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अशफाक उल्ला खां का गरम दल में शामिल होने का कारण

अशफाक उल्ला खां का गरम दल में शामिल होने का कारण

आजादी के छह दशक बाद भी देश सांप्रदायिकता के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाया है। मोहम्मद अली जिन्ना जैसे नेताओं की वजह से जहां देश का बंटवारा हो गया वहीं आजादी के दीवाने अशफाक उल्ला खां अपने जीवन के अंत तक हिन्दू मुस्लिम एकता की डोर को मजबूत करते रहे और देश के लिए हंसते हंसते अपनी जान न्योछावर कर गए। महात्मा गांधी ने जब चौरी चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो इससे अशफाक को बेहद पीड़ा पहुंची और वह गरम दल की विचारधारा में शामिल हो गए। 22 अक्तूबर 1900 को शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक को आजादी की राह से भटकाने के लिए अंग्रेजों ने तरह−तरह की चालें चलीं लेकिन उनकी एक भी चाल सफल नहीं हो पाई। अंग्रेजों ने उनसे कहा कि यदि हिन्दुस्तान आजाद हो गया तो उस पर हिन्दुओं का राज होगा और मुसलमानों को कुछ नहीं मिलेगा। इस पर अशफाक का जवाब था कि फूट डालो शासन करो की नीति का अब हिन्दुस्तानियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा और हिन्दुस्तान आजाद होकर रहेगा। इतिहासकार सर्वदानंदन के अनुसार अंग्रेजों ने अशफाक को यह प्रलोभन भी दिया कि यदि वह रामप्रसाद बिस्मिल तथा अपने अन्य साथियों के खिलाफ सरकारी गवाह बन जाएं तो उन्हें छोड़ दिया जाएगा लेकिन अशफाक के इरादे अटल रहे और उन्होंने सरकारी गवाह बनने से इंकार कर दिया।

अशफाक अपने छह भाई बहनों में सबसे छोटे थे। वह महात्मा गांधी से काफी प्रभावित थे लेकिन जब चौरी चौरा की घटना के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो उनके मन को अत्यंत पीड़ा पहुंची और वह राम प्रसाद बिस्मिल तथा चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी देशभक्तों से जा मिले। बिस्मिल और आजाद के नेतृत्व में आठ अगस्त 1925 को शाहजहांपुर में क्रांतिकारियों की एक अहम बैठक हुई जिसमें हथियारों के लिए ट्रेन में ले जाए जाने वाले सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई। क्रांतिकारी जिस धन को लूटना चाहते थे दरअसल वह धन अंग्रेजों ने भारतीयों से ही हड़पा था। 9 अगस्त 1925 को अशफाक उल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्र लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मुकुंद लाल और मन्मथ लाल गुप्त ने अपनी योजना को अंजाम देते हुए लखनऊ के नजदीक काकोरी में ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी जाती है। इस घटना को आजादी के इन मतवालों ने अपने नाम बदलकर अंजाम दिया था। अशफाक ने अपना नाम कुमार जी रखा था। इस घटना के बाद ब्रिटिश हुकूमत पागल हो उठी और उसने बहुत से निर्दोषों को पकड़कर जेलों में ठूंस दिया। अपनों की दगाबाजी से इस घटना में शामिल एक−एक कर सभी क्रांतिकारी पकड़े गए लेकिन चंद्रशेखर आजाद और अशफाक उल्ला हाथ नहीं आए।
 
अशफाक शाहजहांपुर छोड़कर बनारस आ गए और वहां 10 महीने तक एक इंजीनियरिंग कंपनी में काम किया। इसके बाद अशफाक ने इंजीनियरिंग के लिए विदेश जाने की योजना बनाई ताकि वहां से कमाए पैसों से अपने क्रांतिकारी साथियों की मदद करते रहें। विदेश जाने के लिए वह दिल्ली में अपने एक पठान मित्र के संपर्क में आए लेकिन उनका वह दोस्त दगाबाज निकला। उसने इनाम के लालच में अंग्रेज पुलिस को सूचना दे दी और इस तरह अशफाक उल्ला खां पकड़ लिए गए। जेल में जब उन पर यातनाओं का कोई असर नहीं हुआ तो अंग्रेजों ने तरह−तरह की चालें चलकर उन्हें सरकारी गवाह बनाने की कोशिश की लेकिन अंग्रेज अपने इरादों में कामयाब नहीं हो पाए।
 
19 दिसंबर 1927 को अशफाक को फैजाबाद जेल में फांसी दे दी गई और इस तरह भारत मां का यह महान सपूत देश के लिए अपना बलिदान दे गया। इतिहासकार एमके भगत का कहना है कि अशफाक की शहादत ने आजादी की लड़ाई में हिन्दू मुसलमानों की एकता को और भी अधिक मजबूत कर दिया। उन्होंने कहा कि आज जब देश आतंकवाद और सांप्रदायिकता के चंगुल में फंसा है तो ऐसे में अशफाक का बलिदान देशवासियों को एकता के सूत्र में पिरोने का काम कर सकता है।

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