यहाँ हर साल लगता है भूतों का मेला, बुरी आत्माओं से मिलता है छुटकारा

By कमल सिंघी | Publish Date: Nov 6 2017 3:06PM
यहाँ हर साल लगता है भूतों का मेला, बुरी आत्माओं से मिलता है छुटकारा

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा के गांव तालखमरा में मालनामाई का प्रसिद्ध मंदिर है। यहां मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा से शुरू हुए मेले में तांत्रिकों के आह्वान पर भगवान शिव और मालनमाई स्वयं आते हैं।

छिंदवाड़ा। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा के गांव तालखमरा में मालनामाई का प्रसिद्ध मंदिर है। यहां मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा से शुरू हुए मेले में तांत्रिकों के आह्वान पर भगवान शिव और मालनमाई स्वयं आते हैं और मानसिक रूप से परेशान लोगों, लोगों में भूत का आना, बुरी आत्माओं से छुटकारा दिलाने की मनोकामना पूरी करते हैं। यहां सदियों से भूतों का मेला लगता है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु बड़ी आस्था के साथ अपनी मनोकामना लेकर आते हैं। 

इंसानों से भूत भगाने और मनोकामना सिद्धी के लिए लोग दूर-दूर से बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। यह मेला करीब 15 दिन चलता है। छिंदवाड़ा के आदिवासी अंचल में लगने वाले इस मेले के बारे में कहा जाता है कि साल में एक बार भूत प्रेत अपना डेरा डालते हैं और उनको ही खुश करने के लिए यहां बरसों से मेला लगता है क्योंकि पडि़हारों के द्वारा साल भर भूतों को यहां बंधक बनाकर रखा जाता है।
 
भूतों को इस तरह वश में किया जाता है
 


छिंदवाड़ा के जुन्नारदेव आदिवासी गांव तालखमरा में भूतों का यह प्रसिद्ध मेला लगता है। इस मेले की खासियत यह है कि प्रेत बाधा से परेशान और मानसिक रूप से विक्षिप्त रोगियों का उपचार इस मेले में किया जाता है। प्रेत बाधा से ग्रसित व्यक्ति का उपचार पडिहार मंत्रों की शक्ति से करते हैं। उसके बाद प्रेत बाधा से ग्रसित व्यक्ति के हाव-भाव देखकर देखने वाले घबरा जाते हैं। रात के समय में रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य ताल खमरा मेले में दिखायी देता हैं। दुर्गम स्थानों में रहने वाले तांत्रिक पडिहार और ओझा इस मेले में भूतों को वश में करके एक पेड़ से कैद कर देते हैं और फिर पूरे साल वो उसी पेड़ में रहते हैं। फिर से वे किसी को परेशान ना कर सकें इसलिए य़े मेला उनको खुश करने के लिए हर साल लगाया जाता है।
 
भूतों के इस मेले में तांत्रिक पीड़ितों को तालाब में डुबकी लगवाते हैं उसके बाद वटवृक्ष ‘दईयत बाबा’ के समीप उसे ले जाकर वहां उस व्यक्ति को कच्चे धागे से बांधकर तांत्रिक पूजा की जाती है। इसके बाद पास में बने मालनमाई के मंदिर में जाकर पूजा अर्चना की जाती है और व्यक्ति सामान्य हो जाता है। यह मेला सदियों से इस तरह लगता आ रहा है। इस मेले में दूर-दूर से आदिवासी समाज के ग्रामीण के साथ अन्य समाज के लोग यहां आकर अपना और अपने परिवार का उपचार करवाते हैं। यहां पर जिले के अलावा अन्य जिलों व प्रदेशों से भी परेशान परिवार आते हैं। भले ही विज्ञान ने तरक्की के पुल खड़े कर दिए हों लेकिन आज भी कुछ ऐसे अनसुलझे पहलु हैं जिन्हें लोग सदियों ने मानते चले आ रहे हैं। उसी का एक उदाहरण इस भूतिया मेले में देखने को मिलता है जिसे हम आस्था या अंधविश्वास कहते हैं।
 
भूतों के मेले के शुरू होने की यह है कहानी
 


आसपास के क्षेत्रों के बुजुर्ग लोग कहते हैं कि एक चरवाहे का आए स्वप्न के बाद से यहां भूतों का मेला लगने लगा। मेला समिति के अध्यक्ष मदन ऊईके बताते हैं कि मेला कई सालों से लगता आ रहा है। स्कूल शिक्षक गंगाप्रसाद सिंगोतिया बताते हैं कि यहां पर शरीर से ऊपरी बाधाओं और भूत-प्रेत पर काबू पाया जाता है। यह हम बचपन से ही देखे आए हैं। मालनमाई के प्रति आसपास के क्षेत्र के लोगों की गजब की आस्था है। एक दर्शनार्थी बताते हैं कि मैं यहां 40 सालों से यहां आता हूं। यहां की मान्यता है कि सब बलाएं दूर होती हैं।
 
- कमल सिंघी
 
नोटः- प्रभासाक्षी किसी भी प्रकार के अंधविश्वास का समर्थन नहीं करता है। यह आलेख उक्त क्षेत्र की एक पुरानी परम्परा से अवगत कराने का प्रयास मात्र है।


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