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प्रधानमंत्री पर सिर्फ आरोप न लगाएं राहुल, सुबूत भी दें

प्रधानमंत्री पर सिर्फ आरोप न लगाएं राहुल, सुबूत भी दें

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान दावा किया था कि उनके पास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में व्यक्तिगत भ्रष्टाचार की जानकारी है, जिसे वे केवल सदन में ही रखना चाहते हैं लेकिन मुझे सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा है। अब चूंकि संसद सत्र समाप्त हो चुका है, बावजूद इसके राहुल गांधी ने ऐसा कोई खुलासा नहीं किया है। कांग्रेस नोटबंदी के मामले को लेकर विरोध की राजनीति सड़क से लेकर संसद तक कर रही है, जिसका उसे अधिकार भी है, लेकिन बिना किसी सबूत के प्रधानमंत्री पर मनगढंत आरोप लगाने की राजनीति आम जनता पर कोई असर डालने वाली नहीं है। प्रधानमंत्री पर राहुल गांधी का यह आरोप पहला नहीं है। इससे पहले भी वे कई बार प्रधानमंत्री को निशाना बनाकर बयानों के बाण चलाते रहे हैं। पिछले दिनों ही नोटबंदी का विरोध करते हुए उन्होंने कहा था कि संसद में वे अपने भाषण से भूचाल ला सकते हैं। राहुल के ऐसे बयान इसी धारणा को मजबूत कर रहे हैं कि वे बिना समझे कुछ भी बोल देते हैं। वे अपनी बात संसद में रखना चाहते थे। लेकिन सत्र के आखिरी दिन वे प्रधानमंत्री से मिलने चले गए। सो, उनका भी खुलासा अभी टला हुआ है। जो खुलासा (सहारा डायरी) उन्होंने किया भी उसे उच्चतम न्यायालय ही खारिज कर चुका है।

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की राजनीति और दलीलों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा और नोटबंदी पर कांग्रेस एक सशक्त और तार्किक विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पाई है, कांग्रेस सड़कों पर आंदोलन खड़े नहीं कर पाई। राहुल गांधी के नेतृत्व में एक भी जत्थे ने बैंकों या एटीएम अथवा रिजर्व बैंक का घेराव नहीं किया। राजनीतिक कौशल और कलाबाजी के आधार पर राहुल गांधी की प्रधानमंत्री मोदी से तुलना भी नहीं की जा सकती। मोदी एक मंजे, घुटे, खांटी नेता हैं, जबकि राहुल अभी संघर्ष करना सीख रहे हैं। जनता के खाली हाथ, गरीब के भूखे पेट और किसान−मजदूर−दिहाड़ीदार के जर्जर और अनिश्चित जीवन और पेशे को लेकर राहुल लगातार मोदी सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। यह दीगर है कि उनका प्रभाव क्या पड़ रहा है या देश उन्हें कितनी गंभीरता से ग्रहण कर रहा है? 
 
चूंकि राहुल ने प्रधानमंत्री के खिलाफ निजी भ्रष्टाचार के सबूत और दस्तावेज होने का दावा किया है, लिहाजा यह आपराधिक मामला लगता है। होना तो यह चाहिए था कि संसद में बोलने से पहले, एक नागरिक के तौर पर राहुल गांधी अपना फर्ज निभाते हुये इस मामले के संबंध में अपने आवास के निकटस्थ पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज कराते। आपराधिक कर्म को दबाना या छिपाना भी एक अपराध है।
 
जनता लोकतंत्र की सबसे बड़ी अदालत है, अब जबकि संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त हो चुका है तो राहुल गांधी को प्रेस वार्ता के जरिए साक्ष्यों और दस्तावेजों का जनता के सामने खुलासा करना चाहिए। राहुल गांधी यह न सोचें कि संसद में बोलने से मामला चिरकाल के लिए अभिलेखागार में दर्ज हो जाएगा। यदि राहुल प्रेस के जरिए इस मामले को सार्वजनिक करते हैं, तो पूरा देश पढ़ सकेगा। उसके विश्लेषण होंगे, संपादकीय छपेंगे और लंबे समय तक मुद्दा चर्चा में रहेगा। जनता के मानस रूपी अभिलेखागार में वे तथ्य दर्ज हो जाएंगे, जो राहुल बताना चाहते हैं। सिर्फ यह कहना कि प्रधानमंत्री उनसे घबराए, डरे हुए हैं, नासमझी का बयान है। कहीं ऐसा तो नहीं कि संसद के बाहर मानहानि केस के भय से राहुल बोलें ही नहीं और संसद सत्र के साथ इन आरोपों का भी अवसान हो गया है। देश इस स्थिति को बर्दाश्त नहीं करेगा, क्योंकि मामला प्रधानमंत्री से सीधा जुड़ा है। राहुल गांधी ने निजी तौर पर प्रधानमंत्री मोदी को 'दागदार' साबित करने की कोशिश की है। लगता है कि गुब्बारे उड़ाने की राहुल गांधी की जो रणनीति थी वो संसद सत्र के साथ फट गयी है। 
 
मामला गंभीर है, लिहाजा इसे संसद के लबादे में ही नहीं ढकने दिया जा सकता। यदि राहुल गांधी के पास प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ भ्रष्टाचार के ठोस सबूत और सही दस्तावेज नहीं हुए, तो कांग्रेस नेता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए। संसद में हंगामे के लिए जितना दोषी सत्ता पक्ष को करार दिया जा रहा है, उतनी ही जिम्मेदारी विपक्ष की भी थी। यह विडंबना होगी कि नोटबंदी और प्रधानमंत्री के खिलाफ संसद में चर्चा नहीं हो सकी, लेकिन सड़कों पर बयान तथा आरोपों की झड़ी लगी रही। भाजपा की दलीलें हैं कि राहुल गांधी के बोलने से उन्हें फायदा होता है, तो संसद में उन्हें बोलने देते। बेशक प्रधानमंत्री हरेक बयान का जवाब नहीं देते, लेकिन इस बार आरोप निजी तौर पर प्रधानमंत्री के खिलाफ ही हैं। लिहाजा प्रधानमंत्री को कन्नी काटने के बजाय हस्तक्षेप करना चाहिए था। अफसोस ऐसा हो नहीं पाया।
 
राहुल को इस बात की चिंता नहीं रहती कि कहीं उनका उपहास तो नहीं हो रहा है। आम जनता में फिजूल की सनसनी और व्यर्थ की उत्सुकता जगाने से कांग्रेस का क्या हित होने वाला है, इसका जवाब सिर्फ और सिर्फ राहुल गांधी ही दे सकते हैं। उनका यह कहना भी उचित नहीं है कि उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा है। सवाल है कि उन्हें बोलने से कौन मना कर रहा है? कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और वाम दल मिलकर ही संसद में हंगामा कर रहे थे, और नोटबंदी पर बहस के लिए शर्तें लगायी जा रही थीं। अगर बहस ही करनी थी तो इसके लिये इतनी शर्तों की क्या जरूरत है? राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का जो आरोप लगाया उसे वो जनता के सामने लाने से कतरा रहे हैं। अगर वास्तव में उनके पास कोई पुख्ता जानकारी है या दस्तावेज हैं, उन्हें देश की जनता को जरूर बताना चाहिए। 
 
लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च है तो राहुल आम जनता के बीच भी भ्रष्टाचार का खुलासा कर सकते हैं। अकाट्य प्रमाणों के साथ अगर वे भ्रष्टाचार का खुलासा करते हैं तो भी प्रधानमंत्री मुसीबत में पड़ जाएंगे। आश्चर्य की बात है कि देश के एक जिम्मेदार राजनीतिक परिवार से आने वाले जिम्मेदार राजनेता होने के बावजूद राहुल घोटाले में शामिल न तो किसी का नाम बता रहे हैं और न ही घोटाले की प्रक्रिया को स्पष्ट कर रहे हैं। फिर राहुल गांधी को यह भी समझना चाहिए कि उनकी ही पार्टी के नेताओं ने हाल ही में मीडिया को बुलाकर केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू के कथित भ्रष्टाचार की जानकारी दी थी और मामले को संसद में भी उठाया था।
 
अब जब राहुल गांधी बड़े गंभीर आरोपों का एक बड़ा सा गुब्बारा सामने रख चुके हैं, तो कुछ सवाल खड़े होते हैं। इनमें एक सवाल यह है कि राहुल गांधी संसद के प्रति जवाबदेह हैं, या कि भारत के लोकतंत्र के प्रति जिसका कि संसद महज एक हिस्सा है। लोकतंत्र संसद से बहुत बड़ी होती है, और एक राजनीतिक दल के नेता, देश के नागरिक, जनता के निर्वाचित लोग लोकतंत्र के प्रति अधिक जवाबदेह होते हैं। ऐसे में हर नागरिक की यह जिम्मेदारी होती है कि वे उनकी जानकारी में आए हुए भ्रष्टाचार के मामलों को जांच एजेंसियों को भेजें, या कि अदालत तक जाने की उनकी ताकत हो, तो वे अदालत में जनहित याचिका लगाएं, या कम से कम मीडिया को तो यह जानकारी दे ही दें, ताकि जांच एजेंसियां उस पर कार्रवाई को मजबूर हो जाएं।
 
देश की जनता को याद होगा कि मनमोहन सरकार के वक्त राहुल गांधी ने दिल्ली प्रेस क्लब में मीडिया के सामने मनमोहन मंत्रिमंडल द्वारा लाया जा रहा एक कानून फाड़कर फेंक दिया था, और यह पूरा मामला मीडिया के सामने एक सोचे−समझे तमाशे की तरह पेश किया गया था। वह तो कांग्रेस और यूपीए का घरेलू मामला था लेकिन अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सचमुच भ्रष्ट हैं, तो यह आरोपों से परे का मामला है और कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, देश के सांसद, राहुल गांधी की यह भी जिम्मेदारी बनती है कि वे बिना देर किए इस मामले का भांडाफोड़ करें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो यह समझा जाएगा कि वे लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी पूरी नहीं कर रहे हैं, और न ही उनके पास ऐसे कोई सुबूत हैं।
 
भारत के प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार के सुबूत किसी के पास हैं, तो वे सुबूत न महज संसद में सामने आने चाहिए, बल्कि संसद के बाहर भी देश के सामने आने चाहिए, और जब ऐसे सुबूत सामने आ जाएं तो न सिर्फ प्रधानमंत्री को जवाबदेह होना चाहिए, बल्कि देश की जांच एजेंसियों को भी खुद उसे परखना चाहिए। फिर एक दूसरी बात यह भी है कि अगर प्रधानमंत्री को अपने काम पर बहुत भरोसा है, तो उन्हें राहुल गांधी का यह बयान देश की तीनों−चारों बड़ी जांच एजेंसियों को भेज देना चाहिए, और यह मांग करनी चाहिए कि वे राहुल गांधी से मिलकर सुबूत हासिल करें, और उसकी जांच करें।
 
स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में होना तो यह चाहिए कि देश के सर्वोच्च स्तर पर भ्रष्टाचार की बात किसी आम राजनीतिक बयानबाजी की तरह न तो उछाली जानी चाहिए, और न ही अनदेखी की जानी चाहिए। राहुल गांधी ने यह बयान देकर मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने सरीखा काम किया है, और उनको इस सिलसिले को एक न्यायंसगत और तर्कसंगत अंत तक पहुंचाना चाहिए, वरना वे अपना थोड़ा−बहुत मौजूदा वजन भी खो बैठेंगे। यूपी के जौनपुर और बहराइच रैली में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर तीखा हमला किया। राहुल गांधी को आरोपों के साथ सुबूत पेश करने चाहिए। राहुल को अब देश के सामने अपनी समझदारी का सुबूत देना होगा।
 
- आशीष वशिष्ठ

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