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शख्सियत

साहित्यप्रेमी राजनेता थे डॉ. सम्पूर्णानन्द, प्यार से सब कहते थे 'बाबूजी'

By विजय कुमार | Publish Date: Jan 1 2018 5:19PM
साहित्यप्रेमी राजनेता थे डॉ. सम्पूर्णानन्द, प्यार से सब कहते थे 'बाबूजी'

साहित्य और राजनीति दो अलग प्रकार के क्षेत्र हैं। राजनीति में उठापटक और गुटबाजी के बिना काम नहीं चलता, जबकि साहित्य की साधना शान्ति और एकान्त चाहती है। इसीलिए ऐसे लोग बहुत कम ही हुए हैं, जिन्होंने दोनों क्षेत्रों में समान अधिकार से काम किया है। ऐसी ही एक विभूति थे डॉ. सम्पूर्णानन्द।

सम्पूर्णानन्द जी का जन्म काशी (उ.प्र.) के एक विद्वान श्री विजयानन्द के घर में एक जनवरी, 1891 को हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा घर पर होने के बाद उन्हें काशी के विख्यात हरिश्चन्द्र स्कूल और फिर क्वीन्स कॉलिज में पढ़ने भेजा गया। उन दिनों प्रयाग शिक्षा का प्रसिद्ध केन्द्र था। यहां से उन्होंने बी.एस-सी. और फिर एल.टी. की परीक्षा अच्छे अंकों में उत्तीर्ण की। उनकी रुचि पढ़ाने में भी थी। अतः वे वृन्दावन के प्रेम महाविद्यालय में अध्यापक बन गये। 
 
अध्यापन के साथ ही स्वाध्याय पर भी उनका पूरा ध्यान था। विज्ञान के छात्र होते हुए भी उन्होंने शिक्षा, साहित्य, धर्म, दर्शन, ज्योतिष और वेदान्त आदि का गहन अध्ययन किया। हिन्दी में वैज्ञानिक निबन्धों का अभाव देखकर उन्होंने इस दिशा में काफी काम किया। उनके निबन्धों के विषय यद्यपि जटिल होते थे; पर सरल एवं प्रवाहमयी लेखन शैली के कारण छात्र उन्हें आसानी से समझ लेते थे। इसके लिए उन्हें ‘विद्या वाचस्पति’ की उपाधि दी गयी। उन्होंने मालवीय जी द्वारा स्थापित ‘मर्यादा’ नामक मासिक पत्र का सम्पादन भी किया। ‘नेशनल हेरल्ड’ तथा ‘कांग्रेस सोशलिस्ट’ जैसे पत्रों के भी वे नियमित लेखक थे। उनके लेखों में प्राचीन परम्परा तथा आधुनिकता का उचित समन्वय मिलता है।
 
उन दिनों देश में ब्रिटिश शासन होने के कारण लोगों का रुझान अंग्रेजी की ओर बढ़ रहा था। सम्पन्न घरों के लोग अंग्रेजी बोलने और पढ़ने में गौरव अनुभव करते थे। अंग्रेजी विद्यालयों की संख्या भी लगातार बढ़ रही थी; पर अंग्रेजी के विद्वान होते हुए भी डॉ. सम्पूर्णानन्द सदा हिन्दी के पक्षधर रहे। उन्हें हिन्दी की श्रीवृद्धि के लिए ‘समाजवाद’ पुस्तक पर ‘मंगला प्रसाद पुरस्कार’ भी मिला। 1940 में वे ‘अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के सभापति निर्वाचित हुए। लम्बे समय तक वे ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ के भी अध्यक्ष और फिर संरक्षक रहे। सब लोग आदर से उन्हें ‘बाबूजी’ कहते थे।
 
देश की सेवा के लिए डॉ. सम्पूर्णानन्द ने राजनीति को माध्यम बनाया। उन दिनों राजनीति आज की तरह कलुषित नहीं थी। स्वतन्त्रता संघर्ष के दौरान उन्हें कई बार जेल की यातनाएं भी सहनी पड़ीं। 1936 में संयुक्त प्रान्त की अन्तरिम विधान सभा का गठन होने पर वे उसके सदस्य चुने गये। शिक्षा के प्रति उनके रुझान, अनुभव और प्रेम को देखकर उन्हें शिक्षा-मन्त्री बनाया गया। इस पद पर रहकर शिक्षा में सुधार के लिए उन्होंने सराहनीय काम किया। ‘वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय’ की स्थापना उनके प्रयत्नों से ही हुई। 
 
1955 से 1960 तक वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री तथा फिर पांच वर्ष राजस्थान के राज्यपाल रहे। राजस्थान में उन्होंने पुराने तथा भले बंदियों के लिए 1963 में खुली जेल का प्रयोग किया, जो अब पूरे देश में सफलतापूर्वक चल रहा है। राजनेता होते हुए भी उन्होंने चिद्विलास, समाजवाद, जीवन और दर्शन, महात्मा गांधी, चितरंजन दास, सम्राट हर्षवर्धन, अन्तरिक्ष यात्रा, गणेश आदि पुस्तकों की रचना की। वे अंग्रेजी की ‘टुडे’ पत्रिका के सम्पादक भी रहे।
 
भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी धर्मनगरी काशी से अपने जीवन की यात्रा प्रारम्भ करने वाले प्रख्यात साहित्यकार, विचारक, लेखक, पत्रकार, सम्पादक, स्वतन्त्रता सेनानी व राजनेता डॉ. सम्पूर्णानन्द का 10 जनवरी, 1969 को काशी की पुण्यभूमि में ही निधन हुआ। उनके नाम पर काशी में ‘संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय’ की स्थापना की गयी है।
 
- विजय कुमार