डिबेंचर धारकों की चिंता दूर करने के लिए न्यायालय ने किया असाधारण अधिकार का इस्तेमाल

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न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना की पीठ ने इस मामले से जुड़े तथ्यों एवं परिस्थितियों का संज्ञान लेते हुए कहा, ‘‘संविधान के अनुच्छेद 142 के संदर्भ में यह न्यायालय डिबेंचर धारकों के अधिकारों को नकारे जाने की आशंका को दूर करने के लिए समुचित निर्देश दे सकता है।’’

नयी दिल्ली, 31 अगस्त। उच्चतम न्यायालय ने अपने असाधारण अधिकार का इस्तेमाल करते हुए मंगलवार को रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड (आरसीएफएल) के डिबेंचर धारकों की चिंताएं दूर करने के लिए एक समाधान योजना को मंजूरी दे दी। आरसीएफएल ने मार्च, 2019 में पहली बार डिबेंचर के भुगतान में चूक की थी। आरसीएफएल और डिबेंचर ट्रस्टी विस्ट्रा के बीच 2017 और 2018 में तीन डिबेंचर करार हुए थे।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना की पीठ ने इस मामले से जुड़े तथ्यों एवं परिस्थितियों का संज्ञान लेते हुए कहा, ‘‘संविधान के अनुच्छेद 142 के संदर्भ में यह न्यायालय डिबेंचर धारकों के अधिकारों को नकारे जाने की आशंका को दूर करने के लिए समुचित निर्देश दे सकता है।’’ शीर्ष अदालत को इस सवाल पर फैसला करना था कि आरसीएफएल के डिबेंचर धारक एवं अन्य पक्षों को क्या बाजार नियामक सेबी के परिपत्र में निहित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। इस पर पीठ ने कहा कि समाधान योजना के अनुमोदन के लिए मतदान के तरीके से संबंधित सेबी परिपत्र वैध है और यह पूर्व-प्रभाव से लागू हो सकता है।

हालांकि, न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत हासिल अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उस समाधान योजना को स्वीकृति दे दी जिसे सेबी आदेश का पालन किए बगैर ही तैयार किया गया था। पीठ ने कहा कि इस मामले से जुड़े खास तथ्यों एवं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए वह अपने असाधारण अधिकार का इस्तेमाल कर रहा है। संविधान का अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को यह अधिकार देता है कि वह किसी मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए जरूरी होने पर इस तरह का आदेश या निर्णय दे सकता है।

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