1. भाषा अभिव्यक्ति का साधन ही नहीं सांस्कृतिक सेतु भी है

    भाषा अभिव्यक्ति का साधन ही नहीं सांस्कृतिक सेतु भी है

    मातृभाषा के बिना, किसी भी देश की संस्कृति की कल्पना बेमानी है। मातृभाषा हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देश प्रेम की भावना उत्पन्न करती है। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस प्रत्येक भाषा की गरिमा को स्वीकार करने के लिए मनाया जाता है।

  2. एक लोकसंग्रही व्यक्तित्व कैलाश चंद्र पंत

    एक लोकसंग्रही व्यक्तित्व कैलाश चंद्र पंत

    पंत जी का लोकसंग्रही व्यक्तित्व इस मायने में बड़ा सजग संवेदनशील रहा है, उनके क्रियाकलाप, उनकी उपलब्धियां उसी से प्रेरित और संभव हुई हैं, यह देख पाना उन्हें करीब से जानने वालों के लिए तो सजग है ही, सामान्य जानकारों के लिए भी कठिन होना चाहिए।

  3. रोमन में हिंदी संदेश भेजने की आदत सबको पड़ गयी है

    रोमन में हिंदी संदेश भेजने की आदत सबको पड़ गयी है

    विज्ञापन का प्रयोग निर्माता अपनी वस्तु विक्रय के लिए हिन्दी भाषा व रोमन लिपि में करने लगे हैं जैसे कुरकुरे के लिए ''टेढ़ा'' है पर मेरा है'' को वे रोमन में लिखते हैं।

  4. हिंदी के प्रथम सेनापति के रूप में भी विख्यात हैं महर्षि दयानंद सरस्वती

    हिंदी के प्रथम सेनापति के रूप में भी विख्यात हैं महर्षि दयानंद सरस्वती

    हिमालय से कन्याकुमारी और कलकत्ता से लेकर बंबई तक भारत की जनता हिंदी समझती और बोलती भी थी लेकिन उसका नेतृत्व करने वाला कोई महापुरूष उस समय नहीं था। स्वामी जी ने यह गरिमामय नेतृत्व कदाचित सबसे पहले प्रदान किया।

  5. हर कामकाज में से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त की जाए

    हर कामकाज में से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त की जाए

    भाजपा सरकार संसद में एक विधेयक ऐसा लाए, जिसमें अंग्रेजी का सह-राजभाषा का पद समाप्त किया जाए। देश के हर कामकाज में से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त की जाए। यह मांग अपने आपको राष्ट्रवादी कहने वाले सांसद खुद क्यों नहीं करते?

  6. हिन्दुस्तानी से हिंग्लिश की ओर बढ़ते हुये बीता यह साल

    हिन्दुस्तानी से हिंग्लिश की ओर बढ़ते हुये बीता यह साल

    अनेक आंचलिक बोलियों और विभिन्न भाषाओं से मिलकर बनने वाली यह हिन्दी इस्तेमाल में हिन्दुस्तानी है और अब ज्ञान-विज्ञान के नये क्षेत्रों और अंग्रेजी के शब्दों के शामिल होने से हिंग्लिश की ओर बढ़ रही है।

  7. राष्ट्र को सुदृढ़ करने के लिए हिंदी को जरूरी मानते थे गांधीजी

    राष्ट्र को सुदृढ़ करने के लिए हिंदी को जरूरी मानते थे गांधीजी

    जहां तक भारत को एक देश, एक राष्ट्र के रूप में सुदृढ़ करने का सवाल था, उसके लिए गांधीजी राष्ट्रभाषा के बतौर हिंदी के पक्ष में सभी को प्रान्तीयता के मोह से ऊपर उठना आवश्यक मानते एवं बताते रहे।

  8. भाषा व्याकरण सम्मत हो तो सहज-सरल बनेगी हिंदी

    भाषा व्याकरण सम्मत हो तो सहज-सरल बनेगी हिंदी

    हिंदी को सहज-सरल बनाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि भाषा व्याकरण सम्मत होनी चाहिए। इसमें बोलचाल का सहज लहजा होना चाहिए। इसके लिए हमें उर्दू को आदर्श मानना चाहिए।

  9. अंग्रेजी सीखिये पर हिंदी को अपनी प्राथमिकता में रखिये

    अंग्रेजी सीखिये पर हिंदी को अपनी प्राथमिकता में रखिये

    जैसे हम आज के युग में अंग्रेजी भाषा को महत्त्व देते हैं वही स्थान हिंदी भाषा को क्यों नहीं दे सकते, जोकि हमारी राष्ट्र भाषा है। आज तो हिंदी तकनीकी रूप से भी बहुत सक्षम हो चुकी है।

  10. हिंदी का स्वाभिमान बचाने का समाचार-पत्रों का शुभ संकल्प

    हिंदी का स्वाभिमान बचाने का समाचार-पत्रों का शुभ संकल्प

    मध्य प्रदेश के हिंदी समाचार पत्रों ने अपनी भाषा को बचाने और उसे समृद्ध करने का जो संकल्प लिया है, उसके साथ अन्य अस्मिताओं के प्रश्न भी जुड़े हुए हैं। इसलिए इस संकल्प को सभी संस्थानों को अपने समाचार पत्रों के पन्नों पर उतारना होगा।

  11. रचनाओं में समस्याओं के हल भी सुझाते थे प्रेमचंद

    रचनाओं में समस्याओं के हल भी सुझाते थे प्रेमचंद

    वह अपनी रचनाओं में सिर्फ समस्याओं को उभारने का काम नहीं करते बल्कि उनसे कैसे निपटा जाए उसे भी बखूबी बताते हैं। वह भावनाओं को सींचने वाले साहित्यकार थे।

  12. गहरा रिश्ता रहा है पत्रकार और साहित्यकार का

    गहरा रिश्ता रहा है पत्रकार और साहित्यकार का

    साहित्यकार और पत्रकार का चोली−दामन का साथ है। दोनों ही सम सामयिक समाज का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी लेखनी के माध्यम से समाज हित में सामाजिक मूल्यों और सम्वेदनाओं को दृष्टि प्रदान करते हैं।

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