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विश्लेषण

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर गया साल 2017

By अजय कुमार | Publish Date: Jan 2 2018 12:13PM
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर गया साल 2017

उत्तर प्रदेश की सियासत के लिये वर्ष 2017 काफी बदलाव भरा रहा। राजनीति ने कई नये मुकाम हासिल किये तो तमाम सियासी सूरमा धाराशायी भी होते दिखे। वर्ष 2017 की जब शुरूआत हुई थी, तब विधानसभा चुनाव की आहट सुनाई दे रही थी, लेकिन उससे अधिक चर्चा समाजवादी पार्टी में सिर फुटव्वल की हो रही थी। मुलायम सिंह को अखिलेश द्वारा जबरन समाजवादी पार्टी की सियासत में हाशिये पर ढकेल दिया गया तो मुलायम के हनुमान जैसे भाई शिवपाल को सपा से निकाले बिना 'दूध की मक्खी' की तरफ फेंक दिया गया। इसके बाद अखिलेश और उनके करीबियों की सपा में तूती बोलने लगी, लेकिन यह दौर लम्बा नहीं चल पाया, फरवरी−मार्च में हुए विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को सबसे करारी हार झेल कर सत्ता से बाहर होना पड़ गया।

प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। समाजवादी पार्टी जिसके पास 16वीं विधान सभा में 229 विधायक थे, 17वीं विधान सभा में यह संख्या घट कर मात्र 47 पर सिमट गई। समाजवादी पार्टी के लिये 2019 की यादें 2014 के लोकसभा चुनाव से भी बुरी रहीं। यह और बात थी कि 2014 में जब सपा को हार का मुंह देखना पड़ा था, तो अखिलेश के समर्थकों द्वार इस हार को ऐसे प्रचारित−प्रसारित किया गया था कि मानो समाजवादी पार्टी में पिता और चाचा के सामने अखिलेश की चल ही नहीं रही थी, इसलिये सपा को हार का सामना कर पड़ा। इसी हार का सहारा लेकर अखिलेश ने पिता और चाचा को किनारे किया था, मगर 2017 में जब अखिलेश अपना चेहरा आगे करके भी जीत हासिल नहीं कर सके तो वह पिता और चाचा के निशाने पर भी खूब रहे।
 
मुलायम ने तो यहां तक कह दिया कि जब उन्होंने अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलवाईं थीं, तब भी उन्हें इतनी बुरी हार का सामना नहीं कर पड़ा था। यह तब था जबकि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी मिलकर विधान सभा चुनाव लड़े थे और राहुल−अखिलेश को लेकर बनाया गया नारा 'यूपी को यह साथ पंसद है' खूब उछाला गया था। बात कांग्रेस की कि जाये तो सपा के वोट बैंक के सहारे अपनी नैया पार लगाने की कोशिश कर रहे राहुल गांधी तमाम कोशिशों के बाद भी कांग्रेस को डबल डिजिट में नहीं पहुंचा पाये, उन्हें मात्र 07 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा, जबकि उनसे अच्छी स्थिति भाजपा के गठबंधन की साथी अपना दल की रही, जो कुछ सीटों पर ही चुनाव लड़ी लेकिन 09 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल हुई।
 
इसके उलट 16वीं विधानसभा में 41 सदस्यों वाली भाजपा 17वीं विधानसभा में 312 पर पहुंच गई। इस चमत्कारी जीत के साथ ही लगभग 14 सालों का भाजपा का सत्ता का वनवास खत्म हो गया। भाजपा को इससे बड़ी जीत कभी नहीं हासिल हुई थी। भाजपा की चमत्कारी जीत के साथ यूपी में एक नई तरह की सियासत ने जन्म लिया। इस जीत का सेहरा मोदी और अमित शाह की जोड़ी के सिर बंधा। दोनों ने विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा समां बांधा की तुष्टिकरण के सहारे सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने वालों दलों के कदमों तले से जमीन खिसक गई तो हिन्दुत्व का सहारा लेकर भाजपा ने यह दिखा दिया कि हिन्दुओं को एकजुट करके राजनीति का मिजाज बदला जा सकता है।
 
सत्ता बदली तो सीएम का चेहरा बदलना स्वाभाविक था। पहली बार यूपी की सियासत पर गेरूआ रंग चढ़ा तो सीएम की कुर्सी पर गेरूआ वस्त्रधारी फायर ब्रान्ड नेता योगी आदित्यनाथ बैठ गये। यानी कारसेवकों पर गोली चलाने का दंभ भरने वाली सरकार की जगह 'कारसेवकों' की सरकार बनी। यह बदलाव तमाम लोगों के लिये सुखद था तो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियों को लगा कि यह जीत साम्प्रदायिक शक्तियों की जीत थी। इस जीत के साथ भाजपा ने एक और अभिनव प्रयोग किया तो यूपी में पहली बार दो डिप्टी सीएम देखने को मिले। दो−दो डिप्टी सीएम बनाने की भाजपा को क्या जरूरत थी ? यह सवाल लोगों के गले भले ही नहीं उतर रहा था, परंतु सियासत के जानकार जान−समझ रहे थे कि यह वोट बैंक की सियासत का साधने का राजनैतिक तरीका था। साधू की जाति नहीं पूछी जाती है, लेकिन जब विपक्ष ने योगी को राजपूत बता कर भाजपा में अन्य बिरादरियों की अनदेखी का आरोप लगाया तो ब्राह्मणों को लुभाने के लिये डॉ. दिनेश शर्मा को और पिछड़ों को लुभाने के लिये केशव प्रसाद मौर्या को डिप्टी सीएम बनना भाजपा आलाकमान के लिये जरूरी हो गया।
 
भाजपा से मिली करारी हार को न तो समाजवादी पार्टी पचा पाई थी, न ही बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी)। बीएसपी का तो हाल समाजवादी पार्टी से भी बुरा रहा था। असल में यूपी की सियासत में पिछले कई वर्षों से सपा−बसपा के बीच सत्ता की बंदरबांट चल रही थी। एक बार सपा तो एक बार बसपा की सरकार बनती थी। इस हिसाब से बसपा अपने को सत्ता की प्रबल दावेदार मान रही थी। 16वीं विधानसभा में बसपा के 80 विधायक थे, लेकिन 17वीं विधानसभा में यह आंकड़ा बढ़ने की बजाय 19 पर सिमट गया। 2014 के लोकसभा में एक भी सीट जीत पाने में नाकामयाब रहीं बसपा सुप्रीमो मायावती को लग रहा था कि विधानसभा चुनाव के नतीजे बीएसपी को आक्सीजन देने का काम करेंगे। ऐसा नहीं हुआ तो मायावती ने हार का स्वीकारने की जगह वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़ा कर दिया। मायावती ने हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ा तो समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी अपनी प्रबल प्रतिद्वंद्वी मायावती के सुर में सुर मिलाते नजर आये। इस परम्परा को दबे शब्दों में कांग्रेस ने भी आगे बढ़ाने का काम किया।
 
संभवतः इसी के बाद से प्रत्येक चुनाव में जहां भी भाजपा को जीत मिलती वहां ईवीएम को निशाना बनाया जाने लगा, लेकिन जब चुनाव आयोग ने ईवीएम की गड़बड़ी पर सवाल उठाने वाले नेताओं और दलों को चुनौती दी की वह ईवीएम हैक करके दिखायें तो यह चुनौती स्वीकार करने कोई नहीं पहुंचा। पहले लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव में बसपा के खिलाफ आये अप्रत्याशित नतीजों के बाद कयास यह लगाये जाने लगे थे कि मायावती की सियासत हाशिये पर जा रही है क्योंकि बसपा का परम्परागत दलित वोट बैंक धीरे−धीरे भाजपा की तरफ खिसकता जा रहा था। दलितों को लुभाने के लिये मोदी और उनकी टीम पूरा जोर लगाये हुए थी। इस दौरान हुए कुछ उप−चुनाव में भी भाजपा की ही तूती बोलती दिखी।
 
बहरहाल, सियासत का रंग कभी एक-सा नहीं रहता है। यह बदलती रहती है। इसी बदली सियासत के तहत जब सपा−बसपा को लगा कि उन्हें अपनी कमजोर जड़ों को मजबूत करना जरूरी है तो सपा−बसपा ने पहली बार अपने सिंबल पर निकाय चुनाव लड़ने का फैसला लिया। भाजपा तो हमेशा से ही नगर निकाय चुनाव अपने सिंबल पर लड़ती थी, मगर इस बार उसने दो कदम आगे जाकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक से चुनाव प्रचार करा दिया। योगी ने करीब दो दर्जन जनसभाएं कीं। परंतु मायावती और अखिलेश प्रचार के मामले में निकाय चुनाव से दूरी बनाये रहे। यह और बात थी कि निकाय चुनाव साल जाते−जाते बसपा सुप्रीमो मायावती की झोली खुशियों से भर गया। दो नगर निगमों में उनकी पार्टी को जीत हासिल हुई तो कई जगह उसने अच्छा प्रदर्शन भी किया। दलित वोट बीएसपी की तरफ लौटे तो कई जगह मुस्लिम मतदाताओं ने भी खुल कर सपा का साथ छोड़ते हुए बसपा के समर्थन में मतदान किया।
 
- अजय कुमार