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द्वितीय विश्वयुद्ध में बमबारी से नोटबंदी की तुलना गलत

द्वितीय विश्वयुद्ध में बमबारी से नोटबंदी की तुलना गलत

संसद का प्रायः पूरा शीत सत्र हंगामे के साथ समाप्त हुआ। नाम मात्र का काम हो सका। हंगामे के माध्यम से विपक्षी नेताओं ने आमजन के प्रति अपनी परेशानी का प्रदर्शन किया, लेकिन उसके बाद की इनकी गतिविधियां दूसरी तस्वीर पेश करती हैं। इसमें आमजन की चिन्ता कम राजनीति अधिक है। सरकार पर जिस तरह हमला बोला जा रहा है, उसमें चुनावी रणनीति के अलावा कुछ नहीं है। जिन्होंने समय रहते कालेधन की समाप्ति हेतु एक तिनका भी नहीं उठाया, वह बड़े−बड़े सुझाव दे रहे हैं। आरोप ऐसे लगा रहे हैं, जैसे पहले की सरकारें बेहद ईमानदार थीं। समस्त गड़बड़ी अभी हो रही है।

भाषण का वजन बढ़ाने हेतु तुलना की जाती है, किन्तु यही तुलना बोलने वाले के स्तर को भी उजागर कर देती है, ऐसे में अनेक नेता संभल कर बोलते हैं। कुछ लोग हद पार कर जाते हैं, जहां गंभीरता व हास्य में फर्क कर पाना मुश्किल हो जाता है। राहुल गांधी व अरविंद केजरीवाल में बराबरी का मुकाबला दिखाई दे रहा है। राहुल ने विमुद्रीकरण की तुलना द्वितीय विश्वयुद्ध की बमबारी से की, क्या माना जाए कि उन्हें द्वितीय विश्वयुद्ध की पर्याप्त जानकारी है। परमाणु बम के प्रयोग से लेकर लाखों लोगों की मौत को विमुद्रीकरण से जोड़ना क्या दर्शाता है? केजरीवाल नरेन्द्र मोदी पर हमले के अलावा कुछ सोच नहीं सकते। इसके लिए उन्होंने दिल्ली के शासन का अघोषित त्याग कर दिया है। केवल सुविधाएं ग्रहण कर रहे हैं। 
 
प्रश्न यही है कि क्या ये नेता आमजन को लेकर परेशान हैं। क्या कहीं से भी इनकी परेशानी झलक रही है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जौनपुर की जनसभा में चालीस मिनट भाषण दिया। पूरा समय उन्होंने नरेन्द्र मोदी को समर्पित कर दिया। सपा, बसपा की चर्चा नहीं की। केजरीवाल ने ऐसा ही भाषण लखनऊ में दिया। दोनों ही नेता अपनी धुन में हैं। लोग विकल्प पूछते हैं। इनके पास कोई जवाब नहीं होता। खुद इनकी पार्टियों की अब ऐसी विश्वसनीयता नहीं जो चमत्कार दिखा सकें। इसलिए मोदी सरकार को बेईमान और विमुद्रीकरण को सबसे बड़ा घोटाला बताते घूम रहे हैं। ये इस बात पर भी विचार करने को तैयार नहीं कि इनकी बातों से आम जन कितना प्रभावित हो रहा है। इस प्रकार की बातों के दो मकसद हैं। एक तो ये नेता आपस में ही एक−दूसरे को पीछे छोड़ना चाहते हैं। दूसरा यह कि ये आमजन को भड़काने का प्रयास कर रहे हैं।
 
नरेन्द्र मोदी के इस आरोप में दम है कि कई नेता आमजन को भड़काने का प्रयास कर रहे हैं। संसद में हंगामा, राष्ट्रपति को ज्ञापन व उसके बाद चल रहे इनके भाषण इसी की ताकीद करते हैं। इधर संसद का सत्र समाप्त हुआ, उधर विपक्षी दलों की एकजुटता बिखर गयी। कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति से मिलने जा पहुंचा, यह बात अन्य विपक्षी दलों को नागवार गुजरी। आम जन की परेशानी पर जमीन आसमान एक करने वाले दल, एक दूसरे से बढ़त बनाने की फिराक में जुट गए। एक समय था जब संसद में बेहतर विचार व्यक्त करने वालों की वाहवाही होती थी, किसी नेता की लोकप्रियता बढ़ाने में उसकी संसदीय सक्रियता का अहम योगदान होता था, किन्तु इस बार संसद को बाधित रखने और हंगामा करके लोकप्रियता बढ़ाने का प्रयास चल रहा था। राष्ट्रपति के यहां जाना वस्तुतः पूर्णाहुति जैसा था। सोचा यह गया कि कांग्रेस के नेतृत्व में अधिक से अधिक पार्टी नेताओं को वहां तक ले चला जाए। संसद का सत्र समाप्त होने के समय यह आयोजन रखा गया था। सत्र की शुरूआत में यही कार्य तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने किया था। ममता भी कोलकाता से यही सोच कर आयी थीं। उनका मकसद भी विमुद्रीकरण विरोधी राजनीति की कमान संभालने का था, तब अन्य विपक्षी दलों को उनकी नीयत पर शक हुआ। उन्होंने ममता की राष्ट्रपति भवन तक पदयात्रा से अपने को अलग कर लिया। मतलब साफ था, अन्य दल विरोध की कमान ममता को सौंपना नहीं चाहते थे। ममता को भी केवल अरविन्द केजरीवाल और शरद यादव का साथ मिला। इन दोनों की स्थिति भी लगभग एक जैसी होती जा रही है। शरद यादव की पार्टी बिहार में सत्तारूढ़ है लेकिन वहां इनकी कोई कद्र नहीं बची। वहां इनके लिए कोई काम भी नहीं बचा। सरकार और जद (यू) दोनों नीतीश कुमार चला रहे हैं। शरद यादव को जो भी विपक्षी नेता पहले पकड़ लेता है, उसी के साथ चल देते हैं।
 
कांग्रेस ने जब राष्ट्रपति भवन जाने का कार्यक्रम बनाया तब भी यही हुआ। दिग्गज कांग्रेसी प्रतिनिधिमंडल के लिए संख्या बढ़ाने को हाथ पैर मार रहे थे। वामपंथी, सपा, बसपा आदि पार्टियों ने साफ इनकार कर दिया। कांग्रेस अब केन्द्र में सत्तारूढ़ नहीं रही, जो उसे सपा−बसपा का हर समय साथ मिलता रहे। संसद में हंगामे तक बात अलग थी। इन्हें भी सरकार का विरोध करना था, लेकिन जब प्रतिनिधिमंडल में शामिल होने की बात आयी, तो ये सावधान हो गये। इन्हें लगा कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी विपक्ष का नेता बनने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में यह पार्टियां अलग हो गयीं। पकड़ में एक बार फिर शरद यादव आ गए। यह दिलचस्प प्रकरण है। बताया गया कि कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद ने बातों ही बातों में शरद यादव को अपनी कार में बैठा लिया और ज्ञापन देने राष्ट्रपति भवन तक ले गए।
 
मतलब साफ है आमजन की दुहाई देकर संसद का सत्र नहीं चलने दिया गया। यहां सरकार को घेरने के लिए ही शीतकालीन सत्र समाप्त हुआ, असलियत सामने आने लगी। आमजन की चिन्ता इनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा थी, लेकिन अब यह पैंतरे बाजी में बदल गयी। यदि आमजन की इतनी ही चिन्ता थी, तो नेतृत्व को लेकर राजनीति करने की क्या आवश्यकता थी। राष्ट्रपति भवन तक की यात्रा को इस राजनीति का हिस्सा क्यों बनाया गया जबकि राष्ट्रपति विमुद्रीकरण की प्रशंसा कर चुके थे। राष्ट्रपति तक अपनी बात पहुंचाने का लोगों को अधिकार है। किन्तु संसद में हंगामे से उपजे नेतृत्व के मुद्दे को वहां अपरोक्ष रूप से ले जाने की आवश्यकता नहीं थी। राष्ट्रपति के विचारों को समझते तो इस विषय पर ज्ञापन देने का औचित्य नहीं था। जाहिर है विरोध की समूची कवायद आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर चल रही है। आमजन की परेशानी से इस राजनीति का कोई लेना देना नहीं है।
 
- डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

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