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समसामयिक

क्या कानून का डर तीन तलाक से दिला पाएगा निजात?

By संज्ञा पाण्डेय | Publish Date: Dec 30 2017 12:51PM
क्या कानून का डर तीन तलाक से दिला पाएगा निजात?

2017 का साल कई मायनों में खास रहा है, इसने भारतीय राजनीति के बड़े फेरबदल देखे हैं, इसी कड़ी में साल के अंतिम दिनों में सरकार ने लोक सभा में तीन तलाक पर एक नए बिल को ला कर एवं ध्वनि मत से पारित करा कर एक नई बहस को जनम दिया है। जहाँ एक और भाजपा इसको महिला उत्थान से जोड़ कर देख रही है वहीं मुस्लिम पार्टियाँ इसको सिरे से ख़ारिज करती नजर आ रही हैं। लेकिन अन्य राजनितिक दल जैसे प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस पर बीच का रुख अख्तियार करती दिख रही है और इस बिल में कुछ सुधार की बात कर रही है वहीं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी अपने वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए बिल पर चुप्पी साधे हुए हैं।

किन्तु प्रश्न यह है कि क्या ये बिल वास्तव में महिलाओं की भलाई को ध्यान में रख कर लाया गया है? अगस्त 2017 में सायरा बानो बनाम भारत सरकार केस सुप्रीम कोर्ट ने 3-2 से फैसला देते हुए तीन तलाक को अवैध घोषित किया था जो मुस्लिम महिलाओं के लिए एक बड़ा फैसला रहा था। मुस्लिम महिलाओं की ये लड़ाई काफी लम्बी रही है जो 1985 में शाह बनो के मामले से आरम्भ हुई थी। अब जो बिल लोक सभा में पास किया गया है उसके अनुसार जो भी पुरुष अपनी पत्नी को एक बार में तीन तलाक देगा उसे तीन साल की जेल होगी।
 
मामले के जानकर इस पर अपनी अलग अलग राय रख रहे हैं, जहाँ एक और कुछ समाज सुधारक महिलायें इसको मुस्लिम महिलाओं के हक़ में बड़ा फैसला बता रही हैं वहीं दूसरी तरफ कुछ विशेषज्ञ इसे महिला अधिकारों की राह का रोड़ा बताते हुए इसे शरियत को ही फिर से स्थापित करना मान रहे हैं।
 
यहाँ यह ध्यान में रखना भी जरूरी है कि कुरान में वास्तव में तलाक के सन्दर्भ में क्या कहा गया है। कुरान के सूरत-अत-तलाक में तलाक को बुरा कहा गया है और इसमें बहुत ही दुर्गम परिस्थितियों में ही तलाक देने की बात कही गई है और ये तलाक भी एक ही बार में नहीं दिया जा सकता है बल्कि इसमें तीन महीने का समय लेना होता है। किन्तु मुस्लिम धर्म गुरुओं ने इसे समय के साथ अपने अनुसार बदला है। जो महिलाओं के हक के खिलाफ रहा है।
 
सरकार द्वारा लाया गया यह बिल निःसंदेह महिलाओं के उत्थान के लिए सहयोगी होगा किन्तु इसका एक दूसरा पहलू भी है वो यह कि इस तरह के कानून समाज में लैंगिक असमानता को बढ़ावा देंगे। इनका दुरुपयोग भी हो सकता है। सजा गुनाह को कितना रोक पाती है ये हमेशा से विवाद का विषय रहा है इसलिए यह बिल भी तीन तलाक को रोक पायेगा यह कहना मुश्किल भी है और जल्दबाज़ी भी। इन सब बहसों के बीच मूल मुद्दा महिला सशक्तिकरण ही है जिसके लिए कई आवश्यक कदम उठाना अनिवार्य है जैसे महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता, उन्हें स्वावलम्बी बनाना और साथ ही समाज की सोच में बदलाव लाना।
 
-संज्ञा पाण्डेय
(लेखिका जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली में शोधरत हैं और महिला और सामाजिक मुद्दों पर कार्य कर चुकी हैं।)