भक्तों के संकट क्षण में हर लेते हैं श्रीराम भक्त हनुमानजी

  •  मृत्युंजय दीक्षित
  •  अक्टूबर 18, 2017   11:03
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भक्तों के संकट क्षण में हर लेते हैं श्रीराम भक्त हनुमानजी
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श्रीराम के अनन्य भक्त श्री हनुमान जी के लिए जितना भी लिखा जाये व समझा जाये बेहद कम होगा। हनुमान जी सच्चे अर्थों में आज भी समाज के लिए सच्चे पथप्रदर्शक हैं।

रामायण युग में दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण रामभक्त हनुमान जी को कौन नहीं जानता और कौन नहीं समझता है। रामभक्त हनुमान जी सर्वगुण सम्पन्न, बाल ब्रह्मचारी, हर प्रकार के कठिन से कठिन कार्य को करने के लिए सदा तत्पर रहने वाले हैं। हनुमान जी एक ऐसे महान देवता हैं जो आज कलियुग के निराशावादी जीवन में भी उत्साह का संचार करते रहते हैं। हनुमान जी कलियुग में आदर्श जीवन कैसे जिया जाये इसकी प्रेरणा प्रदान करते हैं। उत्तर भारत में हनुमान जयन्ती का पर्व अर्धरात्रि व्यापिनी कृष्ण चर्तुदशी को मनाया जाता है। हनुमान जी के जन्म का उल्लेख अगस्त्य संहिता में हुआ है। दूसरी ओर चैत्र मास की एकादशी और पूर्णिमा पर भी हनुमान जी के जन्म के प्रमाण मिलते हैं। हनुमान जयंती के दिन हनुमान जी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। जिससे कई गुना लाभ सभी भक्तों को मिलता है। हनुमान जयंती के अवसर पर हनुमान जी के सभी मंदिरों को बेहद भव्य तरीके से सजाया जाता है। हनुमान जयंती पर उनका षोडपोचार पूजन तथा श्रृंगार किया जाता है। हनुमान जी कलियुग में आज के वातावरण में भी एक सर्वश्रेष्ठ संकटहर्ता हैं। परिवारों के बड़े−बुजुर्ग भी जब उनके बच्चे निराशावाद में चले जाते हैं तब अपने बच्चों को हनुमान जी की शरण में जाने को कहते हैं क्योंकि हनुमान जी का चित्र देखने मात्र से ही सभी प्रकार की निराशा दूर होने लगती है। वैसे भी उल्लेख मिलता है कि जब हनुमान जी कभी−कभी निराश होने लगते थे तब वे स्वयं अपने प्रभु श्रीराम की शरण में चले जाते थे। इसी कारण एक गीत गुनगुनाया भी जाता है कि, ''हनुमान जी न चलें श्रीराम के बिना और श्रीराम जी न चलें हनुमान के बिना।"

हनुमान जी को अंजनीपुत्र, पवनसुत, शंकर सुवन, केसरीनंदन आदि नामों से भी जाना जाता है। इसके साथ ही हनुमान जी को महाबल, रामेष्ट, फाल्गुनसखा (अर्जुन के मित्र), पिगांक्ष, अमितविक्रम, उदधिक्रमण (समुद्र को अतिक्रमण करने वाले), सीताशोक विनाशन, लक्ष्मण प्राणदाता और दशग्रीवदर्पदा (रावण के घमंड को दूर करने वाला) भी कहा जाता है। हनुमान जी के बारह नाम उनके गुणों के द्योतक हैं। वर्तमान काल में हनुमान जी की महती आवश्यकता है। आज का युवा वर्ग दिशाहीन, दिग्भ्रमित, पश्चिमी सभ्यता के संस्कारों से ओतप्रोत होकर अपनी ओजस्विता को समाप्त कर रहा है। हनुमान जी के जीवन के प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से आज के युवा समुदाय को कलियुग की बुराइयों से बचाया जा सकता है। एक प्रकार से हनुमान जी जनदेवता माने गये हैं। हनुमान जी अपने माता− पिता के अनन्य भक्त व उनके सेवक थे। हनुमान जी का आजन्म ब्रह्मचर्य पालन आज के युग में आदर्श तथा सर्वथा अद्वितीय है। श्रीहनुमान चरित्र एक जीवन दर्शन है। हनुमान जी के चरित्र में शक्ति संचय, उसका सदुपयोग, भगवान की भक्ति आदि है इसलिए उनकी आराधना से इन गुणों की उपलब्धि युवकों एवं बालकों को हो सकेगी। यदि आज के युवा हनुमान जी के जीवन चरित्र को अच्छी तरह से समझें तो समाज की तमाम बुराइयों व निराशावादी वातावरण का सहज अंत हो जायेगा। हनुमान जी आज के युग के लिए एक श्रेष्ठ प्रबंधक गुरु भी साबित हो सकते हैं। उसका कारण है कि हनुमान जी अपने स्वामी श्रीराम जी के काम को समय पर पूरा करके दिखा दे देते थे फिर चाहे उनके मार्ग में जितनी कठिन समस्यायें ही क्यों न आयें। यही कारण है कि भगवान श्रीराम को हनुमान जी के प्रति विशेष लगाव हो गया था। भगवान श्रीराम हनुमान जी के प्रति विशेष कृपादृष्टि रखने लग गये थे। वे अपना हर कठिन से कठिन काम हनुमान जी को सौंपते थे और ऐसा करके वे निश्चिंत होकर आगे की कार्ययोजना बनाने लग जाते थे।

हनुमान जी आज भी जनमानस के संकटों को दूर कर रहे हैं तथा युवाओं व समाज के लिए अद्भुत प्रेरणास्रोत भी हैं। मान्यता है कि हनुमान जी बुद्धि, बल, वीर्य प्रदान करके भक्तों की रक्षा करते हैं। हनुमान जी के स्मरण से रोग, शोक व कष्टों का निवारण होता है। मानसिक कमजोरी व दुर्बलता के दौर में हनुमान जी का स्मरण करने मात्र से जीवन में नये उत्साह का संचार होता है। हनुमानजी के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनमें अहंकार रंचमात्र नहीं था वे सदा श्रीराम व उनके परिवार के सभी सदस्यों सहित अपने गुरु, माता−पिता तथा साधु−संतों के प्रति नतमस्तक रहते थे। आज के युवावर्ग व सत्ता प्रतिष्ठान में यह चीज नहीं रह गयी है। हनुमानजी ने जब माता सीता की खोज के लिए रावण के अंतःपुर में प्रवेश किया और रावण की स्त्रियों और उनकी सुंदरता को देखा तब भी उनका मन व विचार स्खलित नहीं हुआ। जिसका वर्णन स्वयं हनुमान जी ने किया है। यह विचार आज के युवा वर्ग में जाना अत्यंत जरूरी है क्योंकि आज का युवा विदेशी सभ्यता के जाल में फंसता चला जा रहा है और अपनी संस्कृति से दूर होकर अपनी अवनति को बढ़ावा दे रहा है। हनुमान जी नारियों के प्रति सम्मान का भाव रखते थे। लेकिन आज के समाज में नारी सम्मान का भाव गिरता जा रहा है तथा समाज में नारी से सम्बंधित अपराधों में वृद्धि होती जा रही है।

हनुमान जी का जीवन चरित्र उच्च आदर्शों वाला था। उनका जीवन व भक्ति निःस्वार्थ थी। उन्हें देवताओं की ओर से वरदान प्राप्त थे। वे कलियुग के सबसे जाग्रत देवता हैं। हनुमान जी के लिए जितना भी लिखा जाये व समझा जाये बेहद कम होगा। हनुमान जी सच्चे अर्थों में आज भी समाज के लिए सच्चे पथप्रदर्शक हैं। 

- मृत्युंजय दीक्षित







गीता-तत्व को समझ कर उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करें

  •  आरएन तिवारी
  •  नवंबर 27, 2020   11:24
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गीता-तत्व को समझ कर उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करें
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हमारे धर्म शास्त्रों में नैमिषारण्य को सतयुग का परम पवित्र तीर्थ स्थान माना गया है जहाँ एक पल के लिए भी अधर्म का वास न हो। ब्रह्मा जी ने सत्संग के लिए ही इसका निर्माण किया था। त्रेता युग का पवित्र स्थान पुष्कर को कहा गया है।

पिछले अंक में हमने गीता माहात्म्य पर प्रकाश डाला था, हमारे प्रभासाक्षी के पाठकों ने गीता माहात्म्य का आस्वादन लिया। आइए ! इस अंक में हम श्रीमद्भगवत गीता में प्रवेश करें, गीता-तत्व को समझें और उसे अपनी निजी जिंदगी में उतारने का प्रयास करें। भगवान श्री कृष्ण ने आज से लगभग छ: हजार वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र में एकादशी, रविवार के दिन करीब पैंतालीस मिनट तक अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इससे पहले भगवान ने इसी गीता का गायन सूर्यदेव के समक्ष भी किया था, इसीलिए सूर्य नारायण फल की चिन्ता किए बिना निष्काम भाव से आज तक अपने कर्म में लीन हैं।

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श्रीमद्भगवत गीता में न केवल अन्य शास्त्रों की सारी बातें मिलेंगी बल्कि ऐसी बातें भी मिलेंगी जो अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं हैं। अस्तु -------

ऐसा माना जाता है कि गीता दर्शन की प्रस्तुति कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में हुई। द्वापर युग का कुरुक्षेत्र परम पवित्र तीर्थ स्थान रहा है। 

हमारे धर्म शास्त्रों में नैमिषारण्य को सतयुग का परम पवित्र तीर्थ स्थान माना गया है जहाँ एक पल के लिए भी अधर्म का वास न हो। ब्रह्मा जी ने सत्संग के लिए ही इसका निर्माण किया था। त्रेता युग का पवित्र स्थान पुष्कर को कहा गया है।

द्वापर का धर्म स्थल कुरुक्षेत्र और कलियुग का तीर्थ स्थान गंगा को माना गया है। परम पवित्र कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों की सेना महाभारत युद्ध के लिए तैयार खड़ी थी। धृतराष्ट्र के मन में संदेह का सागर उमड़ रहा था कि न जाने इस युद्ध का परिणाम क्या होगा?

उन्होने संजय से पूछा---

धृतराष्ट्र उवाच—

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:। 

मामका पांडवाश्चैवकिमकुर्वत संजय।।

हे संजय! धर्म की भूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध करने की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरे तथा पांडु के पुत्रों ने क्या किया? 

कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में अर्जुन के पक्ष में श्रीकृष्ण स्वयम उपस्थित थे। कौरवों का पिता धृतराष्ट्र अपने अधर्मी पुत्रों को विजयी होते देखना चाहता  था किन्तु उसको इस विषय में संदेह था। वह अपने पुत्रों के विषय में आश्वस्त होना चाहता था। धृतराष्ट्र अत्यधिक भय-भीत था कि इस धर्म क्षेत्र के कुरुक्षेत्र में होने जा रहे युद्ध का विजेता कौन होगा? वह यह सच्चाई भी जानता था कि अर्जुन और पांडवों पर इस युद्ध का प्रभाव अनुकूल पड़ेगा क्योंकि वे स्वभाव से पुण्यात्मा थे।

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धर्म संस्थापनार्थाय संभावमि युगे-युगे 

भगवान का यह अमर संदेश जानते हुए भी धृतराष्ट्र जरूरत से ज्यादा पुत्र-मोह में डूबा हुआ था। भगवान धर्म को अमर करना चाहते हैं और धृतराष्ट्र अधर्म को अमर करना चाहता था। धृतराष्ट्र के जीवन की सबसे बड़ी भूल यही थी, कि वह धर्म युद्ध में अधर्म को विजयी होने का स्वप्न देख रहा था। हम सबके लिए गीता का यही संदेश है कि किसी भी परिस्थिति में अधर्म और अन्याय का साथ नहीं देना चाहिए।  

संजय महर्षि वेदव्यास का परम प्रिय शिष्य था। व्यास जी ने उसको दिव्य-दृष्टि प्रदान की थी, जिसके सहारे वह कुरुक्षेत्र में होने वाले युद्ध का सीधा प्रसारण live telecast कर सकता था। यहाँ हम सबको यह समझ लेना चाहिए कि live telecast आधुनिक खोज नहीं है बल्कि हमारे ऋषि-महर्षियों ने इसकी खोज बहुत पहले कर ली थी। हाँ! इसको और परिष्कृत modify करने का काम आधुनिक समाज ने जरूर किया है।

अस्तु ----

जय श्री कृष्ण -----------   

- आरएन तिवारी







हनुमानजी ब्राह्मण वेष धारण कर श्रीराम के समक्ष उपस्थित हुए और पहचाने गये!

  •  प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क
  •  नवंबर 26, 2020   20:12
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हनुमानजी ब्राह्मण वेष धारण कर श्रीराम के समक्ष उपस्थित हुए और पहचाने गये!
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श्री हनुमान जी के मन की अवस्था में झांकना भी तो आवश्यक था। जैसा कि हमने पहले ही वर्णन किया कि श्री हनुमान जी भगवान शंकर जी का अवतार हैं। और भगवान शंकर की यह प्रबल व दृढ़ इच्छा थी कि वे श्रीराम जी के पावन युगलचरणों का स्पर्श प्राप्त करें।

विगत अंक में हमने पढ़ा कि सुग्रीव श्री हनुमान जी को निवेदन करते हैं कि वे श्रीराम जी की विधिवत परीक्षा लेकर स्थिति स्पष्ट करें कि वे दोनों वीर कहीं बालि के भेजे तो नहीं हैं? इस सुंदर प्रसंग में हमें सुग्रीव के व्यक्तित्व पर भी एक दृष्टिपात करना आवश्यक प्रतीत होता है। रामायण में दो ग्रीवों की चर्चा की गई है। एक हैं सुग्रीव और दूसरा दसग्रीव। ग्रीव या ग्रीवा का अर्थ होता है 'गर्दन'। रावण के दस सिर होने के नाते वह 'दसग्रीव' कहलाया। और सुग्रीव की एक ही ग्रीव है तो मूलतः उसका नाम एकग्रीव होना अधिक उचित था। लेकिन वह 'सुग्रीव' नाम से विख्यात हुआ। जिसका अर्थ है सुंदर ग्रीवा वाला। यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि रावण 'दसग्रीव' होने के बाद भी सुंदर ग्रीव वाला नहीं बन पाया। जबकि सुग्रीव एक ग्रीवा वाला होने के पश्चात् भी सुंदर ग्रीवा वाला कहलाया। वास्तव में ग्रीवा किसकी सुंदर होती है? आध्यात्मिक दृष्टि में किसी का रूप, रंग एवं वेष उसके किसी अंग की सुंदरता को निधार्रित नहीं करते। अपितु जो भी अंग अथवा शरीर किसी संत−महापुरुष को नतमस्तक है, सेवा रत है, वही सुंदर व पावन कहलाता है। जैसे संसारिक दृष्टि में सुंदर नयन वे हैं जो मृग के नयनों से मेल खाते हों। लेकिन गोस्वामी तुलसीदास जी की दृष्टि तो कुछ और ही कहती है−

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नयनन्हि संत दरस नहीं देखा। 

लोचन मोरपंख कर लेखा।। 

अर्थात् अगर हम इन नेत्रों के द्वारा किसी संत−महापुरुष का पावन दर्शन नहीं करते तो हमारे नेत्र कोई सजीव व सुंदर तो कतई नहीं हैं। अपितु ठीक उस आंख की तरह हैं जो मोर के पंख पर बनी होती है। जो मात्रा दिखने में ही सुंदर है। परन्तु उसके माध्यम से कोई नेत्रहीन देख नहीं सकता। 

सुग्रीव की ग्रीवा सुंदर इसलिए है क्योंकि वह किसी भी परिस्थिति में श्री हनुमान रूपी साधु का संग नहीं त्यागते। सुग्रीव को पता है कि भले ही मैं उन दोनों वीर पुरुषों को पहचानने में असमर्थ हूँ। लेकिन तब भी चिंता किस बात की। मेरे पास श्री हनुमान जी के रूप में साधु का सान्निध्य तो है ही। और साधु की दृष्टि से भला क्या छुप सकता है। उनकी दृष्टि धोखा कैसे खा सकती है। इसलिए सुग्रीव ने अपनी सोच को श्री हनुमान जी को समर्पित कर दिया।

लेकिन वहीं श्री हनुमान जी जिस घड़ी रावण की सभा में उपस्थित होते हैं तो रावण उन्हें किसी साधु की संज्ञा देकर सम्मान नहीं करता अपितु उनकी पूँछ जलाकर उनका अपमान करने का जघन्य व अक्षम्य अपराध करता है। कहने को तो रावण की 'ग्रीवा' की संख्या 'दस' है। लेकिन उसमें एक भी ग्रीवा श्री हनुमान जी के समक्ष झुक नहीं रही, अपितु अकड़ अवश्य रही है। 

श्री हनुमान जी केवल संत ही नहीं हैं बल्कि भगवान शंकर के अवतार भी हैं। वही भगवान शंकर जिन्हें रावण ने अपने दसों शीश काट कर अर्पित किए थे। लेकिन आज स्वयं भगवान शंकर वेष बदलकर श्री हनुमान जी रूप में क्या आए, रावण उन्हीं के समक्ष अपने दसों शीश अकड़ा कर बैठा है। यद्यपि श्री हनुमान जी कोई भी वेष धारण करें वे हर वेष में ही सम्मानीय हैं−

किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। 

जिमि जग जामवंत हनुमानू।।

अर्थात् बुरा वेष बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है। जैसे हनुमान जी और जामवंत का हुआ। और आज श्री हनुमान जी को श्रीराम जी के समक्ष ब्राह्मण का वेष धरण करना पड़ा। तो हृदय के किसी कोने में उलाहना तो था ही कि हे प्रभु हमें तो आपकी पावन लीला का अंग बनने का सुअवसर मिला ही है, लेकिन दिखने में यह जितना सरल व रोचक लगता है, उतना है नहीं अपितु कष्टदायक अवश्य है। कष्टदायक इसलिए क्योंकि किसी भी मापदंड व समीकरण के आधर पर समीक्षा करें तो श्रीराम जी तो निःसंदेह सर्वश्रेष्ठ व शिरोमणि हैं ही और हम असंख्य जन्म लेकर भी उनकी चरण धूलि के एक कण की भी बराबरी नहीं कर सकते। परंतु आज जब उनकी पावन लीला का पात्रा बनना पड़ रहा है तो वे क्षत्रिय धर्म निभाते दृष्टिपात हो रहे हैं। और मैं ब्राह्मण के वेष में हूँ। और यहाँ न चाहते हुए भी मुझे श्रीराम जी का प्रणाम स्वीकार करने की धृष्टता करनी पडे़गी। और उसपे भी कठिनता यह कि ब्राह्मण वेश के कारण मुझे उन्हें कुछ उपदेश करने की कठिन घड़ी से भी गुजरना पड़ेगा। निःसंदेह मैं इन विकट परिस्थितियों के लिए किंचित भी तत्पर नहीं हूँ। लेकिन क्योंकि यही मेरे प्रभु की इच्छा है तो स्वाभाविक है मुझे इस दौर से गुजरना ही पड़ेगा। 

लेकिन सज्जनों कैसा मीठा घटनाक्रम घट रहा है। श्री हनुमान जी भले ही पूरी तैयारी में गए थे। लेकिन सेवक धर्म लाख चाहने पर भी त्याग नहीं पाए। क्योंकि−

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बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। 

माथ नाइ पूछत अस भयऊ।। 

अर्थात् श्री हनुमान जी ब्राह्मण का वेष धारण कर श्रीराम जी के समक्ष उपस्थित हुए और मस्तक नवाकर इस प्रकार पूछने लगे।

सज्जनों यहाँ प्रसंग को आप जरा महीन दृष्टि से अवश्य देखिए। लीला है तो लीला को, लीला की ही तरह निर्वाह करना चाहिए। लेकिन यहाँ तो श्री हनुमान सोलह आने असफल हो गए। कारण यह कि जब आप ब्राह्मण रूप धरण कर क्षत्रिय रूप धरण किए श्रीराम के समक्ष उपस्थित हो गए तो लौकिक संस्कार क्या यह कहता है कि एक ब्राह्मण किसी क्षत्रिय को प्रणाम करे? यह तो व्यवहारिक रीति व मर्यादा का सरासर उल्लंघन था। लेकिन श्री हनुमान जी के मन की अवस्था में झांकना भी तो आवश्यक था। जैसा कि हमने पहले ही वर्णन किया कि श्री हनुमान जी भगवान शंकर जी का अवतार हैं। और भगवान शंकर की यह प्रबल व दृढ़ इच्छा थी कि वे श्रीराम जी के पावन युगलचरणों का स्पर्श प्राप्त करें। और इसी के निमित उनकों तीन सुअवसर प्राप्त हुए एवं तीनों बार भगवान शंकर असफल हुए। कब? प्रथमतः श्रीराम जी का अयोध्या में अवतरण हुआ तो भगवान शंकर ज्योतिषी बनकर गए परंतु चरण स्पर्श करने में असफल रहे। दूसरे श्रीराम जी जब वनों में श्रीसीता जी के वियोग में व्याकुल थे तो भगवान शंकर सती जी के साथ अगस्त्य मुनि जी के आश्रम से लौट रहे थे। तब भी उनकी चरण स्पर्श की मनोकामना पूर्ण नहीं हुई। और तीसरी बार भगवान शंकर प्रभु श्रीराम जी के विवाह मंडप में भी उपस्थित थे लेकिन यहाँ भी श्रीराम जी के चरणों की उनसे दूरी मिट नहीं पाई। श्री हनुमान जी ने सोचा कि हम भगवान बनके घूमते रहे और हमारे भगवान हमसे दूर ही रहे। बंदर क्या बने कलंदर भगवान श्री राम सामने खड़े हो गए। छोड़िए जी लीला−वीला तो चलती रहेगी? क्यों न प्रभु को निकट होकर प्रणाम करने का प्रसाद तो लूट ही लिया जाए। 

प्रणाम करने के पश्चात श्री हनुमान जी श्री राम जी से क्या मीठी वार्ता हुई जानेंगे अगले अंक में...क्रमशः







प्रभु श्रीराम से कब, कहाँ और कैसे हुई थी भक्त हनुमानजी की भेंट?

  •  प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क
  •  नवंबर 24, 2020   12:52
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प्रभु श्रीराम से कब, कहाँ और कैसे हुई थी भक्त हनुमानजी की भेंट?
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इधर श्री राम जी भी कैसी लीला कर रहे हैं? सर्व समर्थ हैं, अंतर्यामी व घट−घट की प्रत्येक धड़कन के स्वामी व साक्षी हैं। क्या उनसे छुपा है कि श्री सीता जी को तो रावण लंका में ले गया है। लेकिन तब भी उनके पावन श्रीचरण तो लंका की तरफ तो उठे ही नहीं।

नजरें दूर तलक अथक तलाश के पश्चात फिर से खाली टोकरी की तरह खाली ही थीं। प्रतीक्षा की एक भी घड़ी यह मानने को तैयार नहीं थी कि 'वे' नहीं आएंगे। इस घड़ी नहीं तो अगली घड़ी तो उनके आगमन से अवश्य ही सजी होगी। और इसी तरह हनुमान जी एक और दिन की आहुति देने को तैयार थे। परंतु श्री राम जी थे कि अपने पावन श्री चरणों की पद्चाप इस दिशा में कर ही नहीं रहे थे। पता नहीं क्यों श्री हनुमान जी के हृदय का विरह ताप श्रीराम जी को पिघला ही नहीं पा रहा था। लेकिन तब भी हर छुपते सूर्य के साथ ऐसा नहीं कि श्री हनुमान जी का उत्साह व प्रभु दर्शनों की हठ भी कहीं छुप जाते। अपितु अगली सुबह उगते सूर्य के साथ श्री हनुमान जी फिर से अपने मोर्चे पर पूर्णतः डटे मिलते।

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इधर श्री राम जी भी कैसी लीला कर रहे हैं? सर्व समर्थ हैं, अंतर्यामी व घट−घट की प्रत्येक धड़कन के स्वामी व साक्षी हैं। क्या उनसे छुपा है कि श्री सीता जी को तो रावण लंका में ले गया है। लेकिन तब भी उनके पावन श्रीचरण तो लंका की तरफ तो उठे ही नहीं। बल्कि वनों की अंधी दिशाओं में भी एक दिशा का पल्लू पकड़ कर बढ़े जा रहे थे। और वह दिशा सीधी ट्टष्यमूक पर्वत की गोद में जा कर समाप्त हो रही थी। क्या श्रीसीता जी यहीं थी? जिनके लिए श्री राम जी इतने व्याकुल थे। नहीं सज्जनों! यहीं पर तो पहाड़ी की एक चोटी पर दो प्यासे नयन अपनी पलकें बिछाकर बिछे हुए थे। कि कब श्री राम हमें अपने पावन दर्शनों से कृतार्थ करेंगे। जी हाँ! यह हनुमान जी ही थे। जिनकी तरफ श्री राम चुंबक की तरह खिंचे जा रहे थे। कैकई माता तो व्यर्थ ही प्रसन्न थी मानो उसने श्री राम जी को बनवास देकर कोई महान जंग जीत ली हो। जबकि श्री राम जी को अयोध्या का सिंहासन छिन जाने का गम ही नहीं था। क्योंकि उन्हें किसी लकड़ी के बने स्वर्ण जड़ित सिंहासन पर तो राज करना ही नहीं था। अपितु कुंदन से भी शुभ भक्तिमय हृदय ही उनका सिंहासन थे। और श्री हनुमान जैसे भक्त सा हृदयासन भला श्री राम जी को कहीं मिल ही कैसे सकता था? 

इधर श्री हनुमान जी का रोम−रोम मानो नृत्य सा करने लगा था। पवन में चंदन सी महक का समावेश हो बह रहा था। प्रत्येक पक्षी का कंठ स्वतः ही राग−रागनीयों की धुन से सज गया। हर दिशा महकने सी लगी। ऐसा होना ही था। क्योंकि श्रीराम जी के पावन युगल चरण हैं ही ऐसे। जहाँ पड़ते हैं वहाँ सूखे मरुस्थल में भी अमृत कुण्ड फूट पड़ते हैं। उज़डे बागों में बहार स्पंदित हो जाती है। और पलक झपकते ही अमावस्या की काली डरावनी रात्रि मनभावन उजली पूर्णिमा में परिवर्तित हो जाती है। श्री हनुमान जी के साथ ऐसा ही कुछ घट रहा था। मृत से जीवन में नवीन प्राणों का संचार होने को था।

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सब सही दशा व दिशा में था कि तभी भक्त एवं भगवान् के इस पावन मिलन में एक बाध ने खलल सा पैदा कर दिया। यूं लगा मानो स्वादिष्ट व्यंजन का स्वाद चखते−चखते मुख में कंकड़ आ गया हो। जी हाँ! इससे पहले कि श्री हनुमान जी अपने प्रभु का दर्शन निहारते। सुग्रीव पहले ही श्री राम और लक्ष्मण जी को देख लेते हैं। लेकिन यहाँ दृष्टि की भिन्नता देखिए, श्री हनुमान जी को यही लगा कि अरे 'वे' भगवान श्री राम आ तो नहीं गए। और सुग्रीव भी यही सोचता है कि कहीं 'वे' आ तो नहीं गए लेकिन यहाँ सुग्रीव का 'वे' से तात्पर्य श्री राम नहीं बल्कि उसके काल बालि से था। कहाँ तो श्री राम एवं लक्ष्मण के शुभ आगमन से श्री हनुमान जी अत्यंत आनंददित व रोमांचित थे और कहाँ सुग्रीव भयक्रांत व संदेह की स्थिति में है। और इसी असमंजस की स्थिति में सुग्रीव श्री हनुमान जी को कहते हैं−

अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधना।।

धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई।।

                

अर्थात हे हनुमान! मैं तो बहुत डरा हुआ हूँ। क्योंकि वे दोनों पुरुष बल और रुप के धनी हैं। तुम ब्रह्मचारी का रूप धरण करके जाओ, अपने हृदय में उनकी यथार्थ बात जानकर मुझे इशारे से समझा कर कह देना−

पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला।।

अर्थात यदि वे मन के मलिन बालि द्वारा भेजे हों तो मैं तुरंत इस पर्वत को छोड़कर भाग जाऊंगा। 

बेचारे श्री हनुमान जी अवश्य ही दुविधा में फंस गए होंगे। क्योंकि श्री हनुमान जी को गोस्वामी तुलसीदास जी संत की संज्ञा देते हैं। और संत, सुग्रीव जैसे भीरू जीव को भगवान् के समीप लाने का कार्य करेंगे या यह इशारा करेंगे कि तुम प्रभु से दूर भाग जाओ। ऊपर से यह भी आदेश कि हे हनुमान आप अपना वेश बदल कर जाना और वह भी ब्राह्मण वेश। यह सुनकर श्री हनुमान जी का हृदय दुबिध में पड़ गया। क्योंकि जीव आखिर कब तक अपने वेश बदलता रहेगा। पहले तो चौरासी लाख योनियों में कभी नभचर, कभी जलचर और कभी थलचर जीवों के असंख्य वेश धरण किए। और मनुष्य बने तो स्वार्थ व विकारों के वशीभूत हो पल प्रतिपल इतने मुखौटे बदले कि जिसकी चर्चा ही मन को विचलित व अशांत करने वाली है। सुग्रीव निश्चित ही श्री हनुमान जी को अपने जमीर से विपरीत कार्य करने के लिए बाध्य कर रहे थे। कहाँ तो श्री राम जी के दर्शनों का परिणाम ही यह है कि जीव के भवबंधन कट जाते हैं। और कहाँ उन्हीं के सामने एक और नया रूप धरण करना पड़ रहा है। उस पर भी असमंजस की स्थिति यह कि वानर होते हुए भगवान् की परीक्षा लेने का धृष्टता करनी पड़ रही है। भगवान् को परीक्षा दी जाती है न कि उनकी परीक्षा ली जाती है। और एक मुख वाला ब्राह्मण बनकर तो छोडि़ए मैं सहड्ड मुख वाला भी बन जाऊं तो भी प्रभु की परीक्षा हेतु मेरे पास कण मात्रा भी सामर्थ्य नहीं है। वानर होकर ब्राह्मण होने की धृष्टता भला मैं क्यों करूँ। अपनी असमर्थता, अवगुण व हीनता उनसे क्यों छुपाऊँ। वैद्य सामने हो तो उसे अपने स्वस्थ व पुष्ट अंगों की जानकारी थोड़ी दी जाती है। अपितु कौन से अंग में रुग्णता है यह रोना रोया जाता है। और मुझ अभागे की कैसी विकट मनोस्थिति है कि ईश्वर सामने है और वानर जाति का होने के नाते उनके इशारों पर नाचने का सौभाग्य मिल रहा है तब भी नाचना सुग्रीव के इशारों पर पड़ रहा है। कैसी पीड़ादायक घड़ी कि जो ईश्वर अपनों से भी अपना है उसी के सामने बेगाना बनकर जाना पड़ रहा है। कहाँ तो प्रभु के आगे मुझे अपना यह दुखड़ा रोना था कि हे प्रभु! मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और आप से बिछुड़ कर क्यों भटक रहा हूँ। कहाँ प्रभु से उलटा यह प्रश्न पूछना पड़ेगा कि आप कौन हो और इन वनों में क्यों भटक रहे हो−

को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। क्षत्री रुप फिरहु बन बीरा।।

कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी।।

हे वीर! साँवले एवं गोरे शरीर वाले आप कौन हैं जो क्षत्रिय के रुप में आप वन में विचरण कर रहे हैं। हे स्वामी! कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलने वाले आप किस कारण से वन में विचर रहे हैं। 

सज्जनों क्या श्री हनुमान जी प्रभु श्री राम जी की सच में परीक्षा लेते हैं? या सीधे उनके चरणों में नतमस्तक हो जाते हैं जानेंगे अगले अंक में...क्रमशः