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व्यंग्य

कांग्रेसी संस्कृति के नये अध्याय (व्यंग्य)

By विजय कुमार | Publish Date: Jan 3 2018 3:33PM
कांग्रेसी संस्कृति के नये अध्याय (व्यंग्य)

डॉ. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ भारत के एक महान साहित्यकार थे। उनकी एक कालजयी पुस्तक है ‘संस्कृति के चार अध्याय’। चार मोटे खंडों वाली इस पुस्तक को पढ़ना और फिर समझना एक बड़ा काम है। जिन्होंने इस पुस्तक से साक्षात्कार किया है, वही इसे जान सकते हैं।

लेकिन पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश में संस्कृति का एक नया अध्याय लिखा गया। सुना है ‘मैडम कांग्रेस’ के अध्यक्ष राहुल बाबा जब वहां चुनावों में हुई दुर्गति की समीक्षा करने के लिए गये, तो बैठक स्थल पर एक विधायक महोदया की कुछ पुलिस वालों से मुठभेड़ हो गयी। राजनीति में ऐसा होना आम बात है; पर यह मुठभेड़ कुछ विशेष थी। मीडिया के अनुसार सबसे पहले विधायक महोदया ने एक महिला पुलिसकर्मी को थप्पड़ मारा। शायद वे भूल गयीं कि अब वे सत्ता में नहीं, विपक्ष में हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि सत्ता का गरूर आता तो बहुत जल्दी है; पर जाता बहुत देर से है। यहां भी ऐसा ही हुआ।
 
पर थप्पड़ खाकर वह पुलिसकर्मी क्यों चुप रहती ? आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो उसे भी है। उसने विधायक जी को दो थप्पड़ जड़ दिये। इसे हिन्दी में ‘जैसे को तैसा’, संस्कृत में ‘शठे शाठ्यम् समाचरेत’ और अंग्रेजी में ‘टिट फॉर टैट’ कहते हैं। थप्पड़ किसका अधिक जोरदार था, ये तो प्रत्यक्षदर्शी ही बता सकते हैं; पर राहुल बाबा ने कहा कि यह कांग्रेस की संस्कृति का हिस्सा नहीं है। हम प्यार में विश्वास रखते हैं, मारपीट में नहीं। यह सुनकर विधायक महोदया ने माफी मांग ली। 
 
इस प्रकरण से कांग्रेसी संस्कृति के स्वरूप पर बहस छिड़ गयी है; पर इसे ढूंढने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। सत्ता के लिए देश को बांटने का पाप इनके पुरखों ने ही किया था; पर आजादी के हर्ष में यह पाप दब गया। गांधी जी के नाम की माला जपते हुए गांधीवाद को कूड़े में डालने का धत्कर्म भी नेहरू ने ही किया था। वंशवाद को भारतीय राजनीति में मोतीलाल नेहरू लाए थे। यह बीमारी जवाहर लाल, इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी और मैडम इटली से होती हुई अब राहुल बाबा तक आ गयी है। उनकी देखादेखी छूत का यह खानदानी रोग अब सब घरेलू दलों में पहुंच गया है। 
 
संघ जैसे देशभक्त संगठन को राजनीतिक शत्रु मानकर कुचलने का षड्यंत्र भी कांग्रेस के ही नाम है। यद्यपि नेहरू, इंदिरा और फिर नरसिंहराव के प्रयास सदा विफल ही हुए। इस दौरान हजारों कार्यकर्ताओं को पीटा और मारा गया। सैंकड़ों कार्यालय लूटे गये। लाखों लोग जेल में डाले गये। संघ पर कीचड़ उछालने के लिए लाखों टन कागज काले किये गये; पर संघ हर अग्निपरीक्षा से और अधिक तेजस्वी होकर निकला। भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बनाने का श्रेय भी इन्हीं को है। ‘मूंदड़ा कांड’ को सबसे पहले इनके दामाद जी ने ही उठाया था। उस पर जो लीपापोती हुई, उससे भ्रष्टाचार का पतनाला ही बह चला। शायद ही कोई कांग्रेसी होगा, जिसने कुरसी पाकर भ्रष्टाचार न किया हो। कांग्रेस और भ्रष्टाचार एक दूसरे के पर्याय बन गये। बोफोर्स बाबू ने इसे लाइसेंस देते हुए बताया कि जिसे यहां भ्रष्टाचार कहते हैं, उसे विदेश में कमीशन कहा जाता है। बस तब से हर कांग्रेसी इसमें व्यस्त है। खेलों में भ्रष्टाचार हो या भ्रष्टाचार का खेल, ये उनकी संस्कृति का अभिन्न अंग बन चुका है।
 
पहले कांग्रेस में सरकार और पार्टी के मुखिया अलग होते थे। फिर दोनों पद एक ही के पास आ गये। जब भगवान ने दो हाथ, पैर, आंख और कान दिये हैं, तो दो पद क्यों न लें ? 1975 के आपातकाल में तो इंदिरा गांधी ने पूरे देश को ही जेल बना दिया था। कौन, कब, किस बात पर सलाखों के पीछे पहुंचा दिया जाएगा, किसी को पता नहीं था। तानाशाही इसे नहीं तो और किसे कहते हैं ? आग लगाकर उसे बुझाने का नाटक करना भी कांग्रेसी संस्कृति ही है। इंदिरा गांधी यदि भिंडरावाले का भूत खड़ा न करतीं, तो ऑपरेशन ब्लू स्टार न होता। उनकी हत्या के बाद राजीव बाबू ने कहा था कि बड़ा पेड़ गिरने पर धरती हिलती ही है। इससे दिल्ली में हुए सिखों के नरसंहार को कौन भूल सकता है ? राजीव बाबू ने ही श्रीलंका में लिट्टे नामक राक्षस को जगाया, फिर उसे मारने शांति सेना भेज दी। इस चक्कर में उन्हें खुद अपने प्राण देने पड़े। 
 
कांग्रेस की इस अति महान संस्कृति से संबंधित ऐसी बहुत सी बातें मेरे ध्यान में आयीं। हमारे प्रिय शर्मा जी पुराने कांग्रेसी हैं। मैंने सोचा ज्ञानवृद्धि के लिए उनसे मिलना ठीक रहेगा। मैंने जब उनके घर जाकर यह सब बताया, तो उन्होंने मुझे मारने को जूता उठा लिया। मैं जैसे-तैसे जान और इज्जत बचाकर घर आया। क्या थप्पड़बाजी और जूतमपैजार को ‘कांग्रेसी संस्कृति का पांचवां और छठा अध्याय’ कहना ठीक रहेगा ? लेकिन बड़ा प्रश्न यही है कि राहुल बाबा इसे मान्यता देंगे या नहीं ? 
 
-विजय कुमार