Prabhasakshi
शुक्रवार, जनवरी 19 2018 | समय 05:26 Hrs(IST)

समसामयिक

नया साल अंग्रेजों का है, कहने वालों अंग्रेजों की और भी चीजें छोड़ दो

By देवेंद्रराज सुथार | Publish Date: Jan 1 2018 2:26PM
नया साल अंग्रेजों का है, कहने वालों अंग्रेजों की और भी चीजें छोड़ दो

बेंजामिन फ्रैंकलिन का कथन है- बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता। समय का इंतजार इंसान तो कर सकता है लेकिन समय इंसान का इंतजार नहीं कर सकता। समय का प्रवाह अविरल है। इंसान के पास धरती पर रहने के लिए सीमित समय है। यह इंसान के विवेक और बुद्धि पर निर्भर करता है कि वो इस समय का सदुपयोग करता है या दुरुपयोग। समय मुट्ठी में बंद रेत की तरह फिसलता जाता है। दरअसल, वक्त को जाते वक्त नहीं लगता। दीगर, यह भी सच्चाई है कि हर इंसान को अपना अतीत सुहाना लगता है। बहरहाल बातों ही बातों में एक ओर साल हमसे विदा हो गया और नववर्ष 2018 आ गया।

किन्हीं के लिए साल 2017 जल्दी-जल्दी गुजरा होगा तो किन्हीं के लिए विलंब से बीता होगा। जिनके लिए बुरा रहा है उन्हें अपना यह अतीत भूलकर आने वाले कल के बारे सोचना होगा। क्योंकि यह नववर्ष नये उत्साह, उमंग, हर्ष, नव निर्माण व नूतन संकल्पों का पावन प्रसंग है। यह हमें बीते साल की गलतियों व भूलों को सुधार कर जीने का एक नया अवसर प्रदान करता है। बेशक, नववर्ष कई बेहतर की तलाश करने का माध्यम है। नववर्ष अपने आलिंगन में हरेक के लिए कुछ न कुछ नयी सौगातें, सपने एवं अवसर समेटकर लाता है। जिन्हें पूरा करने का हमें इस दिन संकल्प लेना होता है। नववर्ष महज महंगे-महंगे होटलों में शराब के नाम पर बेशुमार पैसों का अपव्यय करने का दिन मात्र नही हैं अपितु ये तो पुराने साल का विश्लेषण व आने वाले साल के इस्तक़बाल का अहम समय है। जहां इंसान को सोच-समझकर नववर्ष में अपने को बेहतर तरीके से दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करना है। या यूं कहे तो नववर्ष सपनों व आशाओं का आशियाना है। जहां गरीब से लेकर अमीर तक नये सपने और नयी आशाओं को अपने उर में पालते है। 
 
नववर्ष में आशा की जानी चाहिए कि देश से गरीबी का कीचड़ साफ हो जाए, भ्रष्टाचार का भूत शिष्टाचारियों को सताना बंद कर दे, महंगाई डायन सरकार के काबू में आ जाए, आतंकवादियों का हृदय परिवर्तन हो जाए और वे आतंक का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण कर दें, नेता वायदों की कबड्डी खेलना बंद करें और देश के उत्थान का संकल्प लें, युवा पीढ़ी फैशन और व्यसन से हाय-तौबा करके आदर्श नागरिक बनकर देश के नव निर्माण में अपनी किंचित मात्र ही सही आहुति प्रदान करे, घरेलू हिंसा का दौर थमे, कोई फुटपाथ पर सोने को मजबूर न हो और किसी का आत्मगौरव व आत्मविश्वास शर्मिंदा न हो, सबके भुजबलों में इतनी शक्ति व सामर्थ्य जगे कि वे जीवन की हर परिस्थिति का पूरे जोश के साथ मुकाबला कर सकें, बुजुर्गों का हर घर में सम्मान हो और बहुओं को दहेज के नाम पर नहीं जलाया जाए। हर समस्या का समाधान हो और हर कोई जीवन के प्रति बेहद ही सकारात्मक व आशावादी दृष्टिकोण से सोचना-देखना शुरु कर दे। 
 
ज़िंदगी का मतलब दुःखों का घर है। यहां महज गरीब ही नहीं अमीर भी अपने-अपने दुःखों से परेशान हैं। ऐसे में हालातों और जीवन की विषमता से घबराकर नहीं अपितु साहस और हिम्मत से लड़कर-भिड़कर हाथों की तकदीर और माथे के मुकद्दर को परिवर्तित करने का संकल्प लेना होगा। कुछ छद्म राष्ट्रवादी और कट्टरपंथी यह भी कहते और सुने जा सकते हैं कि यह नववर्ष अंग्रेजों का दिन है। इसे भारतीयों को मनाने से बचना चाहिए। हाँ, यह सच है कि यह नववर्ष अंग्रेजों का ही है। क्योंकि यह ग्रेगोरियन कैलेंडर पर आधारित है। लेकिन, यहां विरोधाभास यह भी है कि अंग्रेजों का तो हमारे पास बहुत कुछ है हम उसको त्यागने की कभी जरुरत महसूस नही करते। और वैसे भी इंसान को जहां कहीं से भी अच्छी व सच्ची बातें सीखने को मिलें उसे अपने व्यावहारिक जीवन में अंगीकार करते जाना चाहिए। 
 
जहां एक दिन पूरी दुनिया नववर्ष को लेकर खुशियों का उत्सव मना रही हो तो वहां हमें भी पीछे नहीं रहना चाहिए। नववर्ष ऐसे समय में दस्तक देता है जहां शीतलहर व समुन्द्र के ठंडे होते जल के कारण कई जीव-जंतु बेमौत मर रहे होते हैं। लेकिन इसी विषम व दुःख की घड़ी से निकल कर हर परिस्थितियों से लड़ने का साहस बांधने के लिए विश्व के हर कोने में नववर्ष मनाया जाता है। नववर्ष को लेकर साहित्य जगत के कवियों व लेखकों ने भी नये साल को नये उत्सव के विशेषणों से सुशोभित किया है। और इसी तरह हालावादी कवि हरिवंश राय बच्चन की यह पंक्तियां आज भी नववर्ष को सारगर्भित रूप से हर किसी के समक्ष प्रस्तुत करती प्रतीत होती हैं- नव वर्ष, हर्ष नव, जीवन उत्कर्ष नव। नव उमंग, नव तरंग, जीवन का नव प्रसंग। नवल चाह, नवल राह, जीवन का नव प्रवाह। गीत नवल, प्रीति नवल, जीवन की रीति नवल, जीवन की नीति नवल, जीवन की जीत नवल ! अभी तो मीलों चले हम और हमें मीलों चलना है। क्योंकि चलना ही नियति है।
 
- देवेंद्रराज सुथार