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कहानी/कविता

चुनावी रंग (कविता)

By श्रीकांत दुबे | Publish Date: Mar 2 2017 3:08PM
चुनावी रंग (कविता)
देखो बसंत ऋतु आयो रे
साथ टी चुनावी रंग छायो दे।
जिला-शिकवा सब नेता भूले
चुनावी रंगों में अब सब खिले
वामपंथ, दक्षिण पंथ हुआ पुराना
सेवापंथ अब हुआ नवल सुहाना।
वादों की बात छोड़ो
करो नित्य नई वादे।
सत्ता में आकर सुनाओ
अपनी मजबूरी की वादे।
क्या दागी क्या भ्रष्टाचारी
भ्रष्ट तंत्र में खोजो
अपने जैसा अधिकारी
गांधीवाद, लोहियावाद का ढोंग रचाओ 
इसी की आड़ में
जातिवाद, धर्मवाद बढ़ाओ
अन्दर-अन्दर आतंकवाद पनपाओ
हम ये किये हम वो किये
झूठे वादे को गिनाओ
सबके सामने एक समर्थ गुरु
बनकर उभर आओ
आओ सब नेता मिलजुलकर
एक नई शैली विकसित
जिसमें सब मिलजुल कर
नये ढंग से चारा खाओ
चारे के साथ पाम ऑयल पिये।
2जी, 3जी की बात से
फिर सूचना दूरसंचार से
सुखराम तक पहुंचाओ
अर्जुन के साथ बैठकर
अर्जुन के साथ बैठकर
चुरहट लॉटरी करवाओ
इससे बात नहीं बने तो
ताबुत बेचकर खाओ
यदि बारिकी दिखानी है तो
बिना दाग कोलतार पीजाओ
सभी वित्त मंत्री मिलकर
हर्षद मेहता शेयर घोटाला
जयंती अब मनाये।
इससे बात बिगड़ी तो
अपनी मजबूरी गिनाओ
बिहार में बाढ़ की अंदेशा आयी
नेता, ऑफिसर के मन में बसंत छायी
रिबन काटकर पीड़ित का उपहास कराओ
मिडिया में आकर अपने सतवा का
एहसास जनता को कराओ
सारी अपनी नकामी, आफिसरशाही
व्यापारवाही, सामंती सोच का
पोरण खोलवाओ
विदेशी बैंकों से पैसा लायेंगे
नया विकास प्रारम्भ कराएंगे
जनता का ध्यान भरमाकर
भ्रष्टों की कुंडसी पर बैठे जायेंगे
इससे बात नहीं बनी तो
जनता की कुंडली खोलवायेंगे
सभी नेता मिलकर नया
वैचारिक ग्रेट ब्रिटेन बनायेंगे
इसके हुयूम का 
सेफ्टी बाम्ब अपनायेंगे
सदियों से जो होता आया
वही काम करवायेंगे
फिर जनता के सामने गाय मारकर
जूता दाम कर आयेंगे।
 
- श्रीकांत दुबे