कोरोना के इलाज में खाली हो रहे लोगों के बैंक अकाउंट, खर्च के लिए लेना पड़ रहा लोन

कोरोना के इलाज में खाली हो रहे लोगों के बैंक अकाउंट, खर्च के लिए लेना पड़ रहा लोन

पहला है मुकुंद मुरली की उम्र 49 वर्ष है और मंथली इनकम 50 हजार के करीब है। उन्हें कोरोना वायरस हुआ और वह अस्पताल में भर्ती हुए। उनके इलाज का खर्च लगभग ₹210000 का आता है इसमें से इंश्योरेंस कंपनी ₹190000 चूकाती है। मुकुंद को केवल ₹20000 ही अपने जेब से चुकाने पड़े।

कोरोना वायरस ने ना सिर्फ बड़ी तादाद में लोगों की सेहत पर असर डाला है बल्कि इसने आर्थिक रूप से भी चोट पहुंचाया है। कोरोना की जद में आने वाले लोगों की वित्तीय हालात खराब हो गई है। हां, एक बात जरूर है कि जिन लोगों ने अपने हेल्थ इंश्योरेंस करा रखे थे उनके वित्तीय हालात पर असर कम पड़ा है। लेकिन जिन लोगों ने नहीं कराया था वह पूरी तरह से तबाह हो गए हैं। देश में हेल्थ इंश्योरेंस खरीदने वाले लोगों की संख्या वर्तमान में कम है। कोरोना संकट के कारण इसमें तेजी जरूर आई है। हालांकि जो कोरोना की चपेट में आ गए हैं वह फिलहाल भारी बोझ के नीचे दबे हुए हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में एक रिपोर्ट छपी है इस रिपोर्ट में दो पीड़ितों का हवाला दिया गया है। पहला है मुकुंद मुरली की उम्र 49 वर्ष है और मंथली इनकम 50 हजार के करीब है। उन्हें कोरोना वायरस हुआ और वह अस्पताल में भर्ती हुए। उनके इलाज का खर्च लगभग ₹210000 का आता है इसमें से इंश्योरेंस कंपनी ₹190000 चूकाती है। मुकुंद को केवल ₹20000 ही अपने जेब से चुकाने पड़े।

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दूसरी ओर देखें तो हरिचरण है। उनकी उम्र भी 50 के आसपास है। वह मुकुंद से ज्यादा कमाते भी हैं। वह भी कोरोना वायरस के शिकार हुए। उन्हें भी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। उनका बिल लगभग ₹223000 का आता है। अस्पताल का बिल चुकाने के लिए हरिचरण को पर्सनल लोन लेना पड़ता है। जिसके कारण उन्हें अगले 4 सालों तक हर महीने 6500 रुपए का ईएमआई देनी होगी। हरिचरण और मुकुंद के मामले से साफ तौर पर यह पता चलता है कि कोरोना संकट में इंश्योरेंस नहीं होने से कितना नुकसान हो रहा है। मुकुंद को अस्पताल में महज ₹20000 ही अपने जेब से देने पड़े क्योंकि उसके पास हेल्थ इंश्योरेंस था। लेकिन हरिचरण के साथ ऐसा कुछ भी नहीं था। कोरोना मामलों में आई अचानक वृद्धि और अस्पतालों में कम क्षमता होने की वजह से मध्यम वर्ग को प्राइवेट अस्पतालों की ओर रुख करना पड़ रहा है जहां इलाज खर्चीला है। प्राइवेट अस्पतालों का खर्च उठाना सबके बस की बात भी नहीं है। 

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मनोज दुबे अपने दो बच्चों और वृद्ध माता-पिता के साथ कोरोना की चपेट में आ गए थे। उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। इलाज के लिए उन्हें ₹500000 देने पड़े। हालांकि दुबे के पास इंश्योरेंस था। पर कैशलेस इलाज की अनुपलब्धता के कारण उन्हें अपने परिवार और दोस्तों से उधार लेना पड़ा। वर्तमान समय में देखे तो कुछ ऐसी कंपनियां भी है जिन्होंने अपने अनइंस्योर्ड एंप्लॉय को भी लोन देने का फैसला किया है। इसके अलावा कंपनियों की ओर से कोरोना काल में अलग-अलग तरह की मदद भी प्रदान की जा रही है। वहीं कुछ ऐसी कंपनियां भी है जो कोरोना संकट में भी सैलरी काट रही है या तो लोगों को नौकरी से निकाल रही है। ऐसे लोगों के लिए चुनौतियां बड़ी हैं जिन लोगों की नौकरी गई है। उन लोगों को कंपनी की तरफ से मिलने वाला कोई भी लाभ हासिल नहीं हो रहा है जिससे कि परिस्थितियां और भी गंभीर होती जा रही है।

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वित्तीय जानकारों ने कहा है कि महामारी ने पहले की तुलना में अब हेल्थ इंश्योरेंस की आवश्यकता को बढ़ा दिया है। पिछले साल बीमा नियामक ने कंपनियों से कहा था कि वह कोविड-19 के लिए कम लागत वाले कोरोना कवच को पेश करें। यह कवर इस साल मार्च में खत्म होना था लेकिन रेगुलेटर ने कंपनियों से कहा कि वे इसे सितंबर तक रिन्यू कर सकते हैं। एक करोड़ से ज्यादा लोगों ने अब तक इसका लाभ उठाया है। परंतु देश की आबादी बहुत है और अब भी अधिकांश लोग अनइंस्योर्ड है। माय एसेट एलोकेशन के सीईओ सुरेश पार्थसारथी ने हरिचरण के मामले को ही समझने की जरूरत को बताते हुए कहा कि अगर उसने इंश्योरेंस खरीदा होता तो 1 साल का  प्रीमियम लगभग ₹6000 के करीब होता। उसने इंश्योरेंस पॉलिसी नहीं खरीदी जिसके कारण उसे हर महीने ₹6500 चुकाने पड़ेंगे। फील्ड के जानकारों का कहना है कि इंश्योरेंस कंपनियां करीब 90 फ़ीसदी तक खर्च कवर करती है।







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