काव्य रूप में पढ़ें श्रीरामचरितमानस: भाग-17

Lord Rama
विजय कुमार । Aug 25, 2021 4:58PM
श्रीराम चरित मानस में उल्लेखित अयोध्या कांड से संबंधित कथाओं का बड़ा ही सुंदर वर्णन लेखक ने अपने छंदों के माध्यम से किया है। इस श्रृंखला में आपको हर सप्ताह भक्ति रस से सराबोर छंद पढ़ने को मिलेंगे। उम्मीद है यह काव्यात्मक अंदाज पाठकों को पसंद आएगा।

तब तक सीता आ गयी, बैठी चरणों पास

उसकी इच्छा का हुआ, माता को आभास।

माता को आभास, जहां भी होंगे स्वामी

मेरा व्रत है, उनके पथ की हूं अनुगामी।

कह ‘प्रशांत’ पर राघव ने उनको समझाया

सास-ससुर की सेवा का महत्व बतलाया।।31।।

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वन का जीवन है कठिन, कंकड़ पत्थर-शूल

नहीं तुम्हारी देह है, इन सबके अनुकूल।

इन सबके अनुकूल मिली है आज्ञा मुझको

पूरा कर वनवास, मिलूंगा जल्दी सबको।

कह ‘प्रशांत’ हे सीता, यदि तुम वन जाओगी

अपयश मुझे मिलेगा, तुम भी दुख पाओगी।32।।

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लेकिन सीता अड़ गयी, रहूं तुम्हारे साथ

मेरा स्वर्ग-नरक वहीं, जहां प्राण के नाथ।

जहां प्राण के नाथ, आप जिस ओर चलेंगे

जनकसुता को अपने पीछे ही पाएंगे।

कह ‘प्रशांत’ है पति सेवा का व्रत अपनाया

मात-पिता ने मुझको है बस यही सिखाया।।33।।

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यह सब सुनकर रामजी, बात गये सब जान

सीता को छोड़ा अगर, खो देगी वह प्राण।

खो देगी वह प्राण, समय था सचमुच भारी

कहा, करो सीता वन चलने की तैयारी।

कह ‘प्रशांत’ यह सुनकर बिलख पड़ी कौशल्या

कहां चले तुम दोनों, सूनी छोड़ अयोध्या।।34।।

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लखनलाल ने जब सुना, व्याकुल हुए अपार

चरण गहे श्रीराम के, बही नेत्र से धार।

बही नेत्र से धार, साथ मैं भी जाऊंगा

राम तुम्हारे बिना नहीं मैं रह पाऊंगा।

कह ‘प्रशांत’ राघव बोले कर्तव्य तुम्हारा

वयोवृद्ध हैं पिता, तुम्हीं दो उन्हें सहारा।।35।।

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कई तरह से राम ने, कीन्हे बहुत प्रयास

समझो मेरी बात तुम, रहो सभी के पास।

रहो सभी के पास, प्रजा को दुख यदि होगा

तो वह राजा निश्चित नरकों में जाएगा।

कह ‘प्रशांत’ है नीति, इसे मानो रुक जाओ

मात-पिता गुरु-प्रजा सभी को सुख पहुंचाओ।।36।।

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लखनलाल माने नहीं, रघुनंदन हे नाथ

मेरे तो बस आप हैं, नहीं छोड़ना साथ।

नहीं छोड़ना साथ, तुम्हीं हो सखा सहारे

मात पिता-गुरु नहीं जानता सिवा तुम्हारे।

कह ‘प्रशांत’ तुम हो स्वामी मैं केवल दासा

छोड़ेंगे यदि आप, बचेगी सिर्फ निराशा।।37।।

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लक्ष्मण के जो मन बसा, जान गये श्रीराम

इन चर्चाओं का नहीं, होगा कुछ परिणाम।

होगा कुछ परिणाम, लखन को गले लगाया

करो तात अब वही, तुम्हारे जो मन भाया।

कह ‘प्रशांत’ माता से आज्ञा लेने जाओ

करके सब तैयारी, शीघ्र यहां तुम आओ।।38।।

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लखनलाल अंदर गये, चरणों पर धर शीश

मातु सुमित्रा से मिले, झोली भर आशीष।

झोली भर आशीष, बात सारी बतलाई

कैकेयी के वचनों की सब कथा सुनाई।

कह ‘प्रशांत’ मैं संग राम के वन जाऊंगा

आज्ञा दो हे मात, शीघ्र वापस आऊंगा।।39।।

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मां के दिल से पूछिए, मां के दिल का हाल

क्रोध सुमित्रा को चढ़ा, नेत्र हो गये लाल।

नेत्र हो गये लाल, दुष्ट कैकेयी रानी

कैसा घात लगाया, बिगड़ी सभी कहानी।

कह ‘प्रशांत’ लेकिन फिर संभली, धीरज धारा

बिना राम के नहीं यहां पर काम तुम्हारा।।40।।

- विजय कुमार

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