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बालिग होने से पहले ब्याह दी जाती है चार में से एक लड़की

बालिग होने से पहले ब्याह दी जाती है चार में से एक लड़की

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के ठीक एक दिन पहले केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के परिणाम बेहद चिंतनीय होने के साथ ही चौंकाने वाले भी हैं। लाख प्रयासों के बावजूद आज भी देश में चार में से एक लड़की कम उम्र में ही ब्याह दी जाती है। देश के कुछ हिस्सों खासतौर से पश्चिम बंगाल में तो 40 प्रतिशत से अधिक बालिकाओं की शादी 18वें बसंत के पहले ही हो जाती है। पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में तो यह आंकड़ा 46 प्रतिशत को पार कर रहा है। जारी सर्वे रिपोर्ट के अनुसार देश में 27 फीसदी लड़कियों की शादी कानूनी प्रावधानों के अनुसार निर्धारित आयु 18 वर्ष की होने से पहले ही हो जाती है। आजादी के सात दशक बाद भी बाल विवाह जैसी कुरीति से छुटकारा नहीं पाना सभ्य समाज के लिए उचित नहीं माना जा सकता। पिछले कई दशकों से बाल विवाह को रोकने के लिए सरकारी और गैरसरकारी संगठनों द्वारा निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

सरकार द्वारा कानूनी प्रावधान करके भी बाल विवाह पर रोक लगाने के प्रयास किए गए हैं। गांवों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और अन्य मशीनरी के माध्यम से भी बाल विवाह रोकने की समझाईश और प्रयास जारी है। इस सबके बावजूद अक्षय तृतीया, भड़ला नवमी, पीपल पूर्णिमा, देवशयनी एकादशी, राम नवमी, फुलेरा दोज, जानकी नवमी और ना जाने ऐसे कितने ही अबूझ मुहुर्तों में बाल विवाह होना सरकार के लिए सिरदर्दी से कम नहीं है। यह हमारी समझ का भी फर्क है। हालांकि बाल विवाह के आंकड़ों में तेजी से कमी आई है। दस सालों में यह आंकड़ा 40 फीसदी से घटकर 27 फीसदी पर आ गया हैं। एक दूसरी तस्वीर सामने आने लगी है वह भी बेहद चिंतनीय है। कुछ प्रदेशों में कम उम्र में लड़कों की शादी में तेजी से बढ़ोतरी होने लगी है यह और भी अधिक चिंता की बात है। इससे कहीं ना कहीं सामाजिक ताने बाने में हो रहे बदलाव और लैंगिक विषमता भी एक कारण हो सकती है। हालांकि गाहे−बेगाहे शादी होने वाले बच्ची या बच्चे द्वारा भी बाल विवाह को रुकवाने की प्रशासन के सामने गुहार लगाई जाती है, इसके बावजूद भी चोरी छिपे बाल विवाह हो रहे हैं, इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता। यही कारण है कि अबूझ सावों के आसपास प्रशासन थोड़ा सक्रिय हो जाता है और प्रचार तंत्र को भी सक्रिय कर लोगों को बाल विवाह नहीं करने के लिए प्रेरित किया जाता है। 
 
सबसे ज्यादा बाल विवाह खासतौर से अक्षय तृतीया जिसे बोलचाल की भाषा में हम आखा तीज कहते हैं, के अवसर पर ही होते हुए देखे गए हैं। यही कारण है कि आखातीज के आसपास प्रशासन अधिक सक्रिय हो जाता है। बाल विवाह को रोकने के प्रयास किए जाते हैं। आखातीज पर होने वाले संभावित बाल विवाह को रोकने के लिए अधिकारियों को मुस्तैद रहने का संदेश दिया जाता है। इसके साथ ही बाल विवाह में शामिल होने वाले लोगों को चेतावनी भी दी जाती है कि बाल विवाह में शामिल होने वाले भी कानून के उल्लंघन के उतने ही दोषी हैं जितने बाल विवाह करने वाले। बाल विवाह में जाने वालों पर एक लाख रुपए के जुर्माने के साथ ही दो साल की जेल की सजा भी संभव है।
 
बाल विवाह को रोकने के लिए सरकार द्वारा सभी संभव तरीके अपनाए गए हैं। बाल विवाह से होने वाली हानि, बच्चों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव, कम उम्र में मां बनने से बच्ची के स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव, बच्चों को पढ़−लिख कर पहले अपने पांव पर खड़े होने या आत्म निर्भर बनने का अवसर देने आदि कई तरह की समझाइश की जाती रही है। इसी तरह से कानूनी प्रावधानों की जानकारी भी दी जाती रही है। अब तो शादी के निमंत्रण पत्र में वर वधू की उम्र लिखने के भी निर्देश हैं, यह दूसरी बात है कि इसकी पालना आंकड़ों में दिखाई नहीं दे रही है। समझाइश, स्वास्थ्य और समाज पर दुष्प्रभाव, बच्चों के भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव और अन्य कारणों से अवगत कराने के बाद भी बाल विवाह होना हमारे लिए शर्मनाक बात है। यह भी तथ्य है कि अधिकतर बाल विवाह गांवों में होते हैं। ऐसे में पंच सरपंचों, समाज के प्रतिष्ठित नागरिकों और गांवों में कार्यरत सरकारी मशीनरी व गैरसरकारी संगठनों का विशेष दायित्व हो जाता है कि वे आगे आकर समाज को इस कुरीति से मुक्ति दिलाए और अबूझ सावों को बाल विवाह का अवसर बनने से रोके। आखिर समाज के सभी वर्गों का दायित्व अपनी जगह है। सरकार के साथ मिलकर इस कुरीति को रोकने के लिए आगे आना होगा।
 
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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