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मुश्किल थी परमाणु ऊर्जा से बिजली उत्पादन की कल्पना

By नवनीत कुमार गुप्ता | Publish Date: Jan 24 2018 4:06PM
मुश्किल थी परमाणु ऊर्जा से बिजली उत्पादन की कल्पना
Image Source: Google

नई दिल्ली, इंडिया साइंस वायर): भारत आज एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है और परमाणु ऊर्जा का उपयोग कृषि, उद्योग, औषधि निर्माण तथा प्राणिशास्त्र समेत विविध क्षेत्रों में हो रहा है। ऐसे में उन वैज्ञानिकों को याद करना जरूरी हो जाता है, जिनकी मेहनत ने भारत को परमाणु ताकत वाले दुनिया के कुछ चुनिंदा देशों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया। भारत के परमाणु कार्यक्रम की नींव रखने वाले होमी जहांगीर भाभा ऐसे ही एक वैज्ञानिक थे। 

भाभा अगर आज परमाणु विज्ञान और इंजीनियरिंग में पूरी दुनिया भारत का लोहा मानती है तो इसमें भाभा का अहम योगदान है। होमी जहांगीर भाभा भारत के एक प्रमुख वैज्ञानिक थे, जिन्होंने भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम की कल्पना की थी। भाभा एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक होने के साथ-साथ कुशल प्रशासक, नीति निर्माता, बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी एवं ललित कला के पारखी थे। भारतीय परमाणु अनुसंधान कार्यक्रम और परमाणु हथियारों के विकास की नींव रखने का श्रेय भाभा को ही जाता है। 
 
भाभा ने भारत में नाभिकीय विज्ञान में उस दौर में कार्य आरंभ किया, जब अविछिन्न श्रृंखला अभिक्रिया की जानकारी देश में न के बराबर थी और परमाणु ऊर्जा से बिजली उत्पादन की कल्पना के बारे में भी कोई मानने को तैयार नहीं था। देश को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने और परमाणु ऊर्जा का उपयोग कृषि, उद्योग, औषधि निर्माण तथा प्राणिशास्त्र में करने की जमीन तैयार करने वाले प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा के जीवन की कहानी वास्तव में आधुनिक भारत के निर्माण की कहानी है। 
 
होमी जहांगीर भाभा का जन्म 30 अक्तूबर 1909 को मुंबई में एक संपन्न पारसी परिवार में हुआ था। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद वह इंग्लैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग पढ़ने चले गए। वहां उन्हें नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिकशास्त्री पॉल एड्रिएन मॉरिस डिराक से गणित पढ़ने का अवसर मिला। मॉरिस डिराक क्वांटम थ्योरी के विशेषज्ञ थे। कुछ समय बाद भाभा ने कैवेंडिश प्रयोगशाला में भी काम किया। 
 
भाभा का पहला शोधपत्र “द अब्जॉर्प्शन ऑफ कॉस्मिक रेडिएशन्स” 1933 में प्रकाशित हुआ था। इसी वर्ष  भाभा को नाभिकीय भौतिकी में डॉक्टरेट की उपाधि मिली। उनके शोध पत्र के कारण उन्हें वर्ष 1934 में तीन वर्षों के लिए आइजेक न्यूटन छात्रवृत्ति भी मिली।  कैंब्रिज में भाभा का शोध-कार्य ब्रह्मंडीय किरणों पर केंद्रित था। असल में अंतरिक्ष से जो विकिरण वायुमंडल की बाहरी परत तक पहुंचते हैं, उन्हें प्राथमिक ब्रह्मंड किरणें कहते हैं। इनके नाभिक तो भिन्न-भिन्न होते हैं, पर उनमें मुख्य रूप से प्रोटॉन कण ही होते हैं।
 
भाभा का सबसे अहम शोध-पत्र पॉजिट्रॉन भौतिकी से संबंधित था। इसी शोध-पत्र  में उन्होंने भाभा स्कैटरिंग या भाभा फुहार के बारे में बताया था। भाभा स्कैटरिंग इलेक्ट्रॉन्स और पॉजिट्रॉन्स के बीच बिखराव की जानकारी देता है।  ऐसा माना जाता था कि पदार्थ के कण और प्रति-कण यानी इलेक्ट्रॉन और पॉजिट्रॉन करीब आने पर एक दूसरे को खत्म कर देते हैं। 
 
भाभा पहले वैज्ञानिक थे, जिन्हें महसूस हुआ कि कुछ और भी हो सकता है, यानी बिखराव। इसी को उनके सम्मान में भाभा स्कैटरिंग कहा गया। भाभा स्कैटरिंग के फॉर्मूले पर वैज्ञानिक इतना भरोसा करते हैं कि इसे अक्सर दूसरे कणों के स्कैटरिंग प्रयोगों में सटीकता के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सर्न समेत दुनिया की कई बड़ी प्रयोगशालाओं के कोलाइडर्स में भाभा स्कैटरिंग का सिद्धांत काम आता है। 
 
भाभा और हाइटलर पहले ऐसे वैज्ञानिक थे, जिन्होंने जटिल गणना के जरिये पता लगाया कि कॉस्मिक बौछार कैसे दिखेगी और इसके गुणधर्म क्या होंगे। भाभा पहले ही अंदाजा लगा चुके थे कि इलेक्ट्रॉन और प्रोटोन के बीच के वजन का कोई कण जरूर होना चाहिए। इसे उस वक्त मेसॉन कहा गया। लेकिन आज इस पार्टिकल को हम म्यूओन कहते हैं। म्यूओन के अध्ययन से हमारे सौरमंडल के नित नए राज खुल रहे हैं। 
 
भारत को परमाणु शक्ति बनाने के मिशन में प्रथम कदम के तौर पर उन्होंने मार्च, 1944 में सर दोराब जे. टाटा ट्रस्ट को मूलभूत भौतिकी पर शोध के लिए संस्थान बनाने का प्रस्ताव रखा। ट्रस्ट के सदस्यों ने इस प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी। 
 
टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान (टीआईएफआर) ने 1 जून, 1945 को भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर के परिसर में कार्य शुरू किया और भाभा उसके निदेशक बने। भाभा के नेतृत्व और दृढ़ता से प्रेरित होकर टीआईएफआर नई ऊंचाईयां छूने लगा। इसे भौतिकी और गणित में मौलिक अनुसंधान के लिए उत्कृष्टता के केंद्र के रूप में गिना जाने लगा। 
 
भाभा के दिमाग में शुरुआत से ही भारत में परमाणु ऊर्जा के विकास का खाका तैयार था। उस दौर में होमी भाभा ने जो सबसे अहम फैसले किए, उसमें भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआसी) में ट्रेनिंग स्कूल की शुरुआत प्रमुख थी। वर्ष 1957 में इस स्कूल से वैज्ञानिकों का पहला बैच तैयार होकर निकला और तबसे यह सिलसिला बना हुआ है। 
 
परमाणु ऊर्जा आयोग को शून्य से शुरुआत करनी थी। आयोग ने परमाणु ऊर्जा के लिए जरूरी खनिजों से यूरेनियम और थोरियम की खोज के लिए देशव्यापी अभियान चलाए। सबसे पहला डिविजन परमाणु खनिज प्रभाग था। इसके बाद 18 अगस्त, 1959 को इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड की स्थापना खनिजों की खोज के लिए की गई। भारत में डिटेक्टर्स भी साथ-साथ विकसित हुए। 
 
परमाणु ऊर्जा आयोग द्वारा दिनांक 3 जनवरी, 1954 को परमाणु ऊर्जा संस्थान ट्रॉम्बे की शुरूआत की गई। 12 जनवरी, 1967 को इसका नाम भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र रखा गया, जो होमी भाभा को देश की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि थी। इस संस्थान ने विज्ञान जगत में एक विशिष्ट नाभिकीय अनुसंधान संस्थान के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। यहां नाभिकीय भौतिकी, वर्णक्रमदर्शिकी, ठोस अवस्था भौतिकी, रसायन एवं जीवन विज्ञान, रिएक्टर इंजीनियरी, यंत्रीकरण, विकिरण संरक्षा एवं नाभिकीय चिकित्सा आदि के क्षेत्रों में मूलभूत अनुसंधान कार्य जारी हैं।
 
वैज्ञानिक होते हुए भी भाभा कला की सभी विधाओं के लिए समर्पित थे। उनके लिए कला ऐसा माध्यम थी,  जो जिंदगी को जीने लायक बनाती है। वह आला दर्जे के वैज्ञानिक थे तो एक उम्दा कलाकार, संगीत-प्रेमी एवं बेहतरीन चित्रकार भी थे। होमी भाभा संगीत प्रेमी थी थे। बागवानी से उनका लगाव भी जगजाहिर है। वह ट्रॉम्बे को विज्ञान जगत के वर्सेल्स सरीखा बनाना चाहते थे। उनके लिए बागवानी सिर्फ वक्त काटने का जरिया नहीं थी, बल्कि वह बागीचों की प्लानिंग, डिजाइन और स्टाइल पर पूरी मेहनत करते थे। वास्तुकला पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी।
 
भाभा 24 जनवरी, 1966 को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अभिकरण की वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक में हिस्सा लेने के लिए विएना जा रहे थे। आल्प्स पर्वतों की मशहूर माउंट ब्लांक चोटी के पास उनका विमान क्रैश हो गया। यह भाभा के जीवन का दुखद और असमय अंत था। 
 
उनकी मौत की खबर पूरे देश और विज्ञान जगत के लिए एक बड़ा झटका थी। लेकिन महान लोग विरासत में उपलब्धियों का अंबार छोड़ जाते हैं। भाभा ने भी जिंदगी के कई आयामों में बुलंदियां हासिल कीं। वैज्ञानिक नजरिये से भारत को आत्मनिर्भरता के रास्ते पर पहुंचाना ही उनकी जिंदगी का मकसद था। 
 
(इंडिया साइंस वायर)