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विश्लेषण

देश के नाम प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन के निहितार्थ

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Publish Date: Jan 3 2017 1:06PM
देश के नाम प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन के निहितार्थ

नोटबंदी के बाद कई बैंकों द्वारा ब्याज दरों में कमी से जहां इन बैंकों से नए ऋण लेने वाले नागरिकों को राहत मिलने के आसार बने हैं वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नए साल की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संदेश के कई सियासी मायने लगाए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उद्बोधन ने सबको इस मायने में चौंकाया कि लोगों में निश्चित रूप से कहीं ना कहीं एक भय बैठा हुआ था कि नोटबंदी और काला धन से जुड़ी कोई नई घोषणा या रणनीति घोषित होगी, पर ऐसा हुआ नहीं। हालांकि प्रधानमंत्री ने किसानों, ग्रामीणों, महिलाओें, छोटे उद्यमियों और बुजुर्गों के लिए कुछ रियायती घोषणाएं अवश्य कीं पर उससे ना तो आम लोगों में कोई उत्साह ही नजर आ रहा है और ना ही कोई विशेष लाभ होता दिख रहा है।

सोशियल मीडिया पर जिस तरह से कई दिनों पहले से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 31 दिसंबर को राष्ट्र के नाम संदेश के नाम पर भय का वातावरण बनाया जा रहा था, वह भी निर्मूल सिद्ध हुआ। हालांकि आम नागरिकों को यह आशा अवश्य थी कि प्रधानमंत्री अपने उद्बोधन में नोटबंदी के आमजन पर पड़े प्रभाव और भविष्य में इससे अर्थ व्यवस्था पर होने वाले सकारात्मक प्रभावों के बारे में अवश्य कुछ ना कुछ कहेंगे, पर वह भी सुनने को नहीं मिला। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने उद्बोधन में 50 दिन के नोटबंदी यज्ञ में सहयोग के लिए लोगों का आभार व्यक्त करने के साथ ही साफ किया कि सरकार बेईमानों पर अब तकनीक के सहारे लगाम कसेगी। उन्होंने अपने उद्बोधन में बेईमानों को नहीं बख्शने का साफ संदेश दिया।
 
दरअसल नोटबंदी जिसे प्रधानमंत्री विमुद्रीकरण कह कर पुकार रहे हैं, ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। नोटबंदी से कितना कालाधन सरकार के पास आया है यह तो सरकार ने स्पष्ट नहीं किया पर देश में कश्मीर में अलगाववादियों द्वारा पत्थरबाजी की घटनाओं और नक्सलवादी गतिविधियों में अवश्य कमी आई है। यह भी सही है कि राजनीतिक दलों को छोड़ दिया जाए तो आम नागरिकों ने लाख परेशानियों के बावजूद नोटबंदी को सहर्ष स्वीकारा भी। नए नोटों की आए दिन की पकड़ा−धकड़ी से लोगों में सरकार के प्रति सकारात्मकता बनी वहीं व्यवस्था को लेकर काफी निराशा भी हुई। आखिर सरकार के बड़े व लंबे हाथ हैं, बैंकों के लिए बैंकिंग रेगूलेशन एक्ट बना हुआ है। रिजर्व बैंक का काम ही बैंकिंग व्यवस्थाओं के सुचारू संचालन को बनाए रखना है, उसके बावजूद जहां सरकार द्वारा पहले चार हजार, फिर साढ़े चार हजार और उसके बाद दो हजार रुपए बदलवाने की व्यवस्था की गई उसके बावजूद लोगों के पास थोक में नई करेंसी पकड़ी गई। यह सिलसिला अभी भी जारी है। आखिर बिना बैंकों की मिलीभगत के ऐसा कैसे हो सकता है। इतनी अधिक मात्रा में नई करेंसी लोगों के पास कैसे जा सकती है? यहां तक कि लोगों के पास नई करेंसी के बंडल के बंडल पकड़ में आ रहे हैं। यह सब कहीं ना कहीं व्यवस्था को दोष तो अवश्य है।
 
इससे यह भी साफ हो जाता है कि देश के अधिकांश बैंकिंग क्षेत्र व बैंकिंग कार्मिकों द्वारा अच्छा काम किया गया पर कुछ बैंकों और उनके कार्मिकों द्वारा जिस तरह से सरकार की कालाधन पर रोक के लिए एक हजार और पांच सौ रुपए की नोटबंदी को पलीता लगाने के प्रयास किए गए, इसे किसी भी स्थिति में क्षम्य नहीं कहा जा सकता। एक पुनीत काम को किस तरह से विफल किया जा सकता है हमारी बैंकिंग व्यवस्था इसका जीता जागता उदाहरण है। यह साफ हो जाना चाहिए कि केवल और केवल मात्र रुपए बदलवाने या बैंकों में पुराने नोट जमा कराने व लोगों को कतार से होने वाली व्यवस्था को रिजर्व बैंक व देश के बैंक सही कर लेते तो नोटबंदी की आलोचना की गुंजाइश ही नहीं रहती। खाली एटीएम और बैंकों की लंबी कतारों ने सरकारी व्यवस्था की पोल खोलने के साथ ही सरकार की घोषणा को लेकर दुष्प्रचार का आसान अवसर उपलब्ध करा दिया। जब हम तात्कालिक जानकारी के आधार पर ही सुनामी व समुद्री तूफानों जैसी आपदाओं से सफलता पूर्वक निपट सकते हैं और इसमें दुनिया के देश हमारे आपदा नियंत्रण का लोहा मानते हैं वहीं सारी स्थिति साफ होने के बावजदू देश का बैंकिंग सिस्टम जनअपेक्षाओं में खरा उतरने में पूरी तरह से सफल नहीं हो पाया। यह बात बेमानी है कि सरकार के पास नई करेंसी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध ही नहीं थी। यह साफ हो जाना चाहिए कि जितना पैसा सिस्टम से हटाया जा रहा था या हटाया जा रहा है, एक साथ उतनी नई करेंसी बाजार में उतारने की ना तो आवश्यकता थी और ना ही आवश्यकता है।
 
जहां तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 31 दिसंबर को देश के नाम संबोधन में की गई घोषणाओं का प्रश्न है किसानों को ऋण जमा कराने के लिए दिए गए दो माह के ग्रेस अवधि के ब्याज को सरकार द्वारा वहन करने, गरीबों को अनुदानित आवास ऋण, उद्यमियों की क्रेडिट लिमिट, गर्भवती महिलाओं को 6 हजार रु. देने या बुजुर्गों को दस साल तक साढ़े सात लाख रुपए की जमा पर 8 प्रतिशत ब्याज और उसे मासिक रूप से देने की घोषणाओं का प्रश्न है, इससे आम लोग खास प्रभावित नहीं होने वाले हैं। इसका एक कारण यह है कि कमोबेश यह योजनाएं पहले से हैं केवल और केवल इन्हें परिवर्तित किया गया है। सरकार द्वारा किसानों को फसली कर्जे पर पहले से ही तीन प्रतिशत ब्याज अनुदान दिया जा रहा है, राजस्थान, मध्य प्रदेश सहित कई प्रदेशों में राज्य सरकारों द्वारा शेष 4 प्रतिशत का भी अनुदान दिया जा रहा है, ऐसे में बदलाव केवल इतना भर है कि ऋण जमा कराने की अवधि दो माह की ब्याज राशि अब पूरी तरह से केन्द्र वहन करेगा, इसके लिए नोटबंदी एक कारण है ऐसे में इसे बड़ी रियायत नहीं माना जा सकता। इसी तरह से गांवों में आवास ऋण आज भी दिए जा रहे हैं केवल ब्याज अनुदानित किया गया है, कारोबारियों को क्रेडिट लिमिट की सीमा बढ़ाने से कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा। इसी तरह से गर्भवती महिलाओं को पहले से ही सहायता राशि दी जा रही है केवल इसे बढ़ाया गया है। बुजुर्गों की योजना का लाभ खासतौर से पेंशनर्स को ध्यान में रखकर किया गया है पर इससे बैंकों को दस साल के लिए आसानी से राशि उपलब्ध हो सकेगी। अभी यह साफ नहीं हो पाया है कि ब्याज राशि कर मुक्त होगी या नहीं। यदि कर मुक्त नहीं होती है तो इसका भी अधिक लाभ नहीं हो पाएगा। हालांकि इस मायने में प्रधानमंत्री की सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने बेईमानों के खिलाफ संघर्ष को ओर अधिक पैना करने का विश्वास दिलाया है।