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लेख

अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो

By प्राची थापन | Publish Date: Mar 8 2017 12:18PM
अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो

सम्पूर्ण विश्व में 8 मार्च को महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है पर मेरा मानना है कि महिलाओं की ख़ुशी, उनका विकास किसी भी निर्धारित दिवस पर आश्रित नहीं होता है। हम और हमारा समाज अगर चाहे तो हर दिन महिला दिवस हो सकता है, बस जो विशेष महत्त्व इस दिन पर उनको दिया जाता है, वही हम प्रतिदिन की जिंदगी में भी तो दे सकते हैं। घर की गृहणी अगर खुश रहेगी, तो उसकी प्रसन्नता उसकी घर गृहस्थी में भी दिखेगी। आपने स्वयं भी देखा होगा की जिस घर की गृहणी हमेशा खुश रहती हो उस घर में सम्पन्नता का वास होता है एवं माहौल में सकारात्मकता होती है।  फिर यह जरूरी नहीं कि आप उनको प्रतिदिन खरीदारी पर ले जाएं या कोई उपहार दें। ऐसा कदापि नहीं है, बस चाइये तो इतना कि जितना महत्व आप अपने काम को देते हैं, उतना ही महत्व आप उन्हें भी दें, जो कि अपना जीवन सिर्फ परिवार को बनाने में गुज़ार देती है। अगर बात करें घर की बेटी की तो आपने खुद ही देखा होगा उसकी एक खिलखिलाहट से घर का माहौल महका-महका सा और खुशियों से भरा हो जाता है। यहाँ तक कि त्योहारों पर भी उनके होने से एक अलग सी रौनक होती है। सही मायने में कहा जाए तो इसे कहते हैं महिला दिवस, यानी कि हर दिन महिलाओं का दिन जो आपका भी दिन बना दे।। क्या आप सभी को भी ऐसा नहीं लगता की वाकई में एक लड़की किसी भी घर को स्वर्ग बना सकती है?

 
महिलाओं पर बहुत से लेख आए दिन आते रहते हैं उनकी दयनीय दशा को लेकर या फिर उनकी भूतकाल से वर्तमान तक की स्थिति को लेकर। मेरा मानना यह है कि इन्हीं स्थितियों से उभर कर जिन महिलाओं ने इतिहास रचा वो सभी आगे महिलाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत बनेंगी। समय समय पर बहुत सी ऐसी महान महिलाएँ हुई हैं, जिनका महिलाओं के सशक्तिकरण में बहुत बड़ा हाथ है, जैसे महाराष्ट्र की सावित्रीबाई फुले जिहोंने सन्न १९४८ में सबसे पहले कन्या विद्यालय की नींव रखी जिसमें शरुआती दौर में मात्र ९ छात्राओं को वो पढ़ाती थीं, वह भी बिना किसी जाति-पाति का भेदभाव किये। इसके लिए उन्हें समाज के द्वारा रोकने के लिए किये असफल प्रयत्नों का भी सामना करना पड़ा। लोग उन्हें पत्थर मारते थे, उन पर गंदगी फेंकते थे, पर फिर भी वह कभी रुकीं नहीं और इन सभी का जवाब उन्होंने १ साल में ५ नए कन्या विद्यालय खोलकर दिया। सही मायने में अगर लड़कियों की शिक्षा की नींव का श्रेय किसी को दिया जाना चाहिए तो सावित्रीबाई फुले जी को ही देना चाहिए। इन वीर गाथाओं का दौर ज़ारी रखते हुए कितनी ही वीरांगनाये हुईं जो अपने योगदान और कार्यों से देश को गौरवान्वित करती आई हैं और कर रही हैं। 
 
इतिहास में उल्लेखित महिलाओं के विषय में तो लगभग सभी जानते हैं, और सबने पढ़ा भी होगा पर ऐसी कुछ और महिलाएँ हैं जिन्होंने अपने सुरक्षा घेरे से निकल कर कुछ ऐसा किया है जो कि हर इंसान को ऐसा करार जवाब है जो ये मानते हैं की महिला अबला है। अब ये कथन निरर्थक हो रहा है कि महिला अबला नहीं सबला है जिसमें कुछ महिलाओं के उदहारण हम ले सकते हैं जैसे- 
 
मदर टेरेसा प्रथम महिला हैं जिनको सन् १९७९ नोबेल पुरस्कार मिला और आजीवन समाज सेवा में रहीं।
 
श्रीमति इंदिरा गाँधी जो भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनीं और १९६६ से १९७७ तक सम्पूर्ण भारत का कार्यभार संभाला और वह पहली भारतीय महिला थीं जिनको भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित किया गया था।  
 
इसी राजनैतिक दौर को जारी रखते हुए श्रीमति प्रतिभा पाटिल सन् २००७ से जुलाई २०१२ तक भारत की प्रथम राष्ट्रपति बनीं।
 
इस कड़ी में एक नाम और भी जुड़ गया जो है छवि राजावत का जोकि भारत की प्रथम महिला सरपंच बनीं वह भी एमबीए की डिग्री हासिल करने के बाद, एक अच्छी खासी टेलिकॉम की नौकरी को छोड़ जयपुर के सोडा गाँव के विकास के लिए वह सरपंच बनीं। 
 
जमीन के साथ साथ अन्तरिक्ष में भी अपना परचम लहराने वाली कल्पना चावला जो कि प्रथम महिला थीं जो १९९७ में अंतरिक्ष में गईं। 
 
महिलाओं के लिए सबसे कठिन माने जाने वाले क्षेत्रों में भी आधी आबादी ने अपना लोहा मनवाया है जैसे किरण बेदी जो की प्रथम महिला महिला पुलिस (आईपीएस) अफसर बनीं १९७२ में। वहीं अन्ना मल्होत्रा जो कि प्रथम महिला आईएएस अफसर बनीं। हरिता कौर देओल सन् १९९४ में पहली भारतीय वायु सेना की पायलट बनीं जबकि वहीं सन् १९९३ में प्रिया झिंगन जोकि भारतीय थल सेना की कमान सँभालने वाली प्रथम महिला बनीं।  
 
अब खेल का वो जगत जहाँ हमेशा पुरुषों का अधिकार रहा है पर इस क्षेत्र में भी महिलाओं के कुछ नाम उभर कर आये हैं जैसे- सानिया मिर्ज़ा जिन्होंने २००५ में पहली वुमन टेनिस एसोसिएशन का ख़िताब पाया और २०१५ में प्रथम वुमन टेनिस एसोसिएशन डबल्स का ख़िताब पाया और सायना नेहवाल पहली भारतीय महिला हैं जिसने ओलम्पिक में बैडमिंटन के खेल में मैडल प्राप्त किया और इसके बाद २०१५ में बैडमिंटन के खेल में पूरे विश्व में नंबर एक की पोजीशन पर थीं। मैरी कॉम पहली महिला बॉक्सर बनीं जिन्होंने एशियाई खेलों में २०१४ में गोल्ड मैडल जीता था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया। 
 
इन सभी के साथ साथ व्यापार जगत में भी महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया जिसमें से इंद्रा नूई जोकि चैरपर्सन और सीइओ हैं पेप्सिको की। वह २०१४ में व्यापार जगत में तीसरे नंबर की महिला भी रह चुकी हैं। यह तो हुई उन महिलाओं की बात जिन्होंने अपने द्वारा चयनित क्षेत्रों में अपने घर से निकल कर अविश्वसनीय ख्याति पाई और कार्य किये पर वहीं कुछ ऐसी महिलाएं हैं जो घर पर रहकर घर संभालती हैं उनका भी अपना ही संसार है जिसे वह नित नई मुसीबत का सामना कर चला रही हैं।
 
आप सभी से बस यही कहना चाहती हूँ कि नारी और उसके योगदान को लेकर यहाँ तक कि सभी क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली महिलाओं को लेकर पता नहीं कितना कुछ लिखा जा सकता है बल्कि ना जाने कितनी ही किताबें लिखी जा सकती हैं। इन सभी का उल्लेख करने का मेरा औचित्य सिर्फ इतना है कि हम इन सभी से कुछ ना कुछ सीखें बल्कि अपने नारीत्व पर गर्व करें और अपने आप को समाज में अबला बनकर नहीं एक सबला बनाकर प्रस्तुत करें। मैं पूरे गर्व के साथ बोलना चाहूंगी की मुझे अपने लड़की होने पर गर्व है और इस कथन से मैं पूर्णतया सहमत हूँ कि अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो और मुझे यही मम्मी पापा हर जनम में दीजो। मेरे मम्मी पापा ने जनम से लेकर आज तक मेरी और मेरी बहन की हर जरूरत का ख्याल रखा है और हमें कभी किसी लड़के से कम नहीं समझा है और एक लड़के की तरह अपने पैरों पर खड़े होना सिखाया है तथा हर मुसीबत का सामना करना भी सिखाया है। मैं अगर आज अपने पैरों पर खड़ी हूँ और अपने मम्मी पापा से दूर रहकर काम कर पा रही हूँ तो सिर्फ उनके विश्वास की वजह से और उनके समर्थन की वजह से ही यह संभव हुआ है। 
 
अंत में बस यही बोलना चाहती हूँ कि अपने महिला होने पर गर्व कीजिये और हर दिन को महिला दिवस मानकर उस दिन को जीना चाहिये। हम आज की नारी हैं जो अबला नहीं सबला है तो इस महिला दिवस पर हो जाइये आप भी इस विचार के साथ कि अपने साथ साथ बाकी की महिलाओं को भी हम जागरूक करेंगे, हो सकता है माध्यम बदल जाये पर सोच तो एक ही होगी क्या आप सभी मेरी और मेरी ही जैसे ना जाने कितने लोगों की इस सोच का समर्थन करते हैं?
 
जब नारी में है शक्ति सारी,
फिर क्यों हो नारी बेचारी,

नारी नहीं है, अबला, 
करती रही है, सबका भला, 

बेटे के लिए माँ बन कर,
पति के लिए पत्नी बनकर, 

हर रिश्ते को जिया है,
अपना हर लम्हा दिया है,

आँचल में ममता लिए,
नैनो से आंसू पिए, 

जिसने बस त्याग ही किये, 
जो हमेशा दूसरों के लिए ही जिए, 

उसे क्यों धिक्कार दो,
जीने का भी अधिकार दो,

गर्व हो उसको नारी होने का, 
विश्वास हो उसको अपनी प्रतिभा का, 

अब न रोने दो, ना गिड़गिड़ाने दो, 
इस बात यकीन हो जाने दो,

श्राप नहीं है बेटी होना,
इस बात को अपनाने दो, 

कह लेने दो अपने मन की, 
कर लेने दो अपने दिल की, 

अब इस बात का विश्वास तो होने दीजो,
की वो खुद कहे की,
 
अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो।।
 
- प्राची थापन