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विश्लेषण

PM की इजराइल यात्रा से पहले भारत ने फिलिस्तीन को साधा

By राहुल लाल | Publish Date: May 18 2017 12:20PM
PM की इजराइल यात्रा से पहले भारत ने फिलिस्तीन को साधा

भारत फिलस्तीन संबंध प्रारंभ से ही काफी घनिष्ठ रहा है तथा भारत फिलस्तीन की समस्याओं के प्रति काफी संवेदनशील रहा है। फिलिस्तीन मसले के साथ भारत की सहानुभूति और फिलिस्तीन लोगों के साथ मित्रता समय की कसौटी पर खरी उतरे यह हमारे भारतीय विदेश नीति का अभिन्न अंग रहा है। 1947 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीन के विभाजन के विरुद्ध मतदान किया था। भारत पहला गैर-अरब देश था, जिसने 1974 में फिलिस्तीन की जनता के एकमात्र और कानूनी प्रतिनिधि के रूप में पीएलओ को मान्यता प्रदान की थी। भारत 1988 में फिलिस्तीनी राज्य को मान्यता देने वाले पहले देशों में था।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में 29 नवंबर, 2012 को फिलिस्तीन के दर्जे को एक "गैर-सदस्य राज्य" के दर्जे में स्तरोन्नत किया गया। भारत ने इस संकल्प को सह-प्रायोजित किया और इसके पक्ष में मतदान किया। भारत ने जुलाई 2014 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भी फिलिस्तीन के पक्ष में मतदान किया। भारत ने अप्रैल 2015 में एशिया-अफ्रीका संस्मारक शिखर बैठक में फिलस्तीन पर बांडुग घोषणा का समर्थन किया। साथ ही सितंबर 2015 में सदस्य राज्यों के ध्वज की तरह अन्य प्रेक्षक राज्यों के साथ संयुक्त राष्ट्र परिसर में फिलिस्तीन के ध्वज लगाने का समर्थन किया।
 
मोदी की इजराइल यात्रा से पूर्व अब्बास की भारत यात्रा-
 
भारत-फिलस्तीन संबंधों के उपरोक्त गरमाहट को बढ़ाने के लिए फिलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास 4 दिवसीय यात्रा पर भारत में हैं। अब्बास रविवार रात भारत पहुंचे हैं तथा सोमवार को दोनों देशों के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता हुई। पश्चिम एशियाई देशों से संबंधों को मजबूत करने के रूप में भी महमूद अब्बास की यात्रा महत्वपूर्ण है। फिलिस्तीनी राष्ट्रपति की यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि जुलाई में प्रधानमंत्री मोदी इजराइल की यात्रा पर जा रहे हैं। भारत-इजराइल संबंध अभी उच्च स्तर पर हैं। ज्ञात हो भारत ने लंबे समय तक इजराइल से कूटनीतिक संबंध नहीं रखे थे। लेकिन 1992 में इजराइल से भारत के औपचारिक कूटनीतिक संबंध बने और अब यह रणनीतिक संबंध में परिवर्तित हो गए। अब प्रथम बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री इजराइल की यात्रा पर जा रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री फिलिस्तीन की यात्रा पर नहीं जाएंगे जबकि अब तक जब भी किसी शीर्ष भारतीय नेता ने इजराइल का दौरा किया है, वह पहले फिलस्तीन जाता रहा है। साथ ही इस वर्ष भारत और इजराइल अपने औपचारिक कूटनीतिक संबंधों का 25वीं वर्षगाँठ भी धूमधाम से मना रहे हैं। ऐसे में फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास की इस यात्रा का महत्व समझा जा सकता है।
 
फिलस्तीन-इजराइल शांति प्रक्रिया में अब्बास की भारत से अपेक्षा-
 
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के समय फिलिस्तीन के तत्कालीन राष्ट्रपति यासिर अराफात ने उन्हें अपनी छोटी बहन बताकर न केवल मीडिया में सुर्खियां बटोरी थीं, अपितु संबंधों में गर्माहट भी भर दी थी। पुन: फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास की इस यात्रा में न केवल भारत-फिलस्तीन संबंध मजबूती की ओर अग्रसर हुए हैं, अपितु अब्बास फिलस्तीन और इजराइल के बीच विवाद निपटारे में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका भी देखता है। उनके अनुसार भारत की भूमिका अहम होगी, क्योंकि उसके दोनों ही देशों से अच्छे संबंध हैं। उन्होंने यहाँ एक व्याख्यान में कहा कि हमारे क्षेत्र में शांति बनाए रखने में भारत की भूमिका होनी चाहिए। अब्बास का कहना था कि दोनों देशों के विवाद निपटारे के लिए फिलिस्तीन किसी भी सैन्य दखल के खिलाफ है।
 
मध्यपूर्व शांति प्रक्रिया में भारतीय भूमिका की संभावनाएं-
 
यह काफी हद तक संभव भी है कि भारत इजराइल और फिलिस्तीन के बीच तनाव कम करने में अपनी भूमिका का निर्वहन करे। यह संभव है कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी इजराइल यात्रा के दौरान ऐसी कोई चर्चा करें जिससे फिलिस्तीन और इजराइल संबंधों में तनाव घटे और शांति स्थापित हो।
 
भारत-फिलस्तीन के बीच 5 महत्वपूर्ण मुद्दों पर समझौता सहित संबंधों को नया आयाम- 
 
इसी क्रम में मंगलवार को प्रधानमंत्री मोदी और फिलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास के बीच शखर वार्ता हुई। भारत और फिलस्तीन के बीच कृषि, खेल, स्वास्थ्य, इलेक्ट्रोनिक्स और आईटी क्षेत्र में 5 अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इसके बाद संयुक्त प्रेस वार्ता में पीएम मोदी ने कहा "हमने पश्चिम एशिया की परिस्थितियों और मध्यपूर्व क्षेत्र में शांति प्रक्रिया पर गहन विचार विमर्श किया।"     दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति बनी है कि पश्चिम एशिया की चुनौतियों का हल सतत राजनीतिक बातचीत और शांतिपूर्ण तरोकों से निकाला जाना चाहिए। भारत उम्मीद करता है कि इजराइल और फिलिस्तीन के बीच व्यापक समझौता हासिल करने के लिए जल्द से जल्द फिर से वार्ता शुरू हो।"
 
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "भारत मजबूती से फिलस्तीन के मुद्दों का समर्थन करता रहा है। हम शांतिमय इजराइल के साथ-साथ संप्रभु, स्वतंत्र, एकजुट और विकास की ओर बढ़ने वाले फिलस्तीन की उम्मीद करते हैं।" भारत फिलस्तीन में बुनियादी ढांचा विकसित करने में अपना सहयोग सदैव जारी रखेगा और फिलस्तीनी लोगों के जीवन स्तर में सुधार के लिए सहयोग करता रहेगा। प्रधानमंत्री ने कहा, "हम फिलस्तीन को विकास और कौशल विकास के प्रयासों में सहयोग देते रहेंगे।"
 
दोनों देशों के बीच मंगलवार को हुए समझौतों में कृषि, सूचना प्रद्योगिकी एवं इलेक्ट्रोनिक्स, स्वास्थ्य और युवा मामले एवं खेल जैसे क्षेत्रों में सहयोग के जो समझौते हुए हैं, वे अवश्य ही भारत -फिलस्तीन संबंधों को नई ऊंचाई की ओर ले जाएगा। भारत रमल्ला में आईटी केन्द्र की एक इमारत का निर्माण कर रहा है, जो फिलस्तीनी आकांक्षाओं को साकार करने में मदद करेगा। प्रधानमंत्री ने इसके अलावा दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का आह्वान भी किया और इच्छा जाहिर की कि अगले महीने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस में फिलस्तीन भी हिस्सा ले।
 
अब्बास का शांति प्रक्रिया तीव्र करने पर पूरा जोर-
 
भारत के इस दौरे पर आए फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास का पूरा जोर इजराइल के साथ शांति संधि पर रहा। फिलस्तीन के राष्ट्रपति अब्बास ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फिलस्तीन के मुद्दों का लगातार समर्थन करने के लिए भारत की सराहना की। अब्बास ने कहा कि उन्होंने मोदी को मध्यपूर्व में शांति प्रक्रिया को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई बातचीत से अवगत कराया। ट्रंप के अलावा मध्य पूर्व में शांति प्रक्रिया को लेकर जर्मनी के राष्ट्रपति वाल्टर स्टीनमीयर और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से हुई बातचीत की भी उन्होंने मोदी को जानकारी दी। अब्बास ने आतंकवाद के हर स्वरूप की कठोर निंदा की और आतंकवाद के खिलाफ क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय हर स्तर पर किए जा रहे प्रयासों के प्रति समर्थन जताया।
 
इजराइल यात्रा के पूर्व फिलस्तीन के साथ कई प्रमुख समझौतों के जरिए भारत ने संदेश देने की कोशिश की कि उसके लिए इजराइल और फिलस्तीन दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। साथ ही मध्यपूर्व में शांति स्थापित करने में भारत की भूमिका भी बढ़ चुकी है।
 
राहुल लाल
(लेखक कूटनीतिक मामलों के जानकार हैं।)