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व्यंग्य

खिचड़ी अकबर को भी पसंद थी, मोदीजी को भी है (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Publish Date: Nov 22 2017 10:19AM
खिचड़ी अकबर को भी पसंद थी, मोदीजी को भी है (व्यंग्य)

हमारे यहां खिचड़ी के अनेक नाम, रूप व स्वाद प्रचलन में हैं। संस्कृत में ‘खिच्चा’ बंगाली ‘खिचुरी’ तमिल ‘पोंगल’ ब्रिटिश पैलेस में ‘केजरी’ कही जाने वाली खिचड़ी पहले से ही सेहत को बेहतर बना रही है। सभी तरह के डॉक्टर रोगी की स्थिति के अनुसार इसके सेवन की सलाह देते हैं। राजनैतिक, सामाजिक जीवन का तो महत्वपूर्ण राष्ट्रीय चारित्रिक हिस्सा है खिचड़ी। किसी योजना, ज़िम्मेदारी, काम, बात की खिचड़ी बना देना हमारे बाएं हाथ का राष्ट्रीय खेल है। पिछले कई दशक से हम मिलकर यही कर रहे हैं।

राजनीति, धर्म, जाति, सम्प्रदाय, शिक्षा, स्वास्थ्य, देश भक्ति, पर्यावरण, आतंकवाद, भ्रष्टाचार की हमने ऐसी खिचड़ी बनाई है कि देश का पूरा स्वास्थ्य बिगाड़ दिया है। विशेषकर पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए दो सौ कानूनों की प्रदूषित स्वार्थी खिचड़ी पका दी है। भारतवर्ष, भारत, हिन्दुस्तान, इंडिया और अब न्यू इंडिया के लोकतंत्र में हमारे देश प्रेमी नेता, योजना प्रेमी सरकारी अफसर व सहयोगी कर्मठ व्यवसायियों की तिकड़ी की खिचड़ी लाजवाब है।
 
भला हो इन प्रसिद्ध, शानदार, देश भक्त लोगों का जिनके राष्ट्रीय प्रयासों से विश्व खाद्य दिवस पर पुरानी खिचड़ी का नया मौसम आ गया है। अब खिचड़ी, खिचड़ी नहीं रहेगी। खिचड़ी का रुतबा बढ़ कर राष्ट्रीय खाद्य का हो गया है। इस बहाने राष्ट्रीय पहचानों की ख़ास जमात में इजाफा हो गया। वैसे पुरानी राष्ट्रीय पहचानों का क्या हाल है इसके बारे में बात नहीं करनी चाहिए, ‘कोई’ बुरा न मान जाए। वक़्त बहुत खराब चल रहा है, अपने शरीर से प्रेम करना लाज़मी है। भिन्नता की प्रतीक, कहीं इस खिचड़ी की संरचना राजनीतिक तो नहीं ?  
 
खिचड़ी के पुनर्जन्म के अवसर पर विश्व रिकार्ड बनने समेत नेक और अनेक काम निबटा लिए गए। विश्व खाद्य दिवस पर ऐतिहासिक इंडिया गेट के प्रांगण, गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स की प्रतिनिधि की उपस्थिति में अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शैफ संजीव कपूर के नेतृत्व में पकाई गई, जिसे बाबा रामदेव ने छौंक लगाया, केंदीय मंत्री ने भी हिलाया और विश्व से पधारे पांच दर्जन से अधिक कम्पनी प्रमुखों की प्लेट में सजाया। अब लगने लगा है कि देश की खाद्य समस्या हल हो गई है। जो पत्नियां परेशान रहती थीं क्या पकाऊं क्या खिलाऊं करती रहती थी उन्हें खिचड़ी बताएगी कि हमारे पारम्परिक खाद्य कितने स्वास्थ्य वर्धक हैं। 
 
रुकिए, आपका स्वाद बदलते हैं। अब जो खिचड़ी पकाई गई है इससे देश के बाज़ार में प्रतियोगिता बढ़ने वाली है। खिचड़ी मैगी से कुश्ती करेगी। डिज़ायनर खिचड़ी मार्किट में उतारी जाएगी जिसके कई वर्ज़न होंगे जैसे सिल्वर, गोल्डन व डायमंड जिसके वेरियंट होंगे तरल, थोड़ी सख्त, ज़्यादा सख्त जिसे आप स्थान, मूड व बीमारी के अनुसार खा सकेंगे। कुछ समय बाद खिचड़ी कई रंगों में उपलब्ध होगी जैसे लीवर येलो, फीवर ग्रीन। अनुसंधान के बाद बिलकुल नए स्वादों में बेची जाएगी। हो सकता है बड़े व्यावसायिक खिलाड़ी खिचड़ी के स्वास्थ्यवर्धक बिस्कुट, गोलियां, पेय व चाकलेट की तरह खिचलेट बाज़ार में ले आएं।
 
चैनल वाले देश की समस्याओं पर बात पर खिचड़ी न पकाकर खिचड़ी पर खिचड़ी करेंगे। विज्ञापनों की दुनिया में खिचड़ी बासमती से भी ज़्यादा छा जाएगी। पतंजलि वाले महा आयुर्वेदिक, योगिक क्रियाओं हेतु प्रेरित करने वाली हाईजिनिकली पैक्ड खिचड़ी ले आएंगे जिस पर लिखा होगा, राष्ट्रीय ऋषि माननीय नरेंद्र मोदी द्वारा मन से डिज़ाइनड, योग गुरु बाबा राम देव के शुभ करकमलों द्वारा छौंका गया राष्ट्रीय आहार जिसे बच्चे जवान वृद्ध सब करें प्यार। सुपाच्य, सरल, सुगम, सुस्वादु खिचड़ी को नेता दिखाने के लिए खाया करेंगे कभी सरकारी आयोजन में खानी पड़ी तो अपनी किस्मत को रोया करेंगे  कि क्या इसलिए राजनीति में आए थे। पत्नी जब चाहे बना कर रख देगी। पति भी सीख लेंगे। हो सकता है सरकार डिपो के माध्यम से खिचड़ी दिया करे। खिचड़ी नियमित खाई जाए तो गरीबी फेल हो सकती है और सेहत पास। शायद ज्यादा लोगों को पता नहीं होगा कि मध्यकालीन डिश खिचड़ी मुग़ल सम्राट अकबर की भी पसंदीदा थी, ‘न्यू इंडिया सम्राट’ मोदीजी की तो फेवरेट है ही। क्या मधुर सामंजस्य है। इधर नीति आयोग ने नीतिबद्ध अनुमानित घोषणा कर दी है कि सन २०२२ तक भारत गरीबी, गंदगी, आतंकवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, कुपोषण व भ्रष्टाचार मुक्त होगा। ऐसी खिचड़ी घोषणाएं बदहजमी करती हैं जिनके लिए कोई खिचड़ी काम नहीं करती। क्या खिचड़ी मांसाहारी भी हो सकती है ?
 
- संतोष उत्सुक