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कहानी/कविता

कलाकार का घर (कहानी)

By स्व. घनश्याम रंजन | Publish Date: May 17 2017 2:27PM
कलाकार का घर (कहानी)

गैलरी से घुसते ही घुप्प अंधेरा, धीरे−धीरे कदम बढ़ाते आगे बढ़ा, दाहिने हाथ पर पुराने जमाने के लाल ईंटों को टेढ़ा−मेढ़ा जीना, अंधेरे में आइस−पाइस खेलती बिजली, ऊपर के दो जीने घुमावदार व एकदम महीन नोकदार। चढ़ते ही सामने एक मुंह चिढ़ाता गरीबा सा खड़ा दरवाजा, चप्पल उतारने के लिए जगह नहीं। कमरे के अंदर ही चप्पल उतारी। सामने सीलन भरी दीवार पर उखड़ती प्लास्टर के पर्तपर काले रंग की चौकोर घड़ी, टिक−टिक कर बढ़ते समय का आह्वान करती।

घर की सभी दीवारों पर लटकी पेंटिंग से आभास हो जाता है कि यह कलाकार का घर है एक साथ लटकते एक ही साल के दो−तीन भगवान के कलैंडर यह दर्शाते हैं कि यह व्यक्ति ईश्वर पर आस्था रखता है। लोहे के द्वार से प्रवेश करते ही बाएं हाथ पर लोहे का ऊंचा सिंहासननुमान पलंग, जिस पर एक फटी पुरानी बिछी कथड़ी चादर के नीचे से झांक रही थी। जैसे कि वह भी अपनी होने की सूचना देना चाहती हो। गंदा सा खाना (ताखा) जिस पर जलता दिया। लहरा−लहरा कर इतराता हुआ उजाला दे रहा था।
 
पास ही एक पुराना लाल सोफा पड़ा था जिस पर बैठने के लिए कहा गया। बैठा तो आराम से था पर नीचे से सोफे की स्प्रिन्ग फटाक से गढ़ी जैसे कह रही हो आओ बेटा तुम्हारा ही इंतजार था।
 
बाहर से ढीली ढाली पैंट−कमीज पहने एक लगभग 70 वर्ष के व्यक्ति ने प्रवेश किया। सफेद दाढ़ी−सफेद मूंछ सफेद ऊपर को कंघी किए बाल। आते ही दख्त पर बैठते ही खों−खों कर खांसते हुए हांफने लगे। जिससे पता चलता था कि शायद उन्हें दमा हो। कुछ समय बाद हमारी ओर मुखातिब होते हुए बोले दा साहब, मैं तो कल से आप का इंतजार कर रहा था। और फिर उन्होंने अपने बनाए चित्र दिखाने शुरू किए। वास्तव में उन्होंने इस क्षेत्र में काफी काम किया है।
 
इसके बाद दीवार पर लटकती पेंटिंग की ओर मुखातिब करते हुए बोले ये देखिए ये मेरा नया काम है कल ही फ्रेम होकर आया है। सोचता हूं इसे ही भेजकर रजिस्टर्ड करा लूं। पर समस्या है कि इसके लिए भी 200−300 रुपये होने चाहिए। घर तो देख रहे हैं कितना गरीब हूं। और बच्चों की फीस भी जमा करनी है आपकी पत्रिका में कोई छप जाए चित्र तो थोड़ी समस्या दूर हो।
 
हां−हां क्यों नहीं आपका यह चित्र (एक चित्र उठाते हुए) बहुत अच्छा है इसको मैं प्रकाशित कर दूंगा। और इसी हफ्ते आपको इसका पारिश्रमिक भी दे दूंगा। हमारे संपादक भी आपकी तारीफ कर रहे थे। आपके तो सभी कायल हैं इतनी तकलीफ में भी आप इस क्षेत्र में अपना योगदान दे रहे हैं। नहीं तो कौन अपना सुख छोड़कर ऐसा कार्य करता है सभी पैसे की ओर भागते हैं इसकी (कला की) दशा तो आजकल एक अपाहिज की तरह है जिसे आप जैसे एक मजबूत छड़ी की आवश्यकता है।
 
चित्र लेकर बैग में रखकर मैं चलने के लिए उठा तो उन्होंने चाय के लिए कहा मेरे मना करने पर भी एक बिना हत्थे के स्टील के प्याले में चाय आई साथ ही एक छोटी सी प्लेट में बिस्कुट। इतनी गरीबी में भी यह व्यवस्था देखकर मुझे अच्छा लगा। चाय पीकर मैं उठकर उनके पैर को स्पर्श करके चप्पल पहनकर नीचे उतरा तो वह भी मुझे भारतीय संस्कृति के अनुसार द्वार से बाहर छोड़ने के लिए उठ रहे थे। तो उनकी दशा देखकर मैंने ही उन्हें आने से मना कर दिया।
 
गैलरी से बाहर निकल कर अपनी स्कूटी स्टार्ट कर मैं अपने दफ्तर की ओर चल दिया। पर साथ ही दिमाग में एक प्रश्न बार बार जोर मार रहा था। क्या वास्तव में कला इतनी बेबस है। वह कला व कलाकार जो राजनीति से दूर सीधा−सादा है वह कितनी परेशानी को देखता है शायद इसीलिए परिवार में अब कोई कलाकार नहीं बनना चाहता पर ऐसा ही रहा तो हमारे भावी समाज व देश के लिए कैसा कल होगा। इन्हीं सवालों में उलझा मैं कब दफ्तर तक पहुंच गया पता ही नहीं चला।
 
− स्व. घनश्याम रंजन