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विश्लेषण

कश्मीर का भविष्य राजनीतिक इच्छाशक्ति और सोच पर

By सुरेश एस डुग्गर | Publish Date: Jan 11 2017 12:34PM
कश्मीर का भविष्य राजनीतिक इच्छाशक्ति और सोच पर

कश्मीर। इस शब्द से शायद ही कोई अपरिचित होगा हिन्दुस्तान में ही नहीं बल्कि सारे विश्व में। चौंकाने वाली बात यह है कि कश्मीर से पाकिस्तान का बच्चा-बच्चा इस तरह से परिचित है जिस तरह, वह पैदा होने के बाद सबसे पहले मां शब्द से परिचित होता है। कश्मीर, जिसे धरती का स्वर्ग भी कहा जाता है, दुनिया की उत्पत्ति के साथ ही जमीन पर था और इसके नाम से परिचित होने में उन पचास सालों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जो दो देशों के बीच बंटवारे के बाद एक दीवार के रूप में खड़े हैं। वैसे भी पचास सालों ने कश्मीर शब्द को बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ाने में इतनी भूमिका नहीं निभाई जितनी उन 27 सालों के अरसे ने निभाई है जिनके दौरान कश्मीर में आतंकवाद फैला।

 
कश्मीर के प्रति पाकिस्तान द्वारा दिए जाने वाले वक्तव्यों या फिर उसको अंतरराष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बनाने के पाकिस्तानी प्रयासों के कारण ही नहीं बल्कि आतंकवादी हिंसा के कारण भी कश्मीर वर्ष 1998 में सुर्खियों में रहा। सिर्फ सुर्खियों में ही नहीं बल्कि वर्ष के अंत तक पाकिस्तानी प्रयास उसे चर्चा में लाने के जारी तो रहे लेकिन इतना अवश्य है कि वर्ष की शुरूआत में जो सफलता पाकिस्तान को कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में लाने के प्रति मिली थी वह वर्ष के आखिर में सलाह के रूप में मिली। अमेरीकी ‘ना’ ने उसके गुब्बारे की हवा अवश्य निकाल दी।
 
वर्ष 1998 की शुरूआत भी पिछले 27 सालों की ही तरह हिंसा के वातावरण से हुई थी जिसमें नयापन यह था कि यह चुनावों को रूकवाने के लिए तेज की गई हिंसा के साथ शुरू हुई थी। और वर्ष भर शायद ही कोई दिन कश्मीर में बीता होगा जिस दिन हिंसा ने अपना तांडव न दिखाया हो।
 
हालांकि हिंसा अपना तांडव प्रत्येक वर्ष दिखाती आई है मगर सामूहिक रूप से दिखाई गई क्रूरतम हिंसा का तांडव 1998 में कुछ अधिक ही दिखा जब आतंकवादियों ने मासूमों को कतारबद्ध करते हुए मौत के घाट उतार दिया। सिर्फ गोलियों से ही नहीं भूना गया निहत्थे मासूमों को बल्कि उन्हें तेजधार हथियारों से हलाल कर जिन्दा और मुर्दा आग में, तेल के बर्तन में डाल कर हड्डियों के कंकाल बना दिए।
 
सामूहिक हत्याकांडों का जो सिलसिला जम्मू कश्मीर में 14 अगस्त 1993 को आरंभ हुआ था उसका सबसे भयानक रूप इसी वर्ष के दौरान देखने को मिला है। जितने सामूहिक हत्याकांड आतंकवादियों ने 1993 से लेकर 1997 के अंत तक नहीं किए उससे अधिक उन्होंने वर्ष 1998 में कर डाले।
 
अगस्त 1993 से लेकर दिसम्बर 1997 तक उन्होंने सिर्फ 8 सामूहिक हत्याकांडों को अंजाम दिया था लेकिन इस साल में उन्होंने 11 हत्याकांडों को अंजाम देकर न सिर्फ कश्मीर को विश्व समाचारों की सुर्खियों में ला दिया बल्कि यह भी दर्शाया कि वे किस हद तक जा सकते हैं और कितने अमानवीय तरीके अपना कर लोगों को मौत की नींद सुला सकते हैं।
 
सामूहिक हत्याकांडों के कारण ही नहीं बल्कि दिन-ब-दिन बढ़ती हिसंक गतिविधियों, नित नए किस्म के हथियारों के इस्तेमाल तथा आतंकवाद में विदेशी आतंकवादियों का बढ़ता प्रभुत्व भी कुछ उन कारकों मे से हैं जिनके कारण कश्मीर विश्व समुदाय की चर्चा में तो रहा ही सुर्खियों में रह कर एक एजेंडे के रूप में सामने आया।
 
प्रतिदिन हिंसा से कश्मीर सराबोर रहा है। हालांकि सरकारी तौर पर वर्ष 2016 में हिंसा कम हुई है मगर जो उससे त्रस्त हुए उनके शब्दों में इस वर्ष की हिंसा ने सभी रिकार्डों को तोड़ डाला। इन 27 सालों के दौरान मारे गए कुल 51000 लोगों का आंकड़ा भी इसकी पुष्टि करता है कि हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है।
 
इसी हिंसा, जिसके कारण पिछले 27 सालों से कश्मीर न सिर्फ सुर्खियों में है बल्कि प्रत्येक वर्ष के एजेंडे के रूप में दोनों ही देशों- पाकिस्तान तथा हिन्दुस्तान में छाया रहता है। अंतर
 सिर्फ इतना है दोनों देशों के एजेंडे का कि एक (पाकिस्तान) के एजेंडे का विषय कश्मीर इसलिए है क्योंकि उसने कश्मीर को ‘राष्ट्रीय नीति’ घोषित किया हुआ है तथा वह कश्मीर में छेड़े गए तथाकथित जेहाद में हिंसा को बढ़ा रहे आतंकवादियों को सभी प्रकार के समर्थन व सहायता- तन, मन, धन की घोषणा बार-बार करता है। जबकि दूसरे (हिन्दुस्तान) के लिए कश्मीर को एजेंडे के रूप में इसलिए लेना पड़ता है क्योंकि वह फैली हिंसा, आतंकवाद को समाप्त करने के प्रति वचनबद्ध है।
 
फैली हिंसा का एक खास पहलू यह रहा कि इसे संचालित करने वाला न सिर्फ एक विदेशी मुल्क (पाकिस्तान) था बल्कि इसे फैलाने वाले भी 99 प्रतिशत विदेशी ही थे। यह विदेशी आखिर कौन हैं? ये हैं विदेशी आतंकवादी जिन्हें भाड़े के सैनिक कहा जाता है। वे किराए के टट्टू होते हैं जो धन लेकर कहीं भी हिंसा फैला सकते हैं। इस पहलू के कारण ही कश्मीर में फैली हिंसा न सिर्फ खतरनाक, भयानक रूप धारण कर गई है बल्कि अमानवीय भी हो चली है।
 
हालांकि अपने आपको योद्धा समझने वाले इन विदेशी भाड़े के सैनिकों को, जिनमें करीब 27 देशों के नागरिक शामिल हैं, भारतीय सेना के जवानों ने इतना सबक अवश्य सिखाया है कि भारतीय सेना भी किसी से कम नहीं है। तभी तो इस साल में जितने विदेशी भाड़े के टट्टुओं को सेना ने मार गिराया उतने शायद ही पहले कभी मारे गए हों। यह आंकड़ा इस बार 150 की संख्या को भी पार कर गया जबकि पिछले कई सालों से, जबसे यह चर्चा थी कि विदेशी ‘मेहमान’ कश्मीर में घुस आए हैं, 12000 के लगभग भाड़े के टट्टुओं की जान ली है आतंकवाद विरोधी अभियानों ने।
 
इतना अवश्य है कि विदेशी कारक ने कश्मीर को न सिर्फ एजेंडे के रूप में चर्चित किया विश्व में बल्कि एजेंडे के रूप में भी। इस विदेशी कारक में अगर तालिबान की चर्चा को छोड़ दें तो न्यायोचित नहीं होगा। हालांकि कोई तालिबान कार्यकर्ता कश्मीर के किसी भाग में पाया नहीं गया मगर उनके नाम की जितनी चर्चा हिन्दुस्तान में हुई उतनी शायद ही अफगानिस्तान में हुई होगी जहां वे युद्धरत हैं।
 
अपने देशों के नागरिकों को कश्मीर का दौरा न करने की सलाह देने वाले वक्तव्यों ने विशेषकर विश्वभर में कश्मीर को चर्चा में रखा है। हालांकि आतंकवाद के शुरूआत में इसी तरह की सलाह अन्य कुछ देशों द्वारा अपने नागरिकों को दी जाती रही थी परंतु चौंकाने वाला तथ्य इस वर्ष यह रहा कि इसमें बड़ी संख्या में देश शामिल हो गए जिनमें अमेरिका, चीन, जापान, आस्ट्रेलिया प्रमुख थे।
 
कश्मीर का दौरा न करने की सलाह देने वाले वक्तव्य एक तरह से खास अहमियत नहीं रखते थे मगर वे बयान अवश्य अहमियत रखने वाले थे जिनमें बार-बार दोनों ही देशों से-पाकिस्तान तथा हिन्दुस्तान-से कश्मीर समस्या को सुलझा लेने का मशविरा दिया गया था कई देशों द्वारा। इस तरह के अधिकतर बयान अमेरीका ने दिए तो सबसे कम जापान ने।
 
कश्मीर संबंधी बयान जारी करने वालों में पाकिस्तान ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए। उसके यहां शायद ही कोई ऐसा नेता होगा जिसने कश्मीर संबंधी कोई बयान न दिया होगा। प्रत्येक दिन पाकिस्तान का कोई न कोई नेता, चाहे वह राजनीति से संबंध रखता हो या फिर धर्म से या फिर अलगाववाद से, कश्मीर के प्रति बयानबाजी करने में सभी एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिशों में थे।
 
इतना ही नहीं पाकिस्तानी संचार माध्यमों ने अपने सभी नेताओं का रिकार्ड तोड़ दिया हुआ है। पाकिस्तानी रेडियो, टीवी तथा अखबारों ने जितनी बार कश्मीर का नाम ‘जपा’ उसने पिछले सारे रिकार्डों को तोड़ दिया। यह ‘जाप’ सैंकड़ों या हजारों में नहीं बल्कि लाखों में है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तानी संचार माध्यमों ने एक दिन में जितने शब्द प्रसारित किए उसमें हर चौथा शब्द कश्मीर ही था।
 
हिन्दुस्तान में भी कश्मीर संबंधी बयान जारी कर उसे एजेंडा बनाने और चर्चा में लाने वाले कम नहीं हैं। कश्मीर में सक्रिय अलगाववादी तथा आतंकवादी नेताओं के बयानों की चर्चा कोई नहीं करना चाहता क्योंकि वे पिछले 27 सालों से ऐसे वक्तव्य जारी कर रहे हैं परंतु इस वर्ष की खास बात यह थी कि उनके इन बयानों में उतार-चढ़ाव अवश्य आता रहा है जो विश्व समुदाय द्वारा कश्मीर के प्रति अपनाए जाने वाले रूख पर ही निर्भर होता था।
 
मगर इतना जरूर था कि कहीं कोई आतंकवादी या अलगाववादी घटना होती थी तो, नेता तो नेता, पुलिस व वरिष्ठ सेनाधिकारी उसे कश्मीर से जोड़ने में पीछे नहीं रहते थे। इतना ही नहीं कई राज्यों के पुलिस महानिदेशकों ने भी कश्मीर संबंधी बयानबाजी कर न सिर्फ आप सुर्खियों में रहे बल्कि कश्मीर को भी सुर्खियों में रखा। हालांकि ऐसा करने में पड़ोसी राज्यों के नेता और पुलिस प्रमुख ही सबसे आगे थे।
 
- सुरेश एस डुग्गर