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बिजनेस हाउस बनते जा रहे हैं स्कूल, छात्र-अभिभावक बेहाल

बिजनेस हाउस बनते जा रहे हैं स्कूल, छात्र-अभिभावक बेहाल

स्कूलों में प्रवेश का दौर शुरू होते ही शिक्षा के मंदिर व्यवसाय के केन्द्र बनने लगे हैं। सरकार के लाख प्रयासों व निर्णयों के बावजूद बच्चों के लिए किताबें, कापियां, ड्रेस सहित सभी सामग्री स्कूलों से ही लेने को बाध्य होना पड़ रहा है। लगता है जैसे स्कूल शिक्षा का केन्द्र नहीं बल्कि कापी−किताब, बस्ते, जूते, टिफिन, ड्रेस बेचने का मॉल हो। आखिर यह सब हो क्या रहा है? शिक्षा के मंदिर व्यापार के केन्द्र बनते जा रहे हैं। एक समय था जब वार्षिक परीक्षा के परिणाम आने के बाद स्कूलों में ग्रीष्मावकाश हो जाता था और नए सत्र में प्रवेश एक जुलाई को होता था, फिर जून के आखिरी सप्ताह में प्रवेश होने लगे और अब तो निजी स्कूलों में तो जनवरी में ही नए प्रवेश आरंभ हो जाते हैं, अभिभावकों के इन्टरव्यू का दौर शुरू होता है और भारी भरकम फीस के बावजूद यह आंक कर प्रवेश दिया जाता है कि बच्चे के पेरेन्टस में भी बच्चे को घर पर पढ़ाने की क्षमता है या नहीं। जैसे बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी स्कूल की ना होकर बच्चों के पेरेन्टस की हो।

अब तो वार्षिक परीक्षा के परिणाम के साथ ही नया सत्र आरंभ हो जाता है और प्रवेश के नाम पर फीस आदि की वसूली आरंभ हो जाती है। सरकार की लाख कोशिश और आरटीई के बावजूद फीस में बढ़ोतरी में कोई कमी नहीं हो रही है बल्कि प्रतिवर्ष उसमें बढ़ोतरी होती जा रही है। इस सबके अलावा नित नए नामों से बच्चों से राशि मंगवाई जाती है जो अलग। इसके अलावा शैक्षणिक टूर, विजिट, पिकनिक, वार्षिक समारोह और अन्य आयोजनों के नाम पर राशि ली जाती है वो अलग। आखिर पेरेन्टस की भी सीमा है। अब तो शिक्षण संस्थाओं द्वारा बच्चों से राशि एकत्रित करने के साथ ही बाहरी स्रोत से चंदा एकत्रित कर मेले आयोजित किए जाने लगे हैं जो अतिरिक्त आय का साधन बनते जा रहे हैं। पेरेन्टस के सामने अब तो निजी स्कूलों द्वारा बच्चों को ट्यूशन कराने की सलाह अलग से नई मजबूरी बनती जा रही है। देखा जाए तो स्कूलों में आज पढ़ाई को छोड़कर सभी कुछ हो रहा है। पढ़ाई अभिभावकों व ट्यूशन के भरोसे चलने लगी है।
 
यह कोई आज की समस्या नहीं है। यही कोई 25−30 साल पहले आई प्रोफेसर यशपाल कमेटी की रिपोर्ट में इन सबको गंभीर मानते हुए व्यावहारिक सुझाव दिए थे जो सरकारी फाइलों के बोझ तले कहीं दबे ही रह गए। अभी गए साल ही महाराष्ट्र हाई कोर्ट ने भी स्कूलों में बस्तों के बोझ को कम करने के निर्देश दिए थे। हाल ही में डॉ. सुब्रहमण्यम कमेटी ने भी शिक्षा नीति के लिए दिए सुझावों में इस बात पर भी ध्यान आकर्षित करते हुए सुझाव दिए हैं। डॉक्टरों, मनोवैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं यहां तक कि हमारे न्यायालयों ने बच्चों पर बढ़ते बस्ते के बोझ और शिक्षण संस्थाओं के व्यापारीकरण पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। यह कोई नई बात नहीं है बल्कि इस समस्या से सभी लोग वाकिफ होने के बावजूद हल निकालने से मुंह मोड़ते रहे हैं।
 
शिक्षा की इस दौड़ में बच्चों की मासूमियत खोती जा रही है। शिक्षा की दुकानों को छोड़ भी दिया जाए तो सरकारी स्कूलों में भी किताब−कापियों का बोझ कम नहीं है। एक सरकारी चैकिंग के दौरान ही यह उभर कर आया है कि 87 फीसदी स्कूल बैग तय मानक से अधिक भारी है। आखिर हम बच्चों को देना क्या चाहते हैं, शरीर पर शारीरिक बोझ, पढ़ाई का मानसिक बोझ, अभिभावकों की जिद के आगे अव्वल आने की होड़। इन सबके बीच बच्चे का स्वाभाविक शारीरिक व मानसिक विकास कहीं खोता जा रहा है। आज एलकेजी में जब हम बच्चे का दाखिला कराने जाते हैं तो शिक्षा की निजी दुकानों में पिक्टोरियल के नाम पर किताब−कापियों का ढेर थमा दिया जाता है। इसके अलावा बच्चे का टिफिन और यहां तक की पानी की बोतल का बोझ तक उसे ढोना पड़ता है। इस सबके बाद स्कूल में किस मंजिल पर बच्चे की कक्षा है वहां तक इस बोझ का ढोना पड़ता है। हालांकि अध्ययन सामग्री को ढोना कहना अपने आप में गलत है और इसके लिए शर्मिंदा होने के बावजूद जो हकीकत है उसकी तस्वीर बयां की जा रही है।
 
यह कोई आज का मुद्दा नहीं है। समय समय पर अन्य प्लेटफार्म पर इस विषय पर गहन चिंतन और मनन होता रहा है। देश के न्यायालयों ने इसे गंभीर माना है। 2012 में दिल्ली उच्च न्यायालय और पिछले साल ही बंबई उच्च न्यायालय भी बस्ते का वजन 10 फीसदी तक रखने के निर्देश दे चुका है। यशपाल कमेटी की रिपोर्ट को भी नए सिरे से देखा जा सकता है। केन्द्रीय विद्यालयों के संगठन और सीबीएसई की रिपोर्टों का नए सिरे से अध्ययन किया जा सकता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों की राय ली जा सकती है। अब तो समय के साथ काफी बदलाव भी आया है। ऑडियो−विजुअल के माध्यम से बच्चों को शिक्षा दी जा सकती है। कब तक मोटी−मोटी किताबों को बैग में रखकर स्कूल लाने का चलन चलता रहेगा यह विचारणीय है। एक जानकारी के अनुसार शिक्षा की दुकानों में मोटी कमाई के चक्कर में बैग का बोझ बढ़ता जाता है पर सरकारी स्कूलों में भी स्कूल बैग का बोझ कोई कम नही है। सीबीएसई के अनुसार कक्षा दो के बैग का वजन ज्यादा से ज्यादा दो किलो और कक्षा चार तक तीन किलो तक होना चाहिए। पर हकीकत कुछ और ही है। यहां तक की बच्चों के बैग का वजन कक्षानुसार पांच किलो से लेकर 10−12 किलो तक होता जा रहा है। परिणाम सामने है बच्चों में सिरदर्द, रीढ़ की हड्डी का दर्द आदि आम होता जा रहा है।
 
शिक्षा व्यवस्था के इस दर्द को मीडिया ने भी आगे आकर समझा है और इस तरह के मुद्दे प्रमुखता से उठाए हैं। ऐसे में अब केन्द्र व राज्य सरकारों और शिक्षाविदों को बैठकर इसका कोई ठोस हल खोजना होगा नहीं तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी। समय रहते ऐसा नहीं हुआ तो शिक्षण संस्थाएं पूरी तरह से व्यापारिक प्रतिष्ठान बन कर रह जाएंगी।
 
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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