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कहानी/कविता

दिमागीन सर्विस सेंटर (व्यंग्य)

By विजय कुमार | Publish Date: Apr 19 2017 11:24AM
दिमागीन सर्विस सेंटर (व्यंग्य)

बचपन में एक कहावत सुनी थी, ‘सिर बड़े सरदारों के, पैर बड़े कहारों के।’ बुजुर्ग बताते थे कि सरदार यानि सिख पगड़ी बांधते हैं, इसलिए उनका सिर बड़ा दिखायी देता है। दूसरी ओर कहार दिन भर सामान उठाकर इधर-उधर भागता रहता है। पैरों पर अधिक बोझ पड़ने के कारण उसके पैर बड़े हो जाते हैं। कुछ लोगों की मान्यता है कि सरदार का अर्थ किसी दल, परिवार या समूह के मुखिया से है। उसे बहुत सोच-विचार कर निर्णय लेना पड़ता है। इसलिए उसका सिर बड़ा हो जाता है।

इसी संदर्भ में हमें दशानन अर्थात रावण की भी याद आती है। आजकल तो उसके दस सिर सिर्फ दशहरे पर ही दिखते हैं। उसके दस सिरों की भी विद्वानों ने अलग-अलग व्याख्या की है। एक मत के अनुसार दसों दिशाओं में तैनात उसके जासूस उसे पल-पल की खबर देते रहते थे। दूसरी मान्यता यह है कि उसकी केबिनेट में दस प्रमुख मंत्री थे, जो अलग-अलग विषयों का काम देखते थे। ये ही उसके दस सिर थे। 
 
ये सब बातें आज बुढ़ापे में समझ में आती हैं; पर बचपन में तो हंसी ही आती थी। एक बार मैंने अपने बाबा जी से पूछा कि रावण के दस सिर और दस मुंह थे, तो वह दो हाथों से खाना कैसे खाता होगा ? सोते समय करवट बदलने में भी उसे बहुत परेशानी होती होगी ? जैसे हम सोते समय चश्मा उतार देते हैं, क्या रावण भी अपने सिर खोलकर मेज पर रख देता था ? तलवार चलाते हुए भी उसे बड़ी दिक्कत होती होगी। तलवार थोड़ा दाएं-बाएं हुई कि उसके ही नाक-कान कटे। बाबा जी के पास इन बातों का कोई जवाब नहीं होता था। वे पानी या चाय लाने को कहकर बात टाल देते थे।
 
यद्यपि ये बेसिर पैर की बातें कहकर मैं आपका सिर खाना नहीं चाहता। क्योंकि कुछ लोगों के सिर में दिमाग के नाम पर गोबर, भूसा या फिर कूड़ा भरा होता है। सिर हिल जाए, तो कोई बात नहीं, पर दिमाग हिल जाए, तो बात ओझा, गुनिया और झाड़फूंक करने वालों तक पहुंच जाती है; पर ऐसे में ‘नीम हकीम खतरा ए जान’ की बजाय किसी डॉक्टर के पास जाना ही सबसे अच्छा रहता है। मेरा एक मित्र बहुत हंसोड़ स्वभाव का है। एक बार उसके दफ्तर में तनावमुक्ति शिविर हुआ। एक योगाचार्य ने ऐसे आसन और प्राणायाम सिखाए, जिससे दिमाग का बोझ घटाया जा सकता है। सबने उस शिविर में भाग लिया। अपवाद रहा मेरा मित्र। उसका कहना था कि तनाव तो दिमाग वालों को होता है। जिसे ये चीज खुदा ने बख्शी ही नहीं है, उसके लिए कैसा तनाव और कैसी तनावमुक्ति ? आप समझ ही गये होंगे कि उसकी जिंदादिली का रहस्य क्या है ?
 
बड़े होने के बाद नून, तेल और लकड़ी के चक्कर में फंसकर प्रायः लोग दिमाग तेज करने की बात भूल जाते हैं; पर छात्र जीवन में अध्यापक हों या गांव के बड़े-बूढ़े, सब दिमाग तेज करने के नुस्खे बताते मिलते हैं। कोई इसके लिए ब्राह्मी बूटी शहद के साथ चाटने और मगज खीरे के लड्डू खाने की सलाह देता है, तो कोई सिर पर बादाम रोगन लगाने की। कई महिलाएं बच्चों के सिर पर देसी घी की चम्पी कर देती हैं। बच्चे को पता भी नहीं चलता और उसका दिमाग तेज हो जाता है। 
 
खैर, बात सिर की हो रही थी और हम पहुंच गये दिमाग पर। यही तो खुराफाती दिमाग की करामात है। बात को घुमाकर विषय को भटका देना कोई दिमाग वालों से सीखे। वकील को तो इसी बात के पैसे मिलते हैं। जो बात को जितना अधिक उलझा दे, वह उतना बड़ा वकील। विश्वास न हो तो चार करोड़ी रामजेठमलानी से पूछ लो। हमारे मित्र शर्मा जी का कहना है कि दुनिया में संहार के सारे खतरनाक उपकरण ऐसे खरदिमाग वालों ने ही बनाये हैं। ये तो भला हो उन जैसे कुछ बेदिमाग लोगों का, जिनके कारण धरती बची हुई है। वरना इन दिमागदारों ने तो इसे नष्ट करने का बीड़ा ही उठा रखा है।
 
आजकल कुछ लोगों के सिर पर दूसरों के सिर काटने का भूत सवार है। कोई किसी राजनेता का सिर काटने पर ईनाम घोषित कर रहा है, तो कोई किसी लेखक या कलाकार पर। ऐसे लोगों से आग्रह है कि वे एक बार हमारे पड़ोस में स्थित ‘दिमागीन सर्विस सेंटर’ में आकर डॉ. दिमागीन से मिलें। समय कम हो, तो दिमाग सर्विस के लिए छोड़ दें। हां, वापसी के समय ये ध्यान रखें कि दिमाग अपना ही लें। अन्यथा हाल केजरीवाल और मायावती जैसा हो जाता है। उन बेचारों को खुद नहीं पता कि वे क्या बोल रहे हैं ? खुदा रहम करे। वैसे सर्विस किये कराये रैडीमेड दिमाग भी वहां मिलते हैं। अपनी पसंद और जेब के अनुकूल दिमाग लगवाकर चिन्तामुक्त हो जाएं।
 
डॉ. साहब के पास कई ऐसे दिमाग भी हैं, जिन्हें लोग सर्विस के लिए दे तो गये, पर लेने नहीं आये। सुना है, ऐसे अधिकांश लोग अब राजनीति में हैं। वहां उन्हें दिमाग की जरूरत ही नहीं पड़ती। जहां उनके नेता कहते हैं, वहां वे हाथ उठा देते हैं। ‘दिमागीन सर्विस सेंटर’ की सेवाएं विश्व स्तर की हैं। मैं तो हर साल वहां अपने दिमाग की ओवरहालिंग कराता हूं। आप भी एक बार आजमा कर देखें। क्या मजाल, जो आपका दिमाग फिर किसी लायक रह जाए ?
 
- विजय कुमार