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परिवार को जोड़ती है डाइनिंग टेबल, साथ बैठ कर तो देखें

By प्रीटी | Publish Date: May 29 2017 2:54PM
परिवार को जोड़ती है डाइनिंग टेबल, साथ बैठ कर तो देखें

परिवार चाहे संयुक्त हो या एकल, परिवार के सभी सदस्यों का डाइनिंग टेबल पर मिल बैठ कर भोजन करने का अलग ही आनंद होता है। डाइनिंग टेबल आज पारिवारिक जीवन में आवश्यक व उपयोगी वस्तु बन गई है। आज के भागदौड़ भरे जीवन में सुख−दुख, प्यार−मुहब्बत या फिर शिकवे−शिकायत करने का स्थल डाइनिंग टेबल ही रह गई है।

सहभोज से परिजनों के बीच खुल कर बातें होने व हल्का−फुल्का हंसी−मजाक करने से मन हलका होता है। आपसी विश्वास बढ़ता है। एक दूसरे से सलाह−मशविरा करने से उलझनें व समस्याएं दूर होती हैं। इतना ही नहीं तनाव, मनमुटाव और अंसतोष की स्थिति भी उत्पन्न नहीं होती।
 
डाइनिंग टेबल पारिवारिक जीवन को जोड़ने का माध्यम है। अलग−अलग बैठकर खाने से संबंधों में दूरी पैदा होती है। इससे परिवार बंटता है जबकि साथ खाने से एक दूसरे की रूचि का पता चलता है। भोजन के बाद सबको खाने की संतुष्टि प्राप्त होती है उस सुखानुभूति का प्रभाव पाचन क्रिया पर पड़ता है जिससे भोजन सुपाच्य बन जाता है।
 
डाइनिंग टेबल व्यवस्थित व सुविधाजनक स्थान पर होनी चाहिए। रसोई के पास हो तो ज्यादा ठीक होगा इससे ऊर्जा, शक्ति व ताजगी बनी रहेगी। सजावट ऐसी होनी चाहिए कि खाने वालों की भूख को और बढ़ा दे। अगर परोसने वाले बरतन कलात्मक, चमकदार और करीने से सजाए गए हों, फूलदान पास रखा हो तो फिर कहना ही क्या। इससे मन−मस्तिष्क को कितना सुकून मिलेगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
 
सहभोज का परिवार के सदस्यों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। एक दूसरे की अच्छाइयां, कमजोरियां बातों ही बातों में उजागर हो जाती हैं तथा मन की पीड़ा व्यक्त करने से निराशा, कुंठा, अवसाद, एकाकीपन जैसी मानसिक समस्याओं की गुंजाइश पैदा नहीं हो पाती है क्योंकि मनमस्तिष्क से खुलेपन में बातचीत होती है। दूरियों को नजदीकियों में बदलने से वैचारिक स्वतंत्रता का एहसास होता है।
डाइनिंग टेबल को मात्र काठ, प्लास्टिक, लोहे, बेंत का मूकाकार नहीं मानना चाहिए। इसमें तो पारिवारिक जीवन की धड़कन बसी होती है। परस्पर विश्वास, स्नेह, ममता, सहयोग, समानता आदि के मोती डाइनिंग टेबल पर जड़े होते हैं।
 
प्रीटी