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जमीन का झगड़ा अदालतों के लिए सबसे बड़ा बोझ

जमीन का झगड़ा अदालतों के लिए सबसे बड़ा बोझ

सदियों से चली आ रही यह कहावत कि अधिकांश झगड़े जर, जोरू या जमीन के लिए ही होते हैं, आज भी प्रासंगिक बनी हुई है। इसका प्रमाण इससे भी मिलता है कि देश की अदालतों में आज भी सबसे अधिक मामलें जमीन को लेकर या यों कहे कि राजस्व विवादों को लेकर ही विचाराधीन हैं। जमीन का झगड़ा अदालतों के लिए सबसे बड़ा बोझ है। यह भी सही है कि दीवानी मामलों खासतौर से जमीन के मामलों का निपटारा होने में लंबा समय लगता है यहां तक की अदालतों की तारीख दर तारीख चक्कर काटते हुए पीढ़ियां गुजर जाती हैं। राजस्व मुकदमे एक बार न्यायालय में दाखिल हो जाते हैं तो फिर इस तरह के मकड़जाल में उलझ जाते हैं कि उससे निकलना मुश्किल हो जाता है। एक न्यायालय से जैसे−तैसे फैसला हो भी जाता है तो उससे उच्च अदालत में अपील हो जाती है और इस तरह से यह प्रक्रिया अनवरत चलती जाती है। कई मामलों में तो यहां तक देखा गया है कि अंतिम फैसले के इंतजार में पीढ़ियां गुजर जाती हैं।

पिछले दिनों बैंगलुरु की संस्था 'दक्ष' के एक सर्वेक्षण में उभर कर आया कि अदालतों में सबसे अधिक लंबित मामले खेती की जमीन के बंटवारे के हैं। अदालतों में सबसे अधिक काम का बोझ यदि कोई है तो वह जमीन के झगड़ों का है। इसमें भी मजे की बात यह है कि इस जमीन के झगड़े में सबसे ज्यादा उलझे हुए परिवारजन हैं यानी कि जमीन के झगड़ों में आधे से ज्यादा मामले परिवार के सदस्यों के बीच ही हैं। एक तथ्य यह भी उभर कर आया है कि जमीन के झगड़े में सबसे ज्यादा गरीब और पिछड़े हुए लोग फंसे हुए हैं। दक्ष संस्था ने दीवानी मामलों के सर्वेक्षण में पाया है कि कुल दीवानी मामलों में 66 फीसदी मामले तो केवल जमीन विवाद के हैं। इसके बाद 10 फीसदी मामले सामान्य पारिवारिक विवाद और पैसों को लेकर विवाद के तो केवल 8 फीसदी मामले ही विचाराधीन हैं। जहां तक जमीन के मामलों का प्रश्न है इनमें से 52 फीसदी मामले परिवार के बीच जमीन के विवाद को लेकर हैं। 23 फीसदी मामले गैर संबंधियों से हैं तो मालिक व कर्मचारी के बीच इस तरह के केवल 0.1 प्रतिशत प्रकरण दर्ज हैं। दक्ष के सर्वेक्षण से दूसरी बात यह उभर कर आई है कि गरीब लोग मुकदमों के जाल में अधिक फंसते हैं। आधे से अधिक मामले एक लाख से 3 लाख की वार्षिक आयवर्ग के लोगों के हैं। खेती से जुड़े काश्तकारों के 47 प्रतिशत मामले न्यायालयों में विचाराधीन हैं।
  
भारतीय न्याय व्यवस्था पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री की उपस्थिति में देश के सर्वोच्च न्यायालय के निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश का भावुक होना इस बात का तो संकेत है ही कि स्थिति कहीं ना कहीं गंभीर अवश्य है। देश के न्यायालयों में मुकदमों का अंबार लगा हुआ है। उच्च न्यायालयों में 49 लाख 57 हजार मुकदमें दर्ज हैं। इसी तरह से नीचे की अदालतों में करीब पोने 3 करोड़ मुकदमे विचाराधीन हैं। वर्ष 2014 में विधि आयोग के प्रतिवेदन में 10 लाख की आबादी पर 50 न्यायाधीशों की सिफारिश की गयी थी। यह तो दूर की बात है पर इस समय तो देश के उच्च न्यायालयों में आधे से कुछ ही कम पद न्यायाधीशों के खाली हैं। यानी कि 1056 में से 591 न्यायाधीश हैं। इसके अलावा निचली अदालतों में भी रिक्त पद चल रहे हैं। देश के न्याय के मंदिरों में काम का बोझ अत्यधिक है। इस देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भावुक मानने के स्थान पर स्थिति की गंभीरता और उनके दर्द को समझना होगा। अब तो देश के सभी राज्यों में लोक अदालतों का सिलसिला भी चल निकला है। प्रतिवर्ष इन लोक अदालतों में लाखों प्रकरण आपसी समझाइश से निपटाए जा रहे हैं। हालांकि राजस्थान में न्याय आपके द्वार अभियान चलाकर इस तरह के प्रकरणों के निस्तारण की दिशा में सार्थक प्रयास हुए हैं। राजस्व लोक अदालतों के माध्यम से 68 लाख से ज्यादा मामलों को आपसी समझाइश से निपटाया गया है और अच्छी बात यह है कि 5 सौ से अधिक ग्राम पंचायतें राजस्व विवादों से मुक्त हो चुकी हैं। अन्य प्रदेशों के लिए यह एक उदाहरण हो सकता है।
 
न्यायालयों में बढ़ते बोझ को कम करने के लिए न्यायपालिका और कार्यपालिका को साझा प्रयास करने होंगे। एक और जहां न्यायाधीशों के रिक्त पदों को भरना होगा वहीं दूसरी और सरकार व विधि आयोग को साझा प्रयास करते हुए प्रकरणों के शीघ्र निस्तारण के उपाय खोजने होंगे। दीवानी मामलों में तारीख दर तारीख मामले खिंचते रहते हैं जिससे समय व धन की बर्बादी को नकारा नहीं जा सकता। जब यह सामने आ चुका है कि जमीन के मामले सर्वाधिक विचाराधीन हैं तो सामान्य प्रकृति के मामलों के निस्तारण के लिए कानूनन सुधार किया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों के जल्दी से जल्दी निपटारे के लिए भूमि सुधार कानून की आवश्यकता है। इसी तरह से यह भी उभर कर आ चुका है कि जमीन के ज्यादातर विवाद परिजनों के बीच ही होते हैं तो इनकी प्रकृति का गंभीरता से अध्ययन कर पारिवारिक विवादों के शीघ्र निपटारे के प्रावधान कानून में करने होंगे। बार−बार तारीख लेने की प्रवृति को भी हतोत्साहित करना होगा। इसके साथ ही हमारी पुरानी परंपरा में भी इसका हल खोजने के प्रयास किए जा सकते हैं। पंचायतों के माध्यम से दोनों पक्षों को बैठाकर आपसी समझाइश कर मामलों के निपटारे के लिये प्रोत्साहित किया जा सकता है। संपत्ति के बंटवारे को लेकर होने वाले विवादों के निपटारे के लिए पंचायतों के माध्यम से गांव के बड़े−बुजुर्गों और परिवार के प्रभावशाली लोगों के माध्यम से आपसी समझाइश की जा सकती है। कई बार विवादों का निपटारा सामाजिक दबाव से बेहतर तरीके से हो सकता है। हमें हमारी पारिवारिक व्यवस्था को इस मायने में मजबूत करना होगा। आखिर लोक अदालत में भी आपसी समझाइश से ही तो मामलों का निस्तारण किया जाता है। इसके साथ ही पंच प्रधानों के प्रभाव से विवादों के निपटारे से एक और जहां न्यायालयों में मामलों का अंबार नहीं लगेगा वहीं न्यायालयों के चक्कर लगाने, धन व समय की बचत होगी। इसके लिए सभी वर्गों को आगे आना होगा। आशा की जानी चाहिए कि न्यायालयों के बाहर भी विवादों को निपटारे को प्रोत्साहित किया जाता है तो यह समाज और न्यायपालिका सभी के लिए आदर्श स्थिति हो सकती है।
 
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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