मकर संक्रांति पर्व की धार्मिक महत्ता, लोक परम्पराएँ और पूजन विधि

  •  शुभा दुबे
  •  जनवरी 14, 2021   11:01
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मकर संक्रांति पर्व की धार्मिक महत्ता, लोक परम्पराएँ और पूजन विधि

मकर संक्रांति पर्व से जुड़ी वैज्ञानिक मान्यता यह है कि इस दिन सूर्य उत्तर की ओर बढ़ने लगता है जो ठंड के घटने का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं की अगर बात करें तो उसके मुताबिक इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं जो मकर राशि के शासक हैं।

हिन्दुओं का प्रसिद्ध त्योहार मकर संक्रांति देशभर में अलग-अलग नामों से भी मनाया जाता है। उत्तर में यह मकर संक्रांति है तो पश्चिम में संक्रांति है। दक्षिण में इसे पोंगल, भोगी और पूर्वोत्तर में माघ बिहू अथवा भोगाली बिहू के नाम से पुकारा जाता है। लेकिन एक बात है, नाम भले इस पर्व के कई हों परन्तु हर्षोल्लास सब जगह एक जैसा दिखता है और देश के विभिन्न भागों की हमारी परम्पराएं भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को और समृद्ध बनाती हैं। मकर संक्रांति के पर्व पर देश के विभिन्न भागों खासकर नदियों के पास वाले इलाकों में मेलों का भी आयोजन होता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु पवित्र नदियों में डुबकी लगाते हैं और दान-पुण्य आदि करते हैं। देश के मंदिरों में भी इस दौरान विशेष पूजन आयोजनों के साथ ही भंडारे भी लगाये जाते हैं।

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मकर संक्रांति पर्व की महत्ता

मकर संक्रांति पर्व से जुड़ी वैज्ञानिक मान्यता यह है कि इस दिन सूर्य उत्तर की ओर बढ़ने लगता है जो ठंड के घटने का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं की अगर बात करें तो उसके मुताबिक इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं जो मकर राशि के शासक हैं। पिता और पुत्र आम तौर पर अच्छी तरह नहीं मिल पाते लेकिन यह दिन भगवान सूर्य के अपने पुत्र से मिलने का दिवस होता है। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है कि मकर संक्रांति के दिन यज्ञ में दिए गए द्रव्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं। इसलिए इस दिन पूजन और यज्ञादि का विशेष लाभ होता है।

मकर संक्रांति पूजन विधि

मकर संक्रांति के दिन हर व्यक्ति को सुबह पवित्र स्नान करना चाहिए। यदि पवित्र नदी में स्नान करने नहीं जा पा रहे हैं तो घर पर ही नहाने वाले पानी में गंगा जल की कुछ बूंदें डाल लें। स्नानादि के बाद जनेऊ बदलें, घर के मंदिर की साफ-सफाई कर भगवान की मूर्तियों या तसवीरों को टीका लगायें, अक्षत और पुष्प चढ़ाएं। उसके बाद तिल से बने खाद्य पदार्थों का भोग लगाएँ और आरती करें। इस दिन सूर्य भगवान और शनि जी का पूजन जरूर करें। संभव हो तो घर पर ही छोटा-सा हवन भी कर लें। हवन में गायत्री मंत्रों के साथ ही सूर्य और शनि जी के स्मरण मंत्र का भी उच्चारण करें। इसके बाद घर पर ही पंडित या पुरोहित को बुलाकर उसे भोजन करा कर यथाशक्ति दान दें या फिर मंदिर जाकर पंडित को दान देने के बाद जरूरतमंदों की भी यथाशक्ति मदद करें। याद रखें इस दिन आप जब पहला आहार ग्रहण करें तो वह तिल का ही हो।

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मकर संक्रांति पर्व की धूम

मकर संक्रांति पर्व का आदि काल से लोगों को इसलिए भी इंतजार रहता था क्योंकि इस समय एक तो सर्दी का समापन हो रहा होता है तो साथ ही फसलों की कटाई का कार्य भी शुरू हो रहा होता है। दिन-रात जिस फसल को कड़ी मेहनत कर उगाया उसे काट कर अब आमदनी का वक्त होता है इसलिए कृषकों के हर्ष की इस समय कोई सीमा ही नहीं होती। जहाँ तक इस पर्व पर लगने वाले मेलों की बात है तो कड़ाके की ठंड के बावजूद लोग तड़के से पवित्र नदियों में स्नान शुरू कर देते हैं हालांकि इस बार कोरोना काल में बहुत जगह प्रशासन ने तमाम तरह की पाबंदियां लगाई हैं। आम दिनों में इलाहाबाद के त्रिवेणी संगम, वाराणसी में गंगाघाट, हरियाणा में कुरुक्षेत्र, राजस्थान में पुष्कर और महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी में श्रद्धालु इस अवसर पर लाखों की संख्या में एकत्रित होते हैं। मकर संक्रांति पर इलाहाबाद में लगने वाला माघ मेला और कोलकाता में गंगासागर के तट पर लगने वाला मेला काफी प्रसिद्ध है। तीर्थराज प्रयाग और गंगासागर में मकर संक्रांति पर स्नान को महास्नान की उपाधि दी गई है।

स्नान-दान से मिलता है पुण्य लाभ

मकर संक्रांति के दिन पवित्र स्नान करने के बाद आप पंडित पुरोहित को तो यथाशक्ति दान दें ही साथ ही गरीबों अथवा जरूरतमंदों की मदद भी अवश्य करें। यदि इस दिन खिचड़ी का दान करते हैं तो यह विशेष फलदायी है। खिचड़ी बना कर नहीं दे सकते तो खिचड़ी बनाने में लगने वाली सामग्री का ही दान करना चाहिए। मकर संक्रांति के दिन से ही सभी शुभ कार्य भी शुरू हो जाते हैं। अंग्रेजी माह की दृष्टि से देखें तो दिसंबर मध्य से ही शुभ कार्यों पर जो प्रतिबंध लगे होते हैं वह मकर संक्रांति के दिन से खत्म हो जाते हैं।

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विभिन्न प्रदेशों की परम्पराएँ

मकर संक्रांति के पर्व पर दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात और उत्तराखण्ड के विभिन्न इलाकों में खिचड़ी सेवन और दान की परम्परा है तो वहीं महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रांति पर कपास, तेल, नमक आदि वस्तुएं अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। इसी प्रकार से राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएं अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाया जाता है।

-शुभा दुबे







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