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सुनो सैलानियों! पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फ में मटकने के दिन आ गए

By संतोष उत्सुक | Publish Date: Dec 6 2017 10:45AM
सुनो सैलानियों! पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फ में मटकने के दिन आ गए

सैलानियों के ख़्वाब सच होने का मौसम आ गया है। देश भर में लोग पर्यटन पर निकल चुके हैं या यात्राएं उनके दिमाग में उगनी शुरू हो चुकी हैं। पहाड़ी गांवों, कस्बों व शहरों में भीड़ धीरे धीरे बढ़ रही है। बरसों से दिल में यह देखने की तमन्ना है कि बर्फ कैसी होती है, कैसे गिरती है आसमान से और इस पर कैसे फिसलते हैं। हज़ारों किलोमीटर दूर से, हर सर्दी में मनाली, नारकंडा, शिमला, श्रीनगर, कुफरी में लोगों के हुजूम इकट्टा हो जाते हैं, कई कई दिन इंतज़ार करते हैं रूईनुमा फाहों को आसमान से उतरते हुए देखने का, उन्हें हाथ से छूने का, एक दूसरे पर बर्फ के गोले दागने का, बर्फ पर मटकने, फिसलने का, गिरने और अपने यारों को गिराने का। कुदरत मेहरबान हो जाए तो लाखों लोगों के सपने सच हो जाते हैं और जीवन सफल हो जाता है। हनीमून पर उमड़े जोड़ों का दिल गार्डन गार्डन हो उठता है तो दुकानदारों की आंखों में नोटों की चमक झिलमिलाने लगती है।

उत्कंठा की चरम सीमा पर होता है पर्यटक मन, विशेषकर बाल पर्यटकों का जिन्होंने बर्फ का परिचय किताबों, चित्रों, विडीयोज़ या फिल्मों से पाया है। बूढ़े, प्रौढ़, गृहणियां, युवा, बच्चे यहां तक कि भेड़ बकरियां भी आंगन में खड़े हैं। अनुभवियों को आभास हो गया है अब बर्फ गिर सकती है। प्रकृति ने बर्फ के स्वागत के लिए, मौसम में तापमान के सही तालमेल की आगोश तैयार कर ली है। पहाड़वासी मन ही मन पारम्परिक स्वागत गीत गा रहे हैं। कुदरत का संकेत संप्रेषित होते ही आसमान से जैसे ही पवित्र सफेद स्वर्गिक परिन्दे सहज और सौम्य अंदाज़ में धरती पर उतरते हैं सबका मन स्पर्श एवं आह्लादित कर, उनके सिर के बाल, कन्धे एवं हाथों पर टिकते फिसलते गिरते हुए अपनी जादुई उपस्थिति के स्पंदन से आनंदित कर देते हैं। समतल जगह पर लगता है जैसे सफेद नरम कालीन बिछा दिए हों। बर्फ से एकाकार होने का असली मज़ा तो खुले ग्रामीण अंचल में है जहां पहाड़, खेत, वृक्ष, घर, पत्थर, घास कहिए हर चीज़ पर बर्फ यूं ठहर जाती है मानो पिंजी हुई रूई के फाहे करीने से सजा दिए हों। बर्फ गिरते देखना प्रकृति का अनूठा, मौन संगीत सुनने व देखने जैसा ही है, किसी तरह का कोई शोर नहीं मगर गति कभी धीमी तो कभी तेज़। पहली बार यह दिव्य
 नज़ारा देखने वाला सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सकता।
 
बच्चों ही नहीं युवाओं, कहिए सभी युगों पुराना खेल खेलने लगते हैं और निर्मल आनंद लौट आता है। कोई गुड़िया या गुड्डा बनाने लगता है तो कोई जोकर या नेता। बर्फ के गिरते इठलाते फाहों के बीच नृत्य करना सभी को अच्छा लगता है। विशेषकर नवविवाहितों के लिए। तो बर्फ का सामीप्य रोमांस में ग़ज़ब गर्मजोशी भर देता है। नवविवाहितें जब अपने जीवनसाथी की आगोश में आती हैं तो उनका बर्फ पर एक साथ मादक अन्दाज़ में चलना, मटकते, गिरते हुए एक दूसरे को सम्भालना, स्लैज या बर्फ पर घिसटने वाली गाड़ी पर बैठकर या स्नोस्कूटर पर फिसलना उनके प्यार की मस्ती उनके रोम-रोम को पुलकित कर देती है। बर्फ की दीवारों व चमकते मैदानों के बीच रिश्तों की मदमाती गर्माहट में मनपसन्द आईसक्रीम का लुत्फ उठाना नया मज़ा पैदा कर देता है। कैमरा यहां बेहद सक्रिय व महत्त्वपूर्ण दोस्त की भूमिका निभाता है।
 
बर्फ अपना आँचल बिछाती है तो बर्फ खेल प्रेमी अपना साज़ो सामान इकट्ठा कर गर्म पोशाकें, रंगीन टोपियां ओढ़ सोलंग नाला, कुफरी, नारकन्डा, औली, गुलमर्ग जैसे प्रसिद्ध स्कीइंग प्वांइटस की तरफ रूख करते हैं। यहां वे पर्यटकों को भी स्कीइंग सीखने का अनुभव देते हैं और स्वयं भी राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय मुकाबलों का हिस्सा बनते हैं। लोक सांस्कृतिक परम्पराओं के अनुसार मकर संक्रांति पर बर्फ का गिरना शुभ माना जाता है। बर्फ कभी भी गिरे पहाड़ी क्षेत्रों के लिए बेहद ज़रूरी है। बर्फ गिरकर पहले तो पौधों के लिए गोबर यानी खाद का काम करती है फिर पिघलकर नदी का जल बन जाती है। जल से पहाड़ियों की ही नहीं मैदान में रहने वालों की प्यास भी बुझती है। दुख-सुख एक साथ लाने वाली बर्फ में, कहते हैं संपन्न किसान लम्बी तान कर सोता है और निर्धन को दो जून की रोटी के लिए हाट घराट की चिंता सताती है। ग्लोबल टैम्परेचर बढ़ता जा रहा है इसलिए सर्दियों के मौसम में अब वो ठिठुरन नहीं रही तभी तो उतनी बर्फ भी नहीं पड़ती। पर्यावरण समृद्ध करने के लिए ज्यादा पेड़ पौधे लगें ऐसा प्रयास हम कर सकें या नहीं मगर जीवन की भागदौड़ से छिटक कर, प्रकृति की गोद में, बर्फीले खेतों के शेष आंगन में ज़िन्दगी की उन्मुक्त खुशियों का आनन्द उत्सव तो मना ही सकते हैं।
 
- संतोष उत्सुक