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भारत के लिए शी जिनपिंग के 'ताकतवर' होने का अर्थ

By तरुण विजय | Publish Date: Oct 30 2017 11:00AM
भारत के लिए शी जिनपिंग के 'ताकतवर' होने का अर्थ

विश्व के इतिहास में ऐसा विरला ही उदाहरण मिलता है, जब एकाधिकार वाली पार्टी के प्रमुख के नाते कोई राज्याध्यक्ष इतनी अधिक शक्ति से संपन्न हो जाये, जितना कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हुए हैं। शी न सिर्फ पार्टी के कार्यकारी प्रमुख अर्थात् महासचिव हैं, बल्कि सैन्य आयोग के अध्यक्ष भी हैं, अनुशासन आयोग के भी अध्यक्ष हैं और चीन के सबसे बड़े सैन्य तथा वैचारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के भी प्रमुख हैं। वे इस बात के लिए भी जाने जाते हैं कि पिछले छह वर्षों में 15 लाख चीनी विशेष, अधिकारियों, व्यापारियों तथा नेताओं को उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोप में दंडित किया है तथा जेल में डाला है। इसमें 2 लाख से अधिक की संख्या केवल वरिष्ठ राजनेताओं की है और ये राजनेता सामान्य स्तर के नहीं हैं, बल्कि उस स्तर के हैं, जैसे गृह मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, उद्योग सचिव, गृह सचिव अथवा वहां के सबसे महत्वपूर्ण पोलित ब्यूरो के अध्यक्ष आदि शामिल हैं। अगर उदाहरण देना हो, तो यह दे सकते हैं कि शंघाई और बीजिंग जैसे क्षेत्रों के सर्वाधिक प्रभुत्व और शक्ति से संपन्न कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्षों को न केवल उनके पदों से हटाया, बल्कि उन्हें जेल में भी डाल दिया। ये सब भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के अंतर्गत हुआ। 

शी जिनपिंग चीन के तीसरे ऐसे नेता बने हैं, जिनके विचारों को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में शामिल किया गया है। यह बात समझना जरा कठिन होगा। चीन में माओ त्सेतुंग सर्वाधिक विराट एवं प्रभावशाली क्रांतिकारी नेता के रूप में स्थापित हैं। उनके विचारों को वाद में नहीं तब्दील किया गया। कम्युनिस्ट पार्टी में वाद के रूप में केवल लेनिनवाद और मार्क्सवाद, ये दो ही स्थापित हैं। इनके अलावा कोई तीसरा इतना महत्वपूर्ण नहीं बना या बनाया गया, जिसके विचारों को वाद के रूप में स्थापित किया जा सके। उदाहरण के लिए ट्रॉटस की कम्युनिस्ट आंदोलन में सोवियत संघ के लेनिन के समर्थक ही एक बड़े वैचारिक क्रांतिकारी नेता हुए, लेकिन ट्रॉटसकी के विचारों को कभी वाद के रूप में स्थापित नहीं किया गया, बल्कि ट्रॉटसकी के विचार ही बने रहे, जो अवधारणा के स्तर पर माने गये। 
 
लेनिन और मार्क्स के बाद जिस किसी की पहली वैचारिक स्थापना हुई, तो वह थे माओ त्सेतुंग। माओ त्सेतुंग के विचारों को माओ के विचार कहकर स्थापित किया गया। ये पहले ऐसे नेता थे, जिनके विचार चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में समाहित किये गये। यह भारत के लोकतंत्रवादियों को समझ में आना थोड़ा अजीब लगेगा। पार्टी के संविधान में पार्टी के नेताओं के विचारों को सम्मिलित करना, कम्युनिस्ट आंदोलन की यह विशेषता है। माओ त्सेतुंग के विचारों की स्थापना के बाद दूसरे नेता यदि हुए, जिनकी अवधारणाओं को कम्युनिस्ट पार्टी में स्थापित किया गया है, वे थे तंग श्याओ फंग। फंग ने चीन की कायाकल्प कर दी और उन्होंने ही चीनी विशिष्टताओं के साथ समाजवाद शब्द का उपयोग किया। यह मार्क्सवाद से भिन्न अवधारणा है। इसे चीन की आंतरिक आवश्यकताओं, आर्थिक उद्देश्यों तथा सामाजिक परिवर्तन के साथ ढाला गया। तब इसे कहा- चीनी विशिष्टताओं के साथ समाजवाद। लेकिन, जब तक फंग जीवित रहे, तब तक उनके विचार चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का हिस्सा नहीं बने। यहां एक फर्क और समझना होगा कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में फंग के विचार नहीं, बल्कि अवधारणाएं शामिल की गयीं। और अवधारणा का अर्थ विचार से निम्न माना जाता है। इस तुलना में शी जिनपिंग चीन के पहले ऐसे विराट स्तर के नेता बनकर उभरे हैं, जो अपने कद, अपने प्रभाव और कम्युनिस्ट पार्टी पर वैचारिक पकड़ की दृष्टि से फंग से भी बढ़कर माओ त्सेतुंग के बराबर स्थापित हो गये। 
 
तंग श्याओ फंग के बाद अगर चीन के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन को सर्वाधिक किसी ने प्रभावित किया है, तो वे हैं शी जिनपिंग। दो प्रकार से उन्होंने अपनी राजनीति को धार दी। पहला उन्होंने चीन के इतिहास का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाया। हम भ्रष्टाचार से परिचित हैं। भारत में अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार को लेकर कार्रवाई कर रहे हैं, तो उस पैमाने पर अगर चीन के आंदोलन को देखेंगे, तो वह कई गुना अधिक बड़ा माना जायेगा। शी ने एक प्रकार से अपने राजनीतिक जीवन का बड़ा खतरा मोल लिया, जब उन्होंने प्रशासन-शासन और राजनीतिक दलों में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक क्षमाहीन, दयाहीन और निर्मम अभियान छेड़ा। इसमें कई प्रकार के उन्होंने प्रयोग किये। परिणामत:, भले ही वहां भ्रष्टाचार पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन चीन का प्रशासनिक तंत्र राजनीतिक नेतृत्व की सोच के अनुसार नतीजे देने लगा। आज चीन सन् 2050 तक अमेरिका को पीछे छोड़कर विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने की दौड़ में तेजी से आगे बढ़ने लगा है। 
 
शी जिनपिंग जिस पद्धति से पुन: राष्ट्रपति चुने गये हैं, उसका परिणाम केवल वहां के राजनीतिक और सामाजिक जीवन पर ही नहीं होगा, बल्कि विश्व स्तर पर भी इसका असर होने वाला है। सवाल यह है कि भारत को चीन के इस नये शक्तिसंचय तथा ताकतवर शी जिनपिंग के प्रभाव को किस दृष्टि से देखना चाहिए? भारत के लिए शी जिनपिंग का उभार का क्या अर्थ है? यह अर्थ भारत की अपनी आर्थिक शक्ति एवं सैन्य शक्ति की तैयारी के आलोक में ही देखा जा सकता है। चीन के साथ लंबी दूरी की यात्रा के संकेत भारत की सफल विदेश नीति (डोकलाम के संदर्भ में) से मिलते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए तैयारी और व्यापार तथा सांस्कृतिक संबंधों में आगे बढ़ते हुए वार्ता के माध्यम से विवाद हल करने की मोदी नीति ही चीन के साथ लंबी दूरी की यात्रा के सही पथ-दर्शक सिद्धांत कहे जा सकते हैं।
 
- तरुण विजय