1. उप्र में नेताओं के लिए धर्मनिरपेक्षता के अलग अलग मायने

    उप्र में नेताओं के लिए धर्मनिरपेक्षता के अलग अलग मायने

    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय स्तर के नेता मजहब व वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं। विडम्बना यह है कि इसके बाद भी धर्मनिरपेक्षता की दुहाई दी जाती है।

  2. अभिभाषण पर चर्चा के दौरान सामने आईं संप्रग की खामियाँ

    अभिभाषण पर चर्चा के दौरान सामने आईं संप्रग की खामियाँ

    कुल मिलाकर विपक्ष की दलीलें उसी दिशा में चल रही थीं जिस पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अमल करते रहे हैं। वह यह साबित करना चाहते थे कि संप्रग सरकार गरीबों, किसानों, मजदूरों की भलाई के लिए समर्पित थी।

  3. यूपी में दागी, बागी और दल बदलू करेंगे हार जीत का फैसला

    यूपी में दागी, बागी और दल बदलू करेंगे हार जीत का फैसला

    भ्रष्टाचारियों से लेकर बाहुबलियों तक को टिकट दिये गये हैं। इस होड़ में कोई दल पीछे नहीं है। चुनाव में खड़े आधे से अधिक उम्मीदवार अपराधी हैं जिनके खिलाफ रंगदारी, हत्या, गुंडागर्दी आदि के मुकदमे चल रहे हैं।

  4. उप्र में पहले चरण के चुनाव में मुद्दे पीछे छूटे, जात-पात आगे

    उप्र में पहले चरण के चुनाव में मुद्दे पीछे छूटे, जात-पात आगे

    जात−पात को छोड़कर सभी मुद्दे पीछे छूट गये हैं। वर्ष भर खेती के लिये पानी, खाद−बीज और बिजली की समस्या से जूझने वाले किसानों को इस समय यह सब समस्याएं दिखाई नहीं पड़ रही हैं।

  5. इसलिए प्रधानमंत्री मोदी के मुरीद हुए स्वामी प्रसाद मौर्य

    इसलिए प्रधानमंत्री मोदी के मुरीद हुए स्वामी प्रसाद मौर्य

    मोदी स्वयं अति पिछड़े समाज से हैं, उन्होंने गरीबी देखी है। संघर्ष करके आगे बढ़े हैं। अम्बेडकर व कांशीराम ने वंचितों के जीवन स्तर उठाने का कार्य किया। मोदी भी इस रास्ते पर चले।

  6. पाक चैनलों पर माया को मोदी से बेहतर बताया जा रहा

    पाक चैनलों पर माया को मोदी से बेहतर बताया जा रहा

    पकिस्तान को लगता है कि एक मायावती ही हैं जो मोदी को जवाब दे सकती हैं। इसके लिए मोदी के बारे में मीडिया में खूब जहर उगला जा रहा है और कहा जा रहा है कि मोदी चुनाव जीतने के लिए पकिस्तान पर हमला कर सकते हैं।

  7. ''भगवान के घर'' केरल में बढ़ रहा वामपंथ का आतंक

    ''भगवान के घर'' केरल में बढ़ रहा वामपंथ का आतंक

    खासकर जब से केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) सरकार आई है, तब से राष्ट्रीय विचार से जुड़े निर्दोष लोगों और उनके परिवारों को सुनियोजित ढंग से निशाना बनाया जा रहा है।

  8. कुछ नहीं मिला तो भय की राजनीति करने लगीं मायावती

    कुछ नहीं मिला तो भय की राजनीति करने लगीं मायावती

    आरोप लगाने से पहले मायावती को यह बताना चाहिए कि उन्हें किस दिव्य दृस्टि से पता चला कि आरक्षण में कटौती का प्रस्ताव आने वाला है। क्या मायावती देश की सबसे बड़ी पार्टी के नेताओं को इतना अनाड़ी समझती हैं।

  9. बजट में किसानों का रखा ध्यान, आय दोगुणी करने का लक्ष्य

    बजट में किसानों का रखा ध्यान, आय दोगुणी करने का लक्ष्य

    किसानों की आय को दोगुणा करने के लिए उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाना भी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि यह साफ हो चुका है कि न्यूनतम मूल्य पर खरीद व्यवस्था अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो सकी है।

  10. ''यूपी'' को ये साथ पसंद नहीं'', भाजपा-बसपा में सीधी टक्कर

    ''यूपी'' को ये साथ पसंद नहीं'', भाजपा-बसपा में सीधी टक्कर

    सपा कांग्रेस के गठजोड़ से दलित, सवर्ण वोटों का रूझान इस गठजोड़ की ओर होने से रहा। इस गठजोड़ के चलते भाजपा, बसपा के बीच सीधी टक्कर होती जरूर नजर आने लगी है।

  11. मतदाता सांप की बीन की तरह वायदों पर कब तक झूमते रहेंगे

    मतदाता सांप की बीन की तरह वायदों पर कब तक झूमते रहेंगे

    मतदाता सांप की बीन की तरह वायदों पर कब तक झूमते रहेंगे। मतदाता कब तक लाचार और निरीह बने रहेंगे। आखिर और कितने चुनावों का इंतजार करना होगा जब मतदाता लोकतंत्र के असली वारिस होंगे और राजनीतिक दल मात्र ट्रस्टी।

  12. चुनावी वादों की भी होनी चाहिए लक्ष्मण रेखा

    चुनावी वादों की भी होनी चाहिए लक्ष्मण रेखा

    पेड न्यूज और चुनाव घोषणापत्रों में सीधे सीधे प्रलोभन देने वाले वादों का समावेश कर चुनावों को प्रभावित किया जाने लगा है। आज चुनाव जीतने के लिए पार्टियां किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं।