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विश्लेषण

गठबंधन के सहारे आगे बढ़ना चाहते हैं अखिलेश, मायावती इच्छुक नहीं

By अजय कुमार | Publish Date: Dec 6 2017 11:00AM
गठबंधन के सहारे आगे बढ़ना चाहते हैं अखिलेश, मायावती इच्छुक नहीं

उत्तर प्रदेश नगर निकाय और नगर पंचायत चुनाव के नतीजे आने के बाद एक बार फिर बीजेपी के खिलाफ गठबंधन की बात होने लगी है। इस बार यूपी में महागठबंधन का शिगूफा बिहार में बैठे लालू यादव ने नहीं छोड़ा है, बल्कि यह आवाज यूपी के भीतर से ही आई है। गठबंधन की बात निकाय चुनाव की सबसे कमजोर कड़ी रहे समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने उठाई है। अब अखिलेश बीजेपी के खिलाफ किस तरह के गठबंधन की बात कर रहे हैं यह तो वह ही जानें, लेकिन यह बात भी भूलने वाली नहीं है कि अखिलेश विधान सभा चुनाव के समय राहुल गांधी को साथ लेकर इसका प्रयोग करके इसका हश्र भी देख चुके हैं।

अगर अखिलेश यह सोच रहे हैं कि कांग्रेस के साथ बसपा को भी इस गठबंधन का हिस्सा बना लिया जाये तो यह असंभव भले न हो मुश्किल जरूर लगता है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने तो लोकसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद तब भी विधान सभा चुनाव के समय सपा के साथ गठबंधन नहीं किया था, जब उनको इसकी सबसे अधिक जरूरत थी, तो अब बदले हालात में मायावती क्यों सपा या कांग्रेस के साथ जायेंगी, निकाय चुनाव में बसपा काफी कुछ हासिल करने में सफल हो गई है। इस बात के मायावती ने यह कहकर संकेत भी दे दिये हैं कि वह गठबंधन तो चाहती हैं, लेकिन सर्वसमाज के साथ। यानी वह अपना वोट बैंक बढ़ाने को बेचैन हैं, न कि गठबंधन को, जिस तरह से उनका कोर दलित वोटर लौटा है और कई जगह मुसलमान वोटरों ने समाजवादी पार्टी से दूरी बनाकर बसपा के पक्ष में वोटिंग की है, वह मायावती की दलित−मुस्लिम गठजोड़ की महत्वाकांक्षा को पूरा कर सकता है। अखिलेश के गठबंधन राग पर मायावती की एकला चलो की सोच भारी पड़ती दिख रही है।
 
मायावती निकाय और नगर पंचायत चुनावों के नतीजों से संतुष्ट नजर आ रही हैं और आगे की रणनीति पर काम कर रही हैं तो अखिलेश अपनी खामियां तलाशने की बजाये ईवीएम में उलझे हुए हैं। ईवीएम पर फिर से प्रश्न चिह्न लगा कर अखिलेश ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वह या तो अपनी खामियों को समझ नहीं पा रहे हैं, अन्यथा जानबूझ कर इस ओर से मुंह मोड़े बैठे हैं। अच्छा होता अगर वह ईवीएम में गड़बड़ी का रोना मीडिया के सामने रोने की बजाय चुनाव आयोग के उस निमंत्रण को स्वीकार लेते जिसमें उसने विभिन्न दलों को ईवीएम को हैक करके दिखाने की चुनौती दी थी। ईवीएम पर हल्ला मायावती भी मचा रही हैं, लेकिन कहीं न कहीं दो नगर निगमों में मिली जीत से उनका ईवीएम में गड़बड़ी को लेकर पक्ष कमजोर नजर आ रहा है। अखिलेश तो  निकाय चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने के मुख्यमंत्री योगी के दावे को भी झूठा करार दे रहे हैं।
 
एक तरफ तो अखिलेश कहते हैं कि ईवीएम नफरत फैलाने का काम करती है, क्योंकि उससे यह पता चल जाता है कि किस बूथ पर किस प्रत्याशी को कितने वोट मिले तो दूसरी तरफ उन्हें इस बात का भी मलाल है कि जहां ईवीएम इस्तेमाल हुआ वहां बीजेपी को इतनी बड़ी जीत कैसे मिल गई। अपनी बात को साबित करने के लिये वह यह भी कहते हैं कि नगर पंचायत के चुनावों में बीजेपी को इस लिये बड़ी सफलता नहीं मिली क्योंकि वहां बैलेट पेपर से चुनाव हुआ था।
 
यह और बात है कि अखिलेश और मायावती के दावे आंकड़ों में गलत साबित हो रहे हैं। जहां बैलेट पेपर से चुनाव हुए वहां बसपा की हालत ज्यादा खस्ता है। नगर निगमों से अधिक नगर पालिका परिषद व नगर पंचायतों में बसपा उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है। नगर निगमों में जहां ईवीएम से चुनाव हुए थे वहां मेयर पद पर बसपा के 16 में से 11 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है। यह आंकड़ा 68.75 प्रतिशत का है, जबकि नगर पालिका परिषद में बसपा के 70.43 फीसद उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है। इसमें 186 प्रत्याशियों में 131 की जमानत जब्त हुई है। नगर पंचायतों के चेयरमैन में भी 75 फीसदी उम्मीदवार जमानत नहीं बचा पाए। इसमें 357 पदों पर बसपा ने उम्मीदवार खड़े किए थे, लेकिन 268 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। सपा की जरूर छोटे शहरों में स्थिति कुछ ठीक रही। नगर निगम में मेयर पद पर उसके भी 16 में 10 उम्मीदवार अपनी जमानत नहीं बचा पाए। यह कुल प्रत्याशियों का 62.5 प्रतिशत है तो नगर पालिका परिषद में उसके 43.68 फीसदी उम्मीदवार ही जमानत नहीं बचा पाए थे। इसमें 190 में से 83 की जमानत जब्त हुई है, जबकि नगर पंचायतों में 54.47 प्रतिशत की जमानत जब्त हुई थी। इसमें 380 में से 207 प्रत्याशी जमानत बचाने लायक वोट भी नहीं पा सके।
 
एक तरफ अखिलेश और मायावती तमाम किन्तु−परंतुओं में उलझे हुए हैं तो दूसरी ओर निकाय चुनाव से फुर्सत मिलते ही भाजपा सहकारी समितियों के चुनाव में जुट गई है। पार्टी मुख्यालय में इसके लिए विमर्श शुरू है। करीब 12 हजार से अधिक सहकारी समितियों के लिए 27 दिसंबर से चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो रही है। भाजपा इस बार सपा का वर्चस्व तोड़ने में जुट गई है। प्रदेश अध्यक्ष डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय ने निकाय के साथ ही सहकारी समितियों पर भाजपा का झंडा फहराने का अपना मंसूबा जाहिर किया है। सहकारी समितियों पर ज्यादातर सपा के लोग काबिज हैं, लेकिन इस बार यह लोग चुनाव लड़ने से वंचित होंगे। असल में सरकार ने संविधान में संशोधन कर दिया है कि दो बार लगातार अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और प्रबंध समिति सदस्य का चुनाव जीतने वाले पदाधिकारी तीसरी बार चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। इसलिए उन्हें मैदान में आने का मौका ही नहीं मिलेगा। पिछले चुनावों में उनके मुकाबले मजबूत रहे आंदोलन से जुड़े लोगों पर भाजपा ने दांव लगाने की तैयारी कर दी है। ऐसे में किला फतेह करने में भाजपा को आसानी होगी। 
 
- अजय कुमार