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विश्लेषण

चुनाव आते ही कश्मीर में शुरू हो जाती हैं राजनीतिक हत्याएं

By सुरेश एस डुग्गर | Publish Date: Mar 18 2017 11:24AM
चुनाव आते ही कश्मीर में शुरू हो जाती हैं राजनीतिक हत्याएं

कश्मीर में चुनावों की घोषणा हमेशा ही खूनी लहर इसलिए आती है क्योंकि चुनाव रोकने की अपनी मुहिम को अंजाम देने की खातिर आतंकी राजनीतिज्ञों को निशाना बनाना आरंभ कर देते हैं। लोकसभा की दो सीटों पर उप चुनाव की घोषणा के साथ ही नेताओं पर आतंकी कहर बरपना आरंभ हो गया है। वैसे पिछले 25 सालों से ऐसा ही होता आ रहा है कि जब जब चुनावों की घोषणा हुई नेताओं की जान पर बन आई।

 
दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में सोमवार की सुबह ही आतंकियों ने कहर बरपाते हुए पुलवामा के पूर्व सरपंच को गोली से उड़ा दिया। उनका शव पड़ोस के गाँव काकापोरा में पाया गया। पुलिस ने तहकीकात शुरू कर दी है। दक्षिण कश्मीर के एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि पूर्व सरपंच फयाज अहमद को आतंकवादी सुबह उठा कर ले गए और उन्हें मौत के घाट उतार दिया।
 
स्थानीय लोगों ने कहा कि फयाज अहमद, पुलवामा के काकापोरा गाँव के रहने वाले थे, उनका शव चेवा कलां गाँव में पाया गया। हालांकि हत्या की वजह अभी तक साफ नहीं है लेकिन पुलिस इस मामले में जाँच में जुट गई है। अनंतनाग और श्रीनगर लोकसभा सीटों के लिए निर्धारित उपचुनाव से पहले दक्षिण कश्मीर में यह पहली राजनीकि हत्या है। श्रीनगर संसदीय सीट के लिए चुनाव 9 अप्रैल जबकि अनंतनाग के लिए चुनाव 12 अप्रैल को हो रहे हैं।
 
अब जबकि राज्य में दो सीटों पर लोकसभा चुनाव करवाए जाने की तैयारी आरंभ हो चुकी है और उसके बाद पंचायत चुनाव करवाए जाने की बात कही जा रही है तो आतंकी भी अपनी मांद से बाहर निकलते जा रहे हैं। उन्हें सीमा पार से दहशत मचाने के निर्देश दिए जा रहे हैं। हालांकि बड़े स्तर के नेताओं को तो जबरदस्त सिक्यूरिटी दी गई है पर निचले और मंझौले स्तर के नेताओं को चुनाव प्रचार के लिए बाहर निकलने में खतरा महसूस होगा, ऐसी चिंताएं प्रकट की जा रही हैं। 
 
यह सच है कि कश्मीर में होने वाले हर किस्म के चुनावों में आतंकियों ने राजनीतिज्ञों को ही निशाना बनाया है। उन्होंने न ही पार्टी विशेष को लेकर कोई भेदभाव किया है और न ही उन राजनीतिज्ञों को ही बख्शा जिनकी पार्टी के नेता अलगाववादी सोच रखते हों।
 
यह इसी से स्पष्ट होता है कि पिछले 25 सालों के आतंकवाद के दौर के दौरान सरकारी तौर पर आतंकियों ने 671 के करीब राजनीति से सीधे जुड़े हुए नेताओें को मौत के घाट उतारा है। इनमें ब्लाक स्तर से लेकर मंत्री और विधायक स्तर तक के नेता शामिल रहे हैं। हालांकि वे मुख्यमंत्री या उप-मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंच पाए लेकिन ऐसी बहुतेरी कोशिशें उनके द्वारा जरूर की गई हैं।
 
राज्य में विधानसभा चुनावों के दौरान सबसे ज्यादा राजनीतिज्ञों को निशाना बनाया गया है। इसे आंकड़े भी स्पष्ट करते हैं। वर्ष 1996 के विधानसभा चुनावों में अगर आतंकी 75 से अधिक राजनीतिज्ञों और पार्टी कार्यकर्ताओं को मौत के घाट उतारने में कामयाब रहे थे तो वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव उससे अधिक खूनी साबित हुए थे जब 87 राजनीतिज्ञ मारे गए थे।
 
ऐसा भी नहीं था कि बीच के वर्षों में आतंकी खामोश रहे हों बल्कि जब भी उन्हें मौका मिलता वे लोगों में दहशत फैलाने के इरादों से राजनीतिज्ञों को जरूर निशाना बनाते रहे थे। अगर वर्ष 1989 से लेकर वर्ष 2005 तक के आंकड़ें लें तो 1989 और 1993 में आतंकियों ने किसी भी राजनीतिज्ञ की हत्या नहीं की और बाकी के वर्षों में यह आंकड़ा 8 से लेकर 87 तक गया है। इस प्रकार इन सालों में आतंकियों ने कुल 671 राजनीतिज्ञों को मौत के घाट उतार दिया।
 
अगर वर्ष 2008 का रिकार्ड देखें तो आतंकियों ने 16 के करीब कोशिशें राजनीतिज्ञों को निशाना बनाने की अंजाम दी थीं। इनमें से वे कईयों में कामयाब भी रहे थे। चौंकाने वाली बात वर्ष 2008 की इन कोशिशों की यह थी कि यह लोकतांत्रिक सरकार के सत्ता में रहते हुए अंजाम दी गईं थीं जिस कारण जनता में जो दहशत फैली वह अभी तक कायम है।
 
- सुरेश एस डुग्गर