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विश्लेषण

विपक्ष बर्बादी का अलाप करता रहा, हक़ीक़त कुछ और थी

By डॉ. दिलीप अग्निहोत्री | Publish Date: Jan 10 2017 3:35PM
विपक्ष बर्बादी का अलाप करता रहा, हक़ीक़त कुछ और थी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राष्ट्र के नाम सन्देश वस्तुतः आमजन के प्रति आभार की अभिव्यक्ति थी, जिसने पचास दिनों की कठिनाई के बावजूद धैर्य बनाए रखा। इतना ही नहीं इसी आमजन ने विपक्ष के हंगामे व उकसावे को सिरे से नजर अन्दाज किया। विपक्षी दल कृषि, उद्योग, छोटे व्यापार, अर्थव्यवस्था सबके बर्बाद होने का दावा करते रहे, जब इसका असर नहीं हुआ तो मोदी पर निजी हमले होने लगे, किन्तु आमजन का समर्थन हासिल करने में उन्हें सफलता नहीं मिली। इसी दौरान महाराष्ट्र, गुजरात, चंडीगढ़ के स्थानीय निकाय चुनावों में भी विपक्षी पार्टियों को मुंह की खानी पड़ी। चलते−चलते अरुणाचल प्रदेश में भी भाजपा की सरकार बन गयी। यह भी कांग्रेस के प्रति निराशा का परिणाम था। किसी भी प्रधानमंत्री के लिए इससे बड़ी राहत की बात नहीं हो सकती। बड़ी कठिनाई के बाद भी उनके प्रति जन सामान्य का विश्वास कायम रहा जबकि इस कठिनाई को भुनाने की फिराक में विपक्ष ने मुंह की खाई है। ऐसे में प्रधानमंत्री का राष्ट्रीय संबोधन के द्वारा आमजन का अभिनंदन करना, आभार व्यक्त करना, धन्यवाद देना स्वाभाविक था। उनके संबोधन का मूल भाव यही था। अन्य बातें भी इसी से जुड़ी हैं। इनसे केवल वर्तमान का ही विचार नहीं हो सकता, वरन् बजट में आम जन के हित का भी अनुमान लगाया जा सकता है।

आमजन के धैर्य व समर्थन से मोदी भावुक भी हुए, वहीं उनका आत्म विश्वास भी बढ़ा है। उन्होंने विमुद्रीकरण को देश हित में उठाया गया कदम बताया। इसके प्रति उनकी दृढ़ता बढ़ी है। संकल्प मजबूत हुआ है। इसके साथ ही मोदी ने अंबेडकर के प्रति भी सम्मान व्यक्त किया। पहली बात तो यही है कि अंबेडकर चाहते थे कि प्रत्येक दस वर्ष में विमुद्रीकरण होना चाहिए। वह विद्वान अर्थशास्त्री थे। भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था के संबंध में उनके स्पष्ट विचार थे। लेकिन उनके नाम से राजनीति करने वालों ने सत्ता में रहते हुए विमुद्रीकरण का साहस नहीं दिखाया। उनको लगता था कि इससे लोगों को शुरूआती परेशानी होगी। इससे वह सरकार के विरोधी हो जाएगे। इसका खामियाजा चुनाव में भुगतना पड़ता। इस डर से वह विमुद्रीकरण के इतने व्यापक कदम नहीं उठा सके लेकिन मोदी ने चुनाव व पार्टी से ज्यादा अहमियत कालेधन की समाप्ति को दी। इसीलिए कैशलेश ट्रांजेक्शन संबंधी नए एप का नामकरण मोदी ने अंबेडकर के नाम से किया। सरकार ने भीम एप लांच किया है। कैशलेश ट्रांजेक्शन की दिशा में यह अहम कदम साबित होगा। मोदी ने विश्वास व्यक्त किया कि वह दिन दूर नहीं जब देश का सारा कारोबार भीम एप के माध्यम से होगा। अंगूठा व्यक्ति की पहचान बनेगा। आधार से जुड़े लेन−देन में अंगूठा ही माध्यम बनेगा। भीम एप को एनपीसीआई ने तैयार किया है। आधार लिंक के साथ इसके माध्यम से कोई व्यक्ति वित्तीय भुगतान कर सकता है। वैसे यह तो मानना ही पड़ेगा पुराने नोट बन्द करने से भ्रष्ट नेताओं से लेकर अधिकारियों तक का छिपा हुआ कालाधन सामने आ गया। मोदी ने कहा भी है कि खुफिया एजेंसियों ने बड़ी मात्रा में नकली नोट दुश्मनों के पास होने की सूचना दी थी। नोटबन्दी ने एक ही झटके में नकली नोटों का जखीरा निष्प्रभावी कर दिया। विपक्ष जिस बर्बादी का अलाप कर रहा था, उसमें भी सच्चाई नहीं थी। इसके विपरीत नोटबन्दी की अवधि में रबी की बोआई बढ़ी, वहीं कर संग्रह व आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि हुई है।
 
यह आशंका थी कि नोटबन्दी का जीडीपी पर एक तिमाही असर रहेगा, किन्तु ऐसा कोई प्रतिकूल प्रभाव दिखाई नहीं दिया। दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था पर इसका अनुकूल प्रभाव अवश्य पड़ेगा। बैंकों के पास अधिक रकम होगी। वहीं सरकार का राजस्व भी बढ़ेगा। नोटबन्दी से सरकार के खजाने पर भी कोई असर नहीं पड़ा है। आर.बी.आई. की रिपोर्ट में भी कहा गया कि नोटबन्दी से देश की अर्थव्यवस्था वह मुकाम हासिल करेगी, जहां तक पहुंचना मुश्किल लग रहा था। इससे अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव नजर आएगा। यह भी सुझाव दिया गया कि कालेधन की समस्या से निपटने का सबसे अच्छा तरीका प्रशासन और सेवाओं की क्वालिटी को बेहतर बनाना है। अत्यधिक नियमन, सख्त जुर्माने और कर ढांचे से बचना चाहिए। अमेरिका में व्यक्तिगत आयकर की दर एक प्रतिशत बढ़ाने से कालेधन की अर्थव्यवस्था में एक प्वाइंट चार प्रतिशत की वृद्धि हो गयी। इस उदाहरण से हमको भी सबक लेना चाहिए। अर्थव्यवस्था व कर संबंधी अनेक तथ्य भी उजागर हुए हैं। कितने लोगों की आमदनी दस लाख से ज्यादा है, कितने लोगों के पास कारे हैं।
 
प्रधानमंत्री को आमजन का जो सहयोग मिला वह उन्हें कालेधन की समाप्ति की दिशा में अन्य कदम उठाने को प्रेरित करेगा। मोदी इस दिशा में कार्य भी कर रहे हैं। यह संयोग था कि नोटबन्दी के दौरान ही दोहरे कराधान पर सिंगापुर से संधि हो गयी। इससे कालाधन खपाने का एक रास्ता और बन्द हो गया। यह दर्शाता है कि मोदी सरकार कालाधन समाप्त करने की दिशा में गंभीर है। भारत व सिंगापुर ने दोहरे कराधान से बचाव की संधि में संशोधन की प्रक्रिया पूरी कर ली। इससे कंपनियों के लिए कर अदायगी से बचना मुश्किल हो जाएगा। भारत में निवेश के बहाने कालेधन को सफेद बनाने का पूरा तंत्र भी समाप्त हो जाएगा। इसके पहले मॉरीशस, साइप्रस और स्विटजरलैंड के साथ ऐसी संधि हो चुकी है। कालाधन छिपाने वालों के लिए ये सभी जगहें सुरक्षित व आकर्षक मानी जाती थीं।
 
नोटबन्दी के बाद प्रधानमंत्री ने पचास दिन मांगे थे। शायद कोई दागी शासक ऐसा करता तो आमजन उस पर इतना विश्वास नहीं करता। मोदी की छवि ने भी उनका साथ दिया। उन्होंने अपने संबोधन में आभार के साथ−साथ भविष्य की योजनाओं पर भी अपरोक्ष रोशनी डाली है। सरकार अपनी योजनाओं में कमजोर व मध्यम वर्ग को अधिक महत्व देगी। इसके अलावा गांव व किसान भी उसकी शीर्ष प्राथमिकताओं में रहेंगे। वैसे नोटबन्दी का अभी पूरा हिसाब सरकार से मांगना बेमानी है। इन पचास दिनों में सरकार की प्राथमिकता आमजन की कठिनाई दूर करना था। अन्य आकलन इसके बाद होंगे। फिर भी यह तो साफ है कि बड़ी मात्रा में दबी पड़ी धनराशि प्रचलन में आ गयी, छोटे नोटों का हिस्सा दो गुना होकर पैंतीस प्रतिशत पर पहुंच गया। विकसित देशों में बड़े नोटों का हिस्सा दस से पन्द्रह प्रतिशत है, हमारे यहां यह सत्तर प्रतिशत है। इस व्यवस्था में बदलाव शुरू हो गया है। इन सबका दूरगामी सकारात्मक प्रभाव होगा।
 
- डॉ. दिलीप अग्निहोत्री