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अभी जो कठिनाई दिखाई दे रही है वह स्थायी नहीं

अभी जो कठिनाई दिखाई दे रही है वह स्थायी नहीं

देश को आदर्श और महान बनाने की चाहत प्रत्येक नागरिक में होती है होनी भी चाहिए। किसी राष्ट्र का ऐसा स्तर वहां के लोगों में आत्म गौरव का संचार करता है, किन्तु आदर्शों की दुहाई देने मात्र से कोई देश महान नहीं बन जाता। इसके लिए हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा की तर्ज पर प्रयास करने की आवश्यकता होती है। मातृभूमि से हम लोगों को बहुत कुछ मिला। चिंतन इस पर होना चाहिए कि बदले में हमने उसे क्या दिया। निजी व पारिवारिक हित का विचार स्वाभाविक है। सुख−सुविधापूर्ण जीवन व्यक्ति को अच्छा लगता है। किन्तु इसके इंतजाम के प्रयास मर्यादित होने चाहिए। यह स्वार्थ की हद तक नहीं पहुंचने चाहिए। समाज व राष्ट्र के हित सर्वोच्च मान लेने से ही इन समस्याओं का समाधान हो जाता है। तब निजी हितों से उसका टकराव नहीं होता। दोनों साथ−साथ चल सकते हैं। यह सराहनीय है कि देश को आदर्श व महान बनाने के विषय पर चर्चा चल रही है, लेकिन चर्चा मात्र से ही मंजिल नहीं मिल सकती। इससे उपयोगी सिद्धान्त तो मिल सकते हैं लेकिन उन पर अमल मजबूत इच्छा शक्ति से ही संभव है। दूसरी समस्या यह है कि अपने देश में कतिपय राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर आम सहमति का अभाव है। खासतौर पर राजनीतिक पार्टियों के लिए एक दूसरे पर हमले से ऊपर उठना मुश्किल होता है। ऐसे विचार−विमर्श में जब नेता शामिल होते हैं, तब मुद्दे तो बेहिसाब उठते हैं, किन्तु चर्चा किसी निष्कर्ष, सहमति या समाधान तक नहीं पहुंचती। 

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इसी विषय पर एक न्यूज चैनल ने विचार−विमर्श का आयोजन किया। इसमें अखिलेश यादव, केशव प्रसाद मौर्य, राज बब्बर, जयंत चौधरी, सतीश चंद्र मिश्रा, गुलाम नवी आजाद आदि नेताओं ने विचार व्यक्त किए। एक वृत्तचित्र में अखिलेश यादव को अर्जुन और अभिमन्यु बताया गया। कहा गया कि वह अर्जुन की भांति लक्ष्य का निर्धारण करते हैं। फिर उसे प्राप्त करते हैं। वहीं अभिमन्यु की भांति अपने ही लोगों के बीच घिर जाते हैं। केवल विपक्षी दलों की ओर से उन्हें चुनौती नहीं मिल रही है, वरन सैफई परिवार की खेमाबन्दी से भी उन्हें निपटना पड़ रहा है। प्रदेश सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है। यह दावा किया जा रहा है कि भारत में आज तक ऐसी कोई सरकार नही हुई, जिसने इतना विकास किया हो। मुख्यमंत्री खुद मानते हैं कि बिजली, गरीबी, गांव, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि से किसी सरकार का आकलन होता है। उन्होंने आगरा एक्सप्रेस के अलावा कई सड़कों की चर्चा की। उन्होंने लैपटाप वितरण, समाजवादी पेंशन, फिर मोबाइल फोन की बात की। उस समय यह चर्चा भी हुई कि सभी सरकारों को यह समझना होगा कि ऐसे वितरण विकास के दायरे में नहीं आते। इस दृष्टि से देखें तो उत्तर प्रदेश आज भी बहुत पिछड़ा है। अखिलेश काले धन को रोकने का केन्द्र को सुझाव देते हैं, लेकिन पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने के दौरान उन्होंने कालेधन को रोकने का क्या काम किया, यह नहीं बताया।
 
अखिलेश यादव पिछली सरकारों पर विफलता का आरोप लगाते हैं। उनके अनुसार जिन्हें कई बार सरकार बनाने का मौका मिला, उन्होंने काम नहीं किया, किन्तु उदाहरण रूप में वह केवल भाजपा की प्रदेश सरकार का नाम लेते हैं। कांग्रेस ने यहां सर्वाधिक समय तक शासन किया, किन्तु उसका नाम नहीं लेते। इसका कारण समझा जा सकता है। अखिलेश कांग्रेस के साथ तालमेल का इशारा करते हैं। वह कहते हैं कि गठबन्धन होगा तो तीन सौ से ज्यादा सीटें मिलेंगी।
 
किन्तु अखिलेश यादव पिछली सरकारों पर नाकामी का आरोप लगाते समय भूल जाते हैं, कि मुलायम सिंह यादव भी कई बार मुख्यमंत्री रहे हैं। अखिलेश कहते हैं कि जिस सरकार में लोगों को कष्ट मिलता है, मतदाता उन्हें दुबारा मौका नहीं देते। इस बयान से वह नोटबन्दी के सन्दर्भ में केन्द्र पर हमला बोलते हैं किन्तु यह बात मुलायम सिंह पर भी लागू होती है। लगातार दुबारा सरकार बनाने में उन्हें कभी सफलता नहीं मिली। अखिलेश बुन्देलखंड में अपनी उपलब्धि बताते हैं, लेकिन इसका जवाब नहीं मिला कि वहां से पलायन क्यों नहीं रुका।
 
दूसरी ओर भाजपा का मानना है कि देश के प्राचीन गौरव को हासिल करने हेतु सबको प्रयास करना चाहिए। भारत कभी विश्व गुरु था, सोने की चिड़िया माना जाता था। इतनी उन्नत शिक्षा व स्वास्थ्य व्यवस्था विश्व में कहीं नहीं थी। उस स्तर को पुनः प्राप्त करने के लिए व्यवस्था में बदलाव करना होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसी दिशा में प्रयास कर रहे हैं। विमुद्रीकरण उसी दिशा में उठाया गया कदम है। कालेधन की समाप्ति देश को अन्ततः समृद्ध बनाएगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास में अधिक धनराशि लगाई जा सकेगी। इसका फायदा गरीबों, किसानों को होगा। इस समय जो कठिनाई दिखाई दे रही है, वह स्थायी नहीं है। देश के आम जन को नरेन्द्र मोदी पर विश्वास है, वह खुद ईमानदार हैं। सम्पत्ति के मोह से मुक्त हैं। मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री के रूप में मिलने वाले गिफ्ट को नीलाम करके अब तक वह करोड़ों रूपये गरीब बेटियों की शादी हेतु दान कर चुके हैं।
 
कांग्रेस के राज बब्बर नोटबन्दी का आक्रामक विरोध करते हैं। इसे अनर्थकारी मानते हैं लेकिन इसी के साथ वह मनमोहन सिंह के साथ ही कांग्रेस की सभी सरकारों को ईमानदार घोषित कर देते हैं। इस दलील पर विश्वास करना मुश्किल है। यही लगता है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सपा से गठबन्धन की दिशा में बढ़ना चाहती है। इसके अलावा इस पार्टी का फिलहाल कोई उद्देश्य नहीं है। वह बिहार की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में राजनीति कर रही है। सतीश चंद्र मिश्रा यह साबित करने में लगे रहे कि ब्राह्मणों का सम्मान बसपा में ही होता है। वैसे यह मानना होगा कि राजनेताओं के लिए प्रायः दलगत सीमा से ऊपर उठकर सोचना मुश्किल होता है। चुनावी मौसम हो तो कहना भी क्या। व्यवस्था बदलने में खासतौर पर शासन−सत्ता की अहम भूमिका होती है। प्रजातंत्र में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। देश हित में पक्ष−विपक्ष की पार्टियों को सकारात्मक चिंतन करना होगा। देश को आदर्श व महान बनाने वाले विषयों पर आम सहमति बनानी व दिखानी होगी। तभी भारत इस गौरव को प्राप्त कर सकेगा।
 
- डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

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