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विश्लेषण

दूसरों पर आरोप लगाने वाले केजरीवाल खुद पर चुप क्यों

By विजय शर्मा | Publish Date: May 19 2017 11:44AM
दूसरों पर आरोप लगाने वाले केजरीवाल खुद पर चुप क्यों

केजरीवाल पर जब एक दिन पहले तक उनकी मंत्रिमंडल के सहयोगी रहे कपिल मिश्रा ने दो करोड़ रूपए की रिश्वत का आरोप लगाया तो भूचाल आ गया और लगा कि केजरीवाल इस पर अपनी सफाई देंगे और फिर कपिल का कोई स्टिंग वीडियो जारी करेंगे। बात-बात पर जनता को स्टिंग करने का मंत्र देने वाले केजरीवाल ने आखिर जब कपिल मिश्रा को हटाने का फैसला किया था और बातचीत अंतिम चरण में थी तो उसकी वीडियो रिकार्डिंग क्यों नहीं की और कपिल मिश्रा भी जो बातें आज मीडिया में सुर्खियां बटोरने के लिए कर रहे हैं उन्होंने अपने राजनैतिक गुरु की सिखाई बातों पर अमल क्यों नहीं किया। अगर पहले वाले संघर्षरत केजरीवाल और कपिल मिश्रा होते, तो शायद यही करते लेकिन दिल्ली की भोली-भाली जनता को बहला फुसला कर झूठे और बड़े-बड़े वादे करके सत्ता पर काबिज यह लोग भूल गए कि लोगों को ज्यादा दिनों तक मूर्ख नहीं बनाया जा सकता और यह जनता ही है, जो सब जानती है।

उम्मीद से कहीं अधिक सीटें मिलने पर केजरीवाल स्वयं को आसमान से भी ऊंचा समझने लगे थे। केजरीवाल को कुछ चाटुकार रणनीतिकारों ने उन्हें बिना कोई जिम्मेदारी संभाले मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने और सरकारी पैसों से देशभर में पार्टी का प्रचार करने की सलाह दी। केजरीवाल इसी काम में जुटे थे और दिल्ली के मुख्यमंत्री का पद तो उन्होंने सरकारी पैसौं पर ऐशो-आराम के लिए रखा है। उनके पास न तो कोई विभाग है और न ही वह किसी फाइल पर विभाग के मुखिया होने के नाते नोटिंग या निर्देश दे सकते हैं। यदि केजरीवाल को पार्टी का ही विस्तार एवं प्रचार करना है तो ऐसा वे पार्टी का संयोजक होने के नाते कर सकते हैं लेकिन अपने एवं परिवार के लिए सरकारी खर्च पर भारी-भरकम सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते, अत: दिल्ली की जनता के साथ यह सारा प्रपंच किया गया। उन्हें सुविधाओं के लिहाज से तो दिल्ली के मुख्यमंत्री का पद भा रहा है लेकिन रूतबे के हिसाब से उन्हें यह छोटा लगने लगा था, इसलिए कूदकर पंजाब पहुंच गए और पंजाब जैसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। इसके लिए केजरीवाल एण्ड कम्पनी ने हर तरह के हथकंडे अपनाए। लोकसभा चुनावों में पंजाब की ग्रामीण जनता ने केजरीवाल की पार्टी पर विश्वास किया था। अत: केजरीवाल एण्ड पार्टी पूरी तरह आश्वस्त थी कि पंजाब में उनकी जीत होगी लेकिन लोकसभा चुनावों के बाद से ही केजरीवाल ने पंजाब के जीते हुए सांसदों को किनारे लगा दिया था। अब जब जनता ने उन्हें उनकी औकात बतायी है, तो वह मानने को तैयार नहीं हैं और इसके लिए ईवीएम और नरेन्द्र मोदी को दोष दे रहे हैं।
 
लगातार चुनावी हार और कपिल मिश्रा के आरोपों के बाद केजरीवाल घिर गये हैं और भाई-भतीजावाद और रिश्वतखोरी के नित नए आरोप लग रहे हैं। दूसरों पर बिना सबूतों के आरोप लगाने वाले केजरीवाल अब खुद शिकार हो गये हैं। आजकल सोशल साइट फेसबुक, ट्वीटर और व्हट्सअप पर केजरीवाल एण्ड पार्टी के लिए शेयरो-शायरी हो रही है- मजमून कुछ इस प्रकार है "आये थे कोठे बंद कराने, पर नोटों की खनक देखकर खुद ही नाच बैठे"। दिल्लीवासियों ने वोट देते समय सपने में भी नहीं सोचा था कि केजरीवाल स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाएगा। केजरीवाल ने आरोपों के तीन दिन बाद "सत्यदेव जयते" ट्वीट करके सबको चौंका दिया। सारा मीडिया एवं जनता कयास लगाने लगी कि अब केजरीवाल आरोपों के जवाब में कुछ ठोस तथ्यों के साथ बोलेंगे और कपिल मिश्रा का खेल खत्म हो जाएगा लेकिन बाद में पता चला कि केजरीवाल ईवीएम की डमी मशीन पर मर्जी का मदर बोर्ड लगवाकर जनता को बताने का प्रयास कर रहे हैं कि जनता हमें नहीं हरा सकती, हमें तो ईवीएम और चुनाव आयोग हरा रहा है। विधानसभा में कई प्रकार की सुनी-सुनाई बातों और अफवाहों पर चर्चा हुई और जनता से टैक्स के रूप में वसूली गई गाढ़ी कमाई को अपने निजी स्वार्थ के लिए दुरूपयोग किया गया। जिस प्रकार का डेमो विधान सभा में किया गया, वह बाहर प्रेस के सामने या रामलीला मैदान या जंतर-मंतर में भीड़ जुटाकर हो सकता था। मीडिया ने इस पर जब सवाल पूछा तो पार्टी प्रवक्ताओं का तर्क था कि ऐसा करने पर जनता नोटिस नहीं करती और न कोई इसे गंभीरता से लेता।
 
यह सही है कि निष्पक्ष जांच व न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही किसी को दोषी माना जा सकता है लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का मामला कुछ अलग है। उन पर दो करोड़ रुपए रिश्वत लेने का आरोप है और यह आरोप किसी विपक्षी नेता ने नहीं लगाया है। कपिल मिश्रा एक दिन पहले तक केजरीवाल के मंत्रिमंडल का हिस्सा थे। सबसे बड़ी बात यह है कि रिश्वत देने का आरोप केजरीवाल मंत्रिमंडल के एक अन्य मंत्री सत्येन्द्र जैन पर लगा है, जिन पर हवाला कारोबार, मंत्री रहते हुए भू-उपयोग बदलने एवं अवैध संपत्ति बनाने की जांच का शिकंजा कसता जा रहा है। उनका दामन दागदार है और कई जांच एजेंसियां उनके क्रिया-कलापों की जांच कर रही हैं। केजरीवाल से उनकी करीबी जगजाहिर है।
 
केजरीवाल ने जो बोया था, उसी की फसल काट रहे हैं। बिना सिर-पैर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का शुरुआत केजरीवाल ने ही की थी और आज वह अपने इसी दांव का शिकार बने हैं। उनकी मंडली की ओर से कहा जा रहा है कि कपिल मिश्रा के पास कोई सबूत नहीं है। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया के पास आरोपों का कोई जवाब नहीं है लेकिन उनको याद रखना चाहिए कि केजरीवाल और वह स्वयं आरोप लगाकर भाग खड़े होते थे और नेता एवं अफसर तिलमिला कर रह जाते थे।
 
अरविन्द केजरीवाल सत्ता के भूखे हैं और उनकी नीयत खोटी है। उन्होंने पहले कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाये फिर उसी कांग्रेस के सहयोग से मुख्यमंत्री बने थे। उन्होंने संकल्प लेकर अपने बच्चों की कसम खाई थी कि वह कांग्रेस व भाजपा से न कभी समर्थन लेंगे, न देंगे लेकिन जब मुख्यमंत्री की कुर्सी देखी तो उनका एवं उनकी पार्टी का इमान डोल गया और उन्होंने अपना संकल्प तोड़ दिया था। जब मीडिया ने केजरीवाल से सवाल किया था कि कांग्रेस से सहयोग न लेने के संकल्प का क्या हुआ तो केजरीवाल का जवाब था कि हमने समर्थन नहीं लिया है, कांग्रेस ने जबर्दस्ती दे दिया,  खैर बात पुरानी है लेकिन बात केजरीवाल की नीयत की है। अब भी अपनी चुप्पी तोड़ने पर कहीं केजरीवाल यह न कह दें कि उन्होंने दो करोड़ रूपए नहीं लिए, वह तो सत्येन्द्र जैन ने उन्हें दे दिए और उन्होंने रख लिए हैं।
 
कपिल मिश्रा का आरोप है कि सत्येन्द्र ने केजरीवाल के साढू की 50 करोड़ रुपए कीमत वाली जमीन की डील कराई है। इस डील की यदि सीबीआई जांच हो जाए तो सारी बात साफ हो जाएगी कि जमीन किसने खरीदी, किसने बेची और क्या इसका लैंड यूज बदला गया आदि सब बातें रिकार्ड से मिल जायेंगी लेकिन इसके बावजूद सबको मालूम है कि इस प्रकार की डील नकदी में होती है और सेल कम दिखाई जाती है, परन्तु यदि ऐसा है तो भी बेनामी संपत्ति कानून के तहत इस प्रकार की संपत्ति जब्त की जा सकती है। 
 
इसमें किस प्रकार से गड़बड़ी की गई और मुख्यमंत्री के दबाव एवं भूमिका के कारण या किसी सरकारी एजेंसी से मामला निपटाने के नाम पर गोलमाल किया गया, इसका तो जांच से ही खुलासा हो सकता है लेकिन उसके लिए केजरीवाल और सत्येन्द्र जैन को अपने-अपने पदों से हटना जरूरी है, अन्यथा निष्पक्ष जांच नहीं हो सकती है। दिल्ली के विधान सभा चुनावों में केजरीवाल को बड़ी सफलता मिली थी। युवाओं और झुग्गी-झोंपड़ी वालों से लेकर, ऑटोरिक्शा वालों, अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वालों ने केजरीवाल की ईमानदारी की बनाई हुई छवि और धारणा के आधार पर वोट डाले थे लेकिन केजरीवाल ने मुख्यमंत्री बनने के बाद कोई काम नहीं किया, सिर्फ सरकारी पैसों पर स्वयं एवं अपनी मंडली को पद एवं ठेके रेवड़ियों की तरह बांटते और केन्द्र सरकार को लगातार कोसते रहे जिसके परिणामस्वरूप केजरीवाल की छवि दागदार बन गई है। उन पर गलत लोगों से बड़ी मात्रा में चन्दा लेने और गलत लोगों को टिकट देने के आरोप लगे हैं और पंजाब विधानसभा चुनावों के दौरान अनैतिक तरीके अपनाने और महिलाओं के शोषण के गंभीर आरोप उनकी मंडली पर लगे हैं। केजरीवाल की छवि अब ऐसी नहीं है कि किसी के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया जाए लेकिन बिना जांच के उन्हें दोषी भी नहीं कहा जा सकता।
 
विजय शर्मा