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स्वास्थ्य

भागदौड़ भरे युग में महामारी बनती जा रही है अनिद्रा

By वर्षा शर्मा | Publish Date: Nov 25 2016 12:02PM
भागदौड़ भरे युग में महामारी बनती जा रही है अनिद्रा

'मुझे नींद नहीं आती' आपने अकसर लोगों को यह शिकायत करते सुना होगा। नींद एक जैविक प्रक्रिया है। हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त नींद बहुत ही जरूरी है। पर्याप्त नींद नहीं लेने से हमारी कार्यक्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है। अनिद्रा के शिकार लोगों को अकसर दिन में इधर−उधर झपकियां लेते देखा जा सकता है।

 
अनिद्रा आजकल एक महामारी की तरह फैलती जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक आज विश्व में हर पांचवां व्यक्ति अनिद्रा का शिकार है। अनिद्रा का अर्थ है नीद में व्यवधान, नींद उचटना या कम नींद आना। यह दो प्रकार की होती है। पहले प्रकार की अनिद्रा का संबंध उन लोगों से जिन्होंने कभी अच्छी, चैन की नींद का आनंद नहीं लिया हो तथा ये लोग तनाव, घबराहट या अन्य किसी असहनीय पीड़ा से पीडि़त न हो। पहली प्रकार की अनिद्रा से पीडि़त लोगों की नाड़ी की गति तेज तथा शरीर का तापमान अधिक होता है। इनकी बाह्य धमनियां प्रायः संकुचित होती हैं। ये लोग प्रायः हिलते−डुलते रहते हैं। दूसरे प्रकार की अनिद्रा का संबंध उन लोगों की अनिद्रा से है जो किसी न किसी बीमारी से पीडि़त होते हैं जैसे पेट में दर्द, पैरों में बेचैनी, थकान, स्पाइनल कॉर्ड में दर्द आदि। इन बीमारियों से नींद की प्रारंभिक अवस्था में बाधा पहुंचती है।
 
दूसरे प्रकार की अनिद्रा साइकेट्रीक, साइकोसिस तथा साइकोन्यूरोसिस के मरीजों में आमतौर पर देखी जा सकती है। डर तथा चिंता भी अनिद्रा के कारण हो सकते हैं। डिप्रेशन तथा मेनियक डिप्रेशन से भी अनिद्रा की शिकायत हो सकती है इससे सोने पर एक बार तो नींद आ जाती है परन्तु सुबह जल्दी आंख खुल जाती है तथा बाद में रोगी सो नहीं पाता। सन्निपात तथा कोई काल्पनिक डर भी अनिद्रा के कारण हो सकते हैं।
 
चिकित्सा की होम्योपैथिक शाखा के अंतर्गत अनेक ऐसी दवाइयां हैं जिनका प्रयोग अनिद्रा के उपचार के लिए किया जाता है। मरीज के लक्षणों के आधार पर कोई भी दवा उसे दी जा सकती है।
आर्सेनिक एलबम 30− यह दवा उन मरीजों को दी जाती है जो किसी मानसिक बेचैनी के कारण करवटें बदलते रहते हैं। वह शारीरिक रूप से इतना कमजोर होता है कि उसका चलना−फिरना भी मुश्किल होता है। मरीज को निरंतर मृत्यु का भय बना रहता है। वह इलाज के प्रति निराश हो चुका होता है। ऐसे रोगी को बार−बार थोड़े पानी की प्यास लगती रहती है।
 
केनाबिस इंडिका 30− यह उन रोगियों के लिए उपयुक्त होती है जो भय, भ्रांति तथा मानसिक दुर्बलता के शिकार होते हैं। ऐसे रोगी अकसर मरे हुए लोगों को सपने में देखते हैं। उन्हें लगता है कि वह पागल हो जाएंगे। ऐसा रोगी लगातार बोलता रहता है और सिर हिलाता रहता है। अकसर बोलते−बोलते वह यह भी भूल जाता है कि उसे आगे क्या बोलना है। विनम्र स्वभाव का व्यक्ति यदि उद्दण्ड स्वभाव हो जाए तो उसे यह दवा दी जाती है।
 
हायोसाइमस नाइगर 200− इसमें मरीज बहुत बातूनी और ईर्ष्यालु होता है। इस प्रकार का रोगी बहुत डरता है। उसे हर बात में डर लगता है जैसे अकेले रहने का डर, विष खिलाने का डर, किसी षड़यंत्र का डर आदि। बच्चों में नींद न आना, नींद आते ही डर जाना, बिस्तर से निकलने या भागने की कोशिश करना जैसे लक्षण होने पर यह दवा दी जाती है।
 
कैफिया क्रूडा 200− यह दवा उन रोगियों के लिए उचित है जिन्हें रात को नींद नहीं आती। वे अकसर भविष्य के बारे में चिंता करते रहते हैं। ऐसे रोगी अचानक ही हंसने या रोने लगते हैं ऐसे रोगियों को बहुत अधिक चिंता, बातचीत या मानसिक परिश्रम करने में सिर में तेज दर्द होता है।
 
एकोनाइटम नैपेलस 30− इसमें रोगी अकसर बैचेन रहता है जिससे उसे नींद नहीं आती। उसे इतना डर लगता है कि वह बेहोश भी हो जाता है। स्थित गिंभीर होने पर रोगी को मरने का डर लगने लगता है। रोगी अकसर डर के कारण घर से नहीं निकलता, भीड़भाड़ वाली जगहों से भी बचता है। उसे बार−बार पानी की प्यास भी लगती है।
 
इग्नेशिया अमारा 200− यह दवा उन रोगियों को दी जाती है जो शोक, भय या दुख की वजह से एकाएक बेहोश हो जाते हैं। उसे तम्बाकू या धुंआ सहन नहीं होता। उसके सिर में भी दर्द होता है। प्रेम या काम में निराशा से उत्पन्न अनिद्रा के लिए भी यही दवा कारगर होती है।
 
पोर्स फ्लोरा इन्कार्नेटा (क्यू)− वृद्धों तथा बच्चों में अनिद्रा दूर करने के लिए यह दवा कारगर सिद्ध होती है। यह दवा उन रोगियों की दी जाती है। जिन्हें तनाव और अत्यधिक मानसिक कार्य के कारण नींद नहीं आ पाती या सिर दर्द और आंखों में दर्द के कारण नींद नहीं आती।
 
किसी भी दवा के चुनाव से पहले रोगी के लक्षण पहचानना जरूरी होता है तथा किसी भी दवा के प्रयोग से पहले किसी विशेषज्ञ से सलाह लेना भी जरूरी होता है।
 
वर्षा शर्मा