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दो मुख्यमंत्रियों की शिकायतों पर क्या गौर किया जायेगा?

दो मुख्यमंत्रियों की शिकायतों पर क्या गौर किया जायेगा?

पिछले दिनों देश के दो विपरीत छोर के राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने 'भारत' से गम्भीर शिकायतें कीं। जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने राष्ट्रीय मीडिया से अपील की कि वे टीवी पर ऐसी बहसें न दिखाएं जिससे कश्मीर के लोगों के प्रति देश में नफरत का प्रसार हो। वहीं मिजोरम के मुख्यमंत्री लालथन हावला ने एक इंटरव्यू में कहा कि वे खुद कई बार नस्लीय हिंसा का शिकार हुए हैं। एक बार उनसे एक आदमी ने यहां तक कह दिया था कि आप 'भारतीय' नहीं लगते। लालथन हावला ने इस तरह की टिप्पणी करने वालों को 'सुपीरियर मेंटेलिटी' से ग्रस्त बताया है जो देश को ठीक से नहीं जानते।

यहां यह याद रखना जरूरी होगा कि ये दोनों मुख्यमंत्री ऐसे राज्यों के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं जहां सेना को आफ्सपा के तहत दंड से मुक्ति प्राप्त है और जहां दिल्ली के खिलाफ जनभावनाओं का पुराना इतिहास रहा है। इसलिए, इन दोनों ही नेताओं के बयान बहुत हद तक उन राज्यों की अवाम की साझी शिकायतें मानी जा सकती हैं, जिसमें सामरिकता का पहलू भी स्वतः जुड़ जाता है। शिकायतें करने वाले राज्य में एक मुस्लिम बहुल है तो वहीं दूसरा उस पूर्वात्तर का हिस्सा है जहां 'मेनलैंड भारत' के आर्य नस्ल की बजाए मंगोलियाई नस्ल के लोग रहते हैं। इसलिए ये शिकायतें 'भारत' पर साम्प्रदायिक और नस्लीय होने के आरोप में भी बदल जाती हैं।
 
यूपी और बिहार जैसे हिंदी भाषी राज्यों जो राष्ट्रीय राजनीति को सिर्फ सबसे ज्यादा प्रभावित ही नहीं करते बल्कि जो उसे एक सवर्ण हिंदू चरित्र भी प्रदान करता है के गांवों में अब भी ऐसे लोगों की बड़ी तादाद मौजूद है जो यकीन करती है कि पूर्वोत्तर खास कर नागालैंड के लोग आदमखोर होते हैं और वो अपने बूढ़े और बीमार लोगों को मार कर खा जाते हैं। यह एक ऐसी अज्ञानता आधारित सर्वसुलभ जानकारी है जिसके इर्द−गिर्द बहुत सारी कहानियां प्रचलित हैं जिसे सुनने वाले के मन में नागालैंड के लोगों के प्रति स्वाभाविक रूप से नफरत पाई जाएगी। जाहिर है यह अज्ञानता एक ऐसा मानस तैयार करती है जो पूर्वोत्तर की किसी भी राजनीतिक समस्या के समाधान के विकल्प के तौर पर बातचीत के बजाए हिंसा को तरजीह देगी। क्योंकि उसकी समझ होती है कि पूर्वोत्तर के हिंसक और आदमखोर लोगों को बातचीत से नहीं समझाया जा सकता और उनसे किसी भी तरह की सहानुभूति तो रखी ही नहीं जानी चाहिए।
 
लालथन हावला जब भाजपा नेता तरूण विजय की उस टिप्पणी पर कि दक्षिण भारतीय लोग काले होते हैं, अपने इंटरव्यू में कहते हैं कि ऐसा कहने वाले यह नहीं जानते कि भारत के दक्षिणी हिस्से में द्रविण, उत्तरी हिस्से में आर्य और पूर्वोत्तर भारत में मंगोलियाई नस्ल के लोग रहते हैं, लेकिन वो हमारी कथित मुख्यधारा की भारत की सांस्कृतिक समझ पर सवाल उठा रहे होते हैं। उसी तरह हर उत्तर भारतीय चट्टी चौराहे पर हम कश्मीर विशेषज्ञ लोगों की भीड़ देख सकते हैं जो इस मुद्दे का सैनिक हल बता रहे होंगे। भले ही इस जटिल मुद्दे की समझ उनमें न हो। सबसे अहम कि ठोस ऐतिहासिक घटनाक्रमों के बजाए उसकी यह राय पॉपुलर फिल्मों और पॉपूलर मीडिया से निर्मित है जो उन्हें इस मुद्दे के राजनीतिक पहलू को समझाने के बजाए उसे बिना किसी पृष्ठभूमि के स्वतः पैदा हुई समस्या के बतौर दिखाता है जिसमें सिर्फ दोनों तरफ से बंदूकें चल रही हैं।
 
ये बहसें एक ऐसी हिंसक भीड़ का निर्माण कर रही हैं जो कश्मीर का हल सिर्फ जान लेने और जान देने में देखता है। इसीलिए जब महबूबा मुफ्ती यह अपील करती हैं कि भारतीय मीडिया ऐसी बहसें न दिखाए जिससे कि कश्मीरी अवाम के प्रति भारतीय अवाम में नफरत का संचार हो तब वो दरअसल इस मुद्दे के राजनीतिक हल में बाधा बन रही इस सैन्य मानसिकता को रोकने की गुजारिश कर रही हैं जिसे अनसुना किया जाना कश्मीर के लिए ठीक नहीं है।
 
शाहनवाज आलम
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और डॉक्यूमेंटरी फिल्मकार हैं)

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