधा प्रसारण हो रहा था। सपा विधायक मेजों पर चढ़कर राज्यपाल पर कागज के गोले फेंक रहे थे और उनके मार्शल उन्हें रोकने की कोशिश कर रहे थे। यह सब अखिलेश यादव की उपस्थिति में हुआ।
 
उद्दंडता का यह सिलसिला दूसरे−तीसरे और आगे के दिनों में भी चलता रहा। वैसे यह पहली बार नहीं जब किसी विधानसभा में हंगामा अपनी हदें पार कर गया दिखा हो। शायद ही विधान सभा का कोई सत्र ऐसा जाता होगा जब विपक्ष के हंगामे के कारण काम बाधित न होता हो। 1998 में तो खून−खराबा तक देखने को मिला था। विधायकों ने मेजों पर लगे माइक उखाड़ कर एक−दूसरे पर हमला किया था। कभी−कभी तो लगता है कि राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान हंगामा खड़ा करना विपक्ष का मकसद बन गया है।
 
ऐसी स्थितियां लोगों के सामने चुने गए प्रतिनिधियों की विपरीत छवि सामने रखती हैं और जाहिर है इससे उन लोगों की उम्मीदों को धक्का पहुंचता है जो अपने अमूल्य मतों से उन्हें चुनते हैं। राज्यपाल के पद की अपनी मर्यादा है और उनके सम्मान की रक्षा पूरे सदन का दायित्व है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि विपक्ष ने अपनी भूमिका का निर्वहन जिम्मेदारी से नहीं किया। इस तरह की घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में एक सहज सवाल भी खड़ा होता है कि सत्ता में रहते हुए जो तौर−तरीके गलत कहे जाते हैं, विपक्ष की भूमिका में आखिर उन्हें ही जायज क्यों मान लिया जाता है। किसी राज्यपाल को बोलने से रोकने के लिए हंगामा करके आखिर क्या संदेश देने की कोशिश की जाती है। किसी न किसी दल को इसको बदलने की शुरूआत करनी ही पड़ेगी, निश्चित ही सदन को शांतिपूर्वक चलाने की जितनी जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की है, उतना ही दायित्व विपक्ष का भी है। अगर विपक्ष तर्कसंगत बहस करेगा, जनता से जुड़ी समस्याओं को सदन में उठायेगा तो जनता को उसका साथ मिलेगा और सरकार को भी विपक्ष द्वारा उठाये गये मुद्दों का ईमानदारी से जवाब देना पड़ेगा। अन्यथा विपक्ष योगी सरकार के सामने बौना ही नजर आयेगा।
 
- अजय कुमार